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मेडिकल कॉलेज में मरीजों की सौदेबाजी, मरीजों ब्रेनवॉश, इमरजेंसी पर निजी एंबुलेंस का कब्जा
अमर उजाला ब्यूरों
Updated Wed, 28 Sep 2016 04:13 PM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी चिकित्सा संस्थान मेडिकल कॉलेज में मरीजों की सौदेबाजी हो रही है। इमरजेंसी पर निजी एंबुलेंस सेवा व हॉस्पिटलों का कब्जा है। मरीजों और तीमारदारों का ब्रेनवॉश कर उन्हें कहा जाता है कि यहां सही ट्रीटमेंट नहीं मिलेगा। इसलिए मरीज को किसी दूसरे निजी अस्पताल में ले जाओ। ऐसे में 10 में से 2-4 मरीज दलालों के झांसे में आते हैं और निजी एंबुलेंस के जरिये शिफ्ट होकर प्राइवेट हॉस्पिटल में पहुंच जाते हैं। यह गोरखधंधा तो लंबे समय से चल रहा है। लेकिन करीब तीन साल के दरम्यान इसका दायरा कुछ ज्यादा ही फैलता जा रहा है।
मेडिकल कॉलेज इमरजेंसी में दलाल मरीज के भर्ती होते ही सक्रिय हो जाते हैं। इस खेल में मेडिकल कालेज से जुड़े कुछ स्टाफ से लेकर पुलिस की भूमिका संदिग्ध है। क्योंकि बीते तीन वर्षों में मेडिकल कालेज निजी एंबुलेंस को बाहर निकालने का काम पुलिस का बताता रहा है जबकि मेडिकल पुलिस आज तक इन एंबुलेंस पर कोई कार्रवाई नहीं कर पाई। मंगलवार को दो दलालों के खिलाफ ईएमओ डॉ. नितिन यादव द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के बाद इमरजेंसी में दलालों की मौजूदगी पर पुख्ता मोहर लग गई है। जो सोमवार देर रात मेडिकल कालेज की इमरजेंसी से मरीजों को निजी हॉस्पिटल में भर्ती कराने की कोशिशों में लगे थे। गढ़ रोड से लेकर यूनिवर्सिटी रोड और हापुड़ रोड तक के कई हॉस्पिटलों का पूरा कारोबार इन दलालों के जरिये ही संचालित हो रहा है।
स्टाफ भी दे रहा पूरा साथ
इमरजेंसी में दलाल तभी पहुंचते हैं जब कोई भी नया मरीज भर्ती कराया जाता है। इमरजेंसी का कुछ स्टाफ इन दलालों को तुरंत फोन कर इसकी सूचना दे देता है। अगर दलाल मरीज को इमरजेंसी से ले जाने में सफल हो जाता है तो उस स्टाफ का भी कमीशन तय हो जाता है। इसलिए इमरजेंसी में घूमने वाले दलालों को अधिकांश स्टाफ आने-जाने से नहीं रोकता। मंगलवार को भी जब ईएमओ अचानक से पहुंचे तो दोनों दलाल पकड़े गए थे। बाकी किसी स्टाफ ने इन्हें इमरजेंसी के वार्ड में घूमने से नहीं रोका।
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मोटा कमीशन फिक्स
दलालों को एक मरीज को भर्ती कराने पर मोटा कमीशन मिलता है। अगर कोई ट्रॉमा का केस हैं तो उस पर दलाल को पांच हजार रुपये तक मिल जाते हैं जबकि अन्य तरह के केस में भी दो से तीन हजार रुपये का कमीशन सीधे हॉस्पिटल दलाल को देते हैं। क्योंकि निजी हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद मरीजों की अच्छी खासी जेब काटी जाती है। दो साल पहले भी तत्कालीन एसीएम ने मेडिकल कालेज की पुरानी इमरजेंसी में दलालों को पकड़ा था जिसके बाद इमरजेंसी के बाहर से तीन एंबुलेंस को भी उठवा लिया था। लेकिन उसके बाद भी सिलसिला जारी है।
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मेडिकल कॉलेज इमरजेंसी में दलाल मरीज के भर्ती होते ही सक्रिय हो जाते हैं। इस खेल में मेडिकल कालेज से जुड़े कुछ स्टाफ से लेकर पुलिस की भूमिका संदिग्ध है। क्योंकि बीते तीन वर्षों में मेडिकल कालेज निजी एंबुलेंस को बाहर निकालने का काम पुलिस का बताता रहा है जबकि मेडिकल पुलिस आज तक इन एंबुलेंस पर कोई कार्रवाई नहीं कर पाई। मंगलवार को दो दलालों के खिलाफ ईएमओ डॉ. नितिन यादव द्वारा एफआईआर दर्ज कराने के बाद इमरजेंसी में दलालों की मौजूदगी पर पुख्ता मोहर लग गई है। जो सोमवार देर रात मेडिकल कालेज की इमरजेंसी से मरीजों को निजी हॉस्पिटल में भर्ती कराने की कोशिशों में लगे थे। गढ़ रोड से लेकर यूनिवर्सिटी रोड और हापुड़ रोड तक के कई हॉस्पिटलों का पूरा कारोबार इन दलालों के जरिये ही संचालित हो रहा है।
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स्टाफ भी दे रहा पूरा साथ
इमरजेंसी में दलाल तभी पहुंचते हैं जब कोई भी नया मरीज भर्ती कराया जाता है। इमरजेंसी का कुछ स्टाफ इन दलालों को तुरंत फोन कर इसकी सूचना दे देता है। अगर दलाल मरीज को इमरजेंसी से ले जाने में सफल हो जाता है तो उस स्टाफ का भी कमीशन तय हो जाता है। इसलिए इमरजेंसी में घूमने वाले दलालों को अधिकांश स्टाफ आने-जाने से नहीं रोकता। मंगलवार को भी जब ईएमओ अचानक से पहुंचे तो दोनों दलाल पकड़े गए थे। बाकी किसी स्टाफ ने इन्हें इमरजेंसी के वार्ड में घूमने से नहीं रोका।
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दलालों को एक मरीज को भर्ती कराने पर मोटा कमीशन मिलता है। अगर कोई ट्रॉमा का केस हैं तो उस पर दलाल को पांच हजार रुपये तक मिल जाते हैं जबकि अन्य तरह के केस में भी दो से तीन हजार रुपये का कमीशन सीधे हॉस्पिटल दलाल को देते हैं। क्योंकि निजी हॉस्पिटल में भर्ती होने के बाद मरीजों की अच्छी खासी जेब काटी जाती है। दो साल पहले भी तत्कालीन एसीएम ने मेडिकल कालेज की पुरानी इमरजेंसी में दलालों को पकड़ा था जिसके बाद इमरजेंसी के बाहर से तीन एंबुलेंस को भी उठवा लिया था। लेकिन उसके बाद भी सिलसिला जारी है।