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प्रदेश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज से इस्तीफा दे रहे डॉक्टर, ये रही इसके पीछे की बड़ी वजह

Fri, 26 Jul 2019 05:33 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 26 Jul 2019 05:33 PM IST
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Nine doctors resigns from Medical College in Meerut of Uttar Pradesh
लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज

प्रदेश के प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज एलएलआरएम में एक तरफ 44 विशेषज्ञ चिकित्सकों का टोटा है, तो दूसरी तरफ चिकित्सकों का मेडिकल से मोहभंग हो रहा है। पिछले करीब तीन साल में मेडिकल से नौ विशेषज्ञ चिकित्सक इस्तीफा दे चुके हैं। पिछले साल 15 चिकित्सकों का स्थानांतरण कर दिया गया था। मरीजों को बेहतर इलाज मिलना मुश्किल होगा गया है।

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चिकित्सकों के इस्तीफा देने की वजह मेडिकल का खराब माहौल वजह माना जा रहा है। इससे न सिर्फ मरीजों को बेहतर इलाज मिलने में परेशानी हो रही है, बल्कि स्टूडेंट्स की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है। इतना ही नहीं, अभी और भी कई चिकित्सक इसकी कतार में बताए जा रहे हैं। एक चिकित्सक ने हाल ही में इस्तीफा दिया है, जबकि एक अन्य एक माह के नोटिस पर चल रहे हैं। इसी तरह अगर सरकारी चिकित्सक जाने लगे तो मरीजों का क्या होगा, जो सरकारी अस्पतालों के भरोसे हैं, उन्हें एक्सपर्ट से इलाज कैसे मिल पाएगा। प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता का कहना है कि चिकित्सकों की कमी का मामला शासन के संज्ञान में है।  
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ये चिकित्सक दे चुके इस्तीफा
- हड्डी विभाग के विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. गजराज
- हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. परवेज अहमद
- मानसिक रोग विशेषज्ञ, यूनिट के हेड डॉ. रवि राणा
- बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित उपाध्याय
- यूरो सर्जन डॉ. अभिषेक जैन
- प्लास्टिक सर्जन डॉ. भानू प्रताप
- फिजिशियन डॉ. अमित माहेश्वरी
- फिजिशियन डॉ. विशाल अग्रवाल
- मेडिसिन विभाग के डॉ. आरपी शर्मा

मेडिकल से यह विशेषज्ञ भी जा चुके
मेडिकल कॉलेज के एंडोक्रिनोलॉजी (अंतस्रावी) विशेषज्ञ डॉ. केके गुप्ता लखनऊ में डीजी चिकित्सा शिक्षा बन गए हैं। हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जीके अनेजा, गुर्दा रोग विशेषज्ञ डॉ. अरविंद त्रिवेदी, मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप भारती और यूरोलोजिस्ट डॉ. सुधीर राठी भी अलग-अलग कारणों या स्थानांतरण की वजह से यहां से चले गए हैं।

सरकार की कार्यप्रणाली जिम्मेदार
चिकित्सक दबी जुबान में इसके लिए सरकार की कार्यप्रणाली को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि सरकारी चिकित्सक को उतनी तनख्वाह नहीं मिलती, जितनी प्राइवेट प्रैक्टिस के दौरान उसे इनकम होती है। वह मोटी रकम खर्च कर डॉक्टर बनता है। अब चिकित्सक अगर सरकारी अस्पताल में प्रैक्टिस करते हुए निजी प्रैक्टिस करें तो उसे पकड़े जाने का डर रहता है। न करे तो मनमुताबिक सैलरी नहीं मिलती है।

विधान परिषद में उठाया गया मुद्दा
एमएलसी आशु मलिक ने मेडिकल कॉलेज की बदहाली का मुद्दा विधान परिषद में उठाया। उन्होंने कहा कि मेडिकल कॉलेज में डेढ़ साल से डायलिसिस की सुविधा बंद है। यहां मुरादाबाद, बिजनौर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद और बागपत जिलों के किडनी के गंभीर रोगी इलाज के लिए आते हैं, लेकिन उन्हें दिल्ली एम्स या अन्य जगह जाना पड़ता है। नेफ्रोलॉजी विभाग बंद होने के कारण नेफ्रोलॉजिस्ट को किसी अन्य जगह संबद्ध कर दिया गया है।

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