‘वे बस एक ही बात बोलते थे। फौज से बड़ा कुछ नहीं होता। फौजी हूं। बेटों को भी फौजी बनाऊंगा। लेकिन कुछ नहीं हो सका। मुझे दोनों बच्चों के साथ घर छोड़कर गए थे। इसके बाद न उनकी कोई चिट्ठी आई और न ही कोई संदेश मिला। तिरंगे में लिपटा शव आया। पूरे 19 साल हो गए। आज भी वो दिन भुलाए नहीं भूलता। तीन गोलियां लगी थी।’ इतना कहकर वीर चक्र विजेता शहीद यशवीर सिंह की पत्नी मुनेश देवी भावुक हो जाती हैं।
चिठ्ठी न कोई संदेश... तिरंगे में लिपटा आया अमर शहीद, तस्वीरों में देखिए पत्नी की दर्द भरी कहानी
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नेता और अधिकारियों को लेकर है एक टीस
मुनेश बताती हैं कि जून 1999 की बात है।
मूल रूप से बागपत के सिरसली और वर्तमान में तेज विहार कंकरखेड़ा निवासी हवलदार यशवीर सिंह की जम्मू में तैनाती थी। इससे पहले वह ग्वालियर में तैनात थे। जम्मू पोस्टिंग आई तो परिवार को मेरठ अपने घर पर छोड़कर जम्मू के लिए रवाना हो गए थे। इसी बीच कारगिल में लड़ाई छिड़ गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूत राइफल को तत्काल तोलोलिंग पहुंचने के आदेश हुए। हवलदार यशवीर सिंह ने दुश्मन के तीन बंकरों को नष्ट कर दिया। 40 से 50 दुश्मनों को मार गिराया। 13 जून की सुबह दुश्मन से लड़ते हुए वे शहीद हो गए। शहीद यशवीर को अदम्य साहस और पराक्रम के चलते वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी बहादुरी के किस्से आज भी उनके साथी लोगों को सुनाते हैं।
वीर नारी मुनेश देवी बताती हैं कि जब वह शहीद हुए तो बड़ा बेटा 12 साल और छोटा नौ साल का था। शव देखने के बाद बेहोश हो गईं। एक साल तक बहुत खराब हालत रही। बच्चों का भी पता नहीं था। शुरू-शुरू में बहुत लोग आते थे। मुख्यमंत्री भी आए। तमाम नेता आए। सभी ने बड़ी-बड़ी बातें की। लेकिन धीरे-धीरे सब भूल जाते हैं। अब तो अफसरों के यहां भी जाते हैं तो चपरासी बाहर रोक देता है।
मुनेश देवी सवाल करती हैं कि क्या यही है शहीदों की पत्नियों का सम्मान। सरकार ने पेट्रोल पंप दिलाया। लेकिन इसमें भी खेल कर दिया। जमीन तक हमारी नहीं है। कंपनी कब ले ले कुछ नहीं कहा जा सकता है। मुनेश देवी बताती हैं कि जब तक वह जिंदा हैं, पेट्रोल पंप चल रहा है। उनके बाद कंपनी कभी भी डीलरशिप खत्म कर सकती है। शहीदों के परिवारों के लिए ये कैसी मदद है। दो साल पहले तक हमें पेंशन की पूरी रकम भी नहीं मिलती थी।
ये कैसी मदद और सम्मान
मुनेश देवी के बेटे उदय सिंह बताते हैं कि मम्मी पढ़ी-लिखी नहीं थीं। इसके कारण किसी ने उनको यह नहीं बताया कि जमीन कंपनी ने अपने नाम करा ली है। छोटे बेटे को फौज में भर्ती कराना चाहती थीं। लेकिन तलवे चपटे होने के कारण मेडिकल टेस्ट में वह पास नहीं हो पाया। सरकारें वीरों की शहादत पर उतना ही बोलें, जितना किया जा सकता है। वरना शहीदों के परिवारों को बहुत दर्द होता है। हमने बहुत सहा है।
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