भाजपा के लिए आसान नहीं सपा-बसपा गठबंधन से पार पाना, मेरठ सीट पर भी बदले समीकरण
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पश्चिमी यूपी में जातिगत और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर चुनाव होता रहा है। 2009 के लोकसभा चुनाव की अगर बात करें तो भाजपा ने रालोद से गठबंधन करते हुए यह चुनाव लड़ा था जिसमें मेरठ सहित मुजफ्फरनगर, बागपत, बिजनौर और गाजियाबाद की लोकसभा सीटों के आंकड़े देखें तो रालोद से गठबंधन का फायदा भाजपा को मिला और बिना लहर के इन पांच सीटों में से चार सीटों पर भाजपा और रालोद गठबंधन ने चार सीटों पर कब्जा किया था। एक सीट बसपा के हाथ लगी थी।
लेकिन 2014 में मोदी लहर में सभी विपक्षी दल धराशायी हो गये थे। यह चुनाव कांग्रेस और रालोद ने जहां मिलकर लड़ा था तो सपा और बसपा अकेले दम पर मैदान में थे। इस चुनाव में भाजपा ने सभी पांचों सीटों पर बड़े अंतर से जीत हासिल की थी। जिसमें गाजियाबाद और मुजफ्फरनगर लोकसभा तो ऐसी रही, जहां पर तीनों प्रमुख दलों को मिले कुल मतों से भी ज्यादा भाजपा को वोट मिले थे।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद का रुख अभी स्पष्ट नहीं है। यदि वह सपा बसपा गठबंधन के साथ जाता है, तो भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी हो सकती है। लेकिन पिछले चुनाव की तरह यदि रालोद कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव में उतरता है तो भाजपा के लिए राहत की सांस होगी।
लोकसभा चुनाव में एससी वोट पर नजर
लोकसभा चुनाव 2019 में महागठबंधन सहित भाजपा की भी एससी वोट पर नजर होगी। हालांकि पिछले तमाम आंकड़े यदि उठाकर देखें तो विधानसभा चुनाव में जहां एससी वोट बसपा की तरफ होता है तो लोकसभा चुनाव में उसका कुछ वोट बैंक छिटक जाता है। लेकिन पिछले दिनों हुए आरएसएस के राष्ट्रोदय के मिशन और भाजपा की रणनीति इसी एससी वोट बैंक को साधने की है। लेकिन एससी एक्ट को लेकर एक अप्रैल 2018 को हुए बवाल के बाद से एससी भाजपा से छिटका नजर आ रहा है।
इस बार बदली है हवा
लोकसभा चुनाव 2014 पूरी तरह मुजफ्फरनगर दंगे की सोच में डूबा हुआ था। इसके साथ ही तब मोदी लहर चरम पर थी। तब से अब तक इस सोच में बदलाव आया है। जाट बाहुल्य इस बेल्ट में रालोद मुख्य फैक्टर रहा है। यह बात अलग है कि 2014 में मुजफ्फरनगर दंगे की आग में रालोद को भी क्षति हुई थी। लेकिन इन चार सालों में इस तरफ से भरपाई का पूरा प्रयास हुआ है। वहीं 2014 में मुस्लिम मतों का भी बिखराव लगभग हर जगह नजर आया था। लेकिन सपा और बसपा गठबंधन के बाद मुस्लिम मतों का बिखराव होना इस बार मुश्किल नजर आ रहा है। सहारनपुर सीट पर ही मुस्लिम मतोें का बिखराव हो सकता है।
मेरठ सीट पर भी बदले समीकरण
बसपा और सपा का गठबंधन होेने के बाद भाजपा की मजबूत सीट मानी जाने वाली मेरठ हापुड़ लोकसभा सीट का भी समीकरण गड़बड़ा रहा है। इस सीट पर भाजपा लगातार दो चुनावों से जीत हासिल कर रही है, मोदी लहर में हुए पिछले चुनाव में तो भाजपा ने दो लाख से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की थी। इस सीट पर मुस्लिम और अनुसूचित जाति के मतों के जो आंकड़े हैं, वह भाजपा में बेचैनी पैदा करने के लिए काफी हैं।
लोकसभा चुनाव 2009 में भाजपा रालोद के साथ मिलकर मैदान में उतरी थी और भाजपा प्रत्याशी राजेंद्र अग्रवाल ने करीब 57 हजार वोटों से जीत हासिल की थी। दूसरे नंबर पर बसपा और उनसे करीब एक हजार वोट कम पाकर सपा तीसरे नंबर पर रही थी।
लेकिन अगर वोटों का आंकड़ा देखें तो भाजपा प्रत्याशी को जहां 2,32,137 वोट मिले थे, तो सपा और बसपा के दोनों प्रत्याशियों को कुल 3,68,518 वोट मिले थे। जो भाजपा के लिए बड़ा अंतर है। हालांकि लोकसभा 2014 के चुनाव में भाजपा ने यहां एकतरफा जीत हासिल की थी, लेकिन तब और अब के माहौल में बड़ा अंतर आ चुका है।
पिछले चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को 5,32,981 वोट मिले थे, जबकि सपा और बसपा के प्रत्याशियों को कुल 5,12,414 वोट मिले थे। इन दोनों चुनाव में सबसे अहम बात ये रही कि सपा और बसपा दोनों ने ही मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे। बसपा और सपा के मुस्लिम प्रत्याशियों के बीच बंटे मुस्लिम वोटों के बीच 2014 में अनुसूचित जाति का वोट भी कहीं न कहीं कटा था, अन्य वोटों का ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में हुआ था।
इस गठबंधन के बाद जहां मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण गठबंधन के पक्ष में होने की संभावना है तो अनुसूचित जाति का वोट भी भाजपा से कटता नजर आ रहा है। अन्य हिंदू मतों का ध्रुवीकरण पिछले चुनाव की तरह भाजपा के पक्ष में आता नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि रालोद से छिटका जाट फिर से वापस होता नजर आया है।
शहर से लेकर देश तक की ताजा खबरें व वीडियो देखने लिए हमारे इस फेसबुक पेज को लाइक करें
https://www.facebook.com/AuNewsMeerut/