करोड़ों के वारे न्यारे: किताबों की छपाई में मोटी कमाई, असली झेल रहे नुकसान, नकली मालामाल
- 90 प्रतिशत तक मुनाफा होता है छापने से लेकर बेचने और खरीदने में
विस्तार
दलाल करते हैं पूरी सेटिंग
मेरठ सहित पश्चिमी यूपी और आसपास के राज्यों में यह पूरा नेटवर्क सक्रिय कार्य कर रहा है। नकली पुस्तकों के प्रकाशकों के प्रतिनिधि या दलाल जिला और नगर क्षेत्र के पुस्तक विक्रेताओं से संपर्क कर उनसे आर्डर लेते थे।
इसी के साथ स्कूलों का भी कमीशन तय किया जाता है। इसके बाद पुस्तक प्रकाशित होने के बाद बिना किसी रोकटोक के विक्रेताओं की दुकान पर पहुंच जाती है। स्कूल के द्वारा संबंधित पुस्तक विक्रेता का नाम बताकर वहीं से किताबों की खरीदारी की जाती थी।
इस खेल में स्कूल के साथ साठगांठ कर एनसीईआरटी की किताबों के साथ निजी स्कूलों में अन्य प्रकाशकों की पुस्तकें भी लगाई जाती हैं। इस कार्य में भी वही नेटवर्क कार्य करता है और कमीशन और बढ़ जाता है। इस खेल में प्रकाशक से ज्यादा रिटेलर और संबंधित स्कूलों को फायदा होता है।
एनसीईआरटी के नाम पर नकली किताबें छापकर मोटा मुनाफा कमाने वाले तो मालामाल हो रहे हैं। लेकिन नियमों का पालन करने वालों को नुकसान झेलना पड़ रहा है। नकली किताबें सामने आने पर इस कारोबार से जुड़े लोगों में खलबली है।
यह बात सबसे ज्यादा चर्चा में है कि सही काम करने वाले नुकसान झेलते हैं। लॉकडाउन में एनसीईआरटी का पूरा काम बंद था इसलिए एनसीईआरटी के साथ काम करने वाले प्रिंटर्स न किताबें छाप पाए और न काम कर पाए। जबकि नक्कालों ने बंदी में धड़ल्ले से किताबें छापीं और बेची हैं। लॉकडाउन में नकली किताबों का कारोबार खूब फलाफूला है।
एनसीईआरटी स्वयं भेजता है पेपर, मैटर
आशु रस्तोगी कहते हैं कि एनसीईआरटी जिन प्रिंटर्स को प्रिंटिंग का जिम्मा देता है उन्हें एनसीईआरटी के वॉटरमार्क वाला पेपर भेजा जाता है। किताब का मैटर भेजा जाता है। मेल व सीडी में यह मैटर आता है। इसी से किताब छपती है। एनसीईआरटी की असली किताब के हर पन्ने पर एनसीईआरटी का वाटरमार्क होता है यही पहचान है। नकली, असली किताब के दाम, मैटर एक होता है बस कागज का अंतर होता है।
शिकायतों पर नहीं होती सुनवाई
नकली किताबें, पब्लिशर के नाम का दुरुपयोग कर फर्जी किताबें छापने का धंधा खुलेआम हो रहा है। शिकायत हो तो एक्शन नहीं होता। मेरठ प्रकाशक कल्याण संघ के अध्यक्ष मनोज बाटला कहते हैं कि किताब प्रिंटिंग कारोबार में नकली माल करने वालों का राज है। पुलिस को शिकायत के बाद भी सुनवाई नहीं होती।
जिला उद्योग केंद्र देता है अनुमति
प्रिंटिंग कारोबारी बताते हैं कि प्रिंटिंग इकाई के लिए जिला उद्योग केंद्र से अनुमति लेनी होती है। प्रकाशन के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं। लेकिन प्रिंटिंग मशीनें लगाकर छपाई का काम एमएसएमई में आता है इसलिए अनुमति जरूरी है। इकाई संचालन के अनुमति से इतर उद्योग विभाग निगरानी नहीं करता कि क्या छापा जा रहा है। एनसीईआरटी स्वयं निगरानी रखता है कि नकली किताबें तो नहीं छप रहीं हैं एनसीईआरटी ही शिकायत कराता है।
एनसीईआरटी देता है 17 फीसदी छूट
एनसीईआरटी 17 प्रतिशत छूट के साथ हर शहर में अपने वितरक को पुस्तकें उपलब्ध कराती है। इसके बाद यह शहर की छोटी-छोटी दुकानों पर 15 प्रतिशत मुनाफे के साथ पहुंच जाती हैं। नियमानुसार एक पुस्तक को बेचने पर विक्रेता को 15 प्रतिशत का मुनाफा मिलता है। किताबों को एडवांस पेमेंट पर खरीदा जाता है।
इसके विपरीत फर्जी पुस्तक छापने वाले प्रकाशक पुस्तक विक्रेताओं को 40 प्रतिशत तक कमीशन और एक साल का उधार देते हैं। पब्लिशर एसोसिएशन के अध्यक्ष आशु रस्तोगी ने बताया कि इसमें इमानदारी से काम करने वाले रिटेलर पूरी तरफ खत्म हो जाते हैं। इस तरह के कार्यों पर अंकुश लगाया जाना अब आवश्यक हो गया है।