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Meerut News: आंखों में घर की याद, कानों में गूंज रही अपनों की आवाज...जुबान पर भोले का नाम

Sun, 09 Aug 2026 07:18 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sun, 09 Aug 2026 07:18 PM IST
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Longing for home in the eyes, the voices of loved ones echoing in the ears... and the name of Bhole on the lips
दौराला - हाईवे से झांकी वाली कांवड़ लेकर गुजरते कांवड़ियां। स्रोत : संवाद
- पैरों में छाले, शरीर में थकान फिर भी कदम नहीं रुके, कांवड़ियों ने कहा- घर का खाना और परिवार सबसे ज्यादा याद आया
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शरद गुप्ता
दौराला। हरिद्वार से गंगाजल लेकर लौट रहे शिवभक्तों के चेहरे पर थकान साफ दिख रही है। पैरों में छाले हैं, कंधे दर्द से बोझिल हैं और कई दिनों से घर से दूर रहने के कारण मन अपनों को याद कर रहा है। कोई मां और पत्नी के हाथ के खाने को याद कर रहा है तो किसी को पत्नी और बच्चों की चिंता सता रही है। किसी के कानों में बच्चों की आवाज गूंज रही है तो कोई घर में इंतजार कर रहे माता-पिता को याद कर रहा है। मगर इन सबके बीच जुबान पर बोल बम और मन में भोलेनाथ के जलाभिषेक का संकल्प है।
दादरी, सकौती, दौराला और सिवाया टोल प्लाजा तक करीब साढ़े तीन सौ कांवड़ियों से बातचीत में करीब 80 प्रतिशत ने घर और घर के खाने को सबसे ज्यादा याद किया। करीब 70 प्रतिशत कांवड़ियों ने परिवार को याद किया, जबकि 45 प्रतिशत ने आराम की जरूरत महसूस होने की बात कही। कांवड़ियों ने बताया कि रास्ते में सेवा शिविरों में भोजन, पानी और आराम की अच्छी व्यवस्था रही, लेकिन घर और परिवार के साथ मिलने वाला सुकून अलग है। (संवाद)
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बेटी की सबसे ज्यादा आई याद
गाजियाबाद निवासी सोनू पिछले 13 साल से कांवड़ ला रहे हैं। बताया कि यात्रा के दौरान जगह-जगह भंडारों में भोजन मिला। सेवादारों ने बहुत अच्छी सेवा की। इसके बावजूद घर के खाने की याद आती रही। पत्नी के हाथ का बना खाना और परिवार के साथ बैठकर खाना बहुत याद आया। सबसे ज्यादा बेटी की याद आई। फोन पर उनसे बात होती थी तो मन हल्का हो जाता था और आगे बढ़ने की ताकत मिलती थी।
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दो अगस्त को उठाई कांवड़, जलाभिषेक के बाद घर
गाजियाबाद के विजयनगर निवासी शिवम ने बताया कि दो अगस्त को कांवड़ उठाई थी। यात्रा के दौरान घर और परिवार की याद आती रही। कई दिनों से अपनों से दूर हैं, इसलिए अब घर पहुंचने की बेचैनी भी है। मगर पहले संकल्प पूरा करना है। उन्होंने बताया कि 11 अगस्त को जलाभिषेक करने के बाद ही घर लौटेंगे।


कुछ मिनट की फोन पर बात और फिर चल पड़े
हाईवे पर कई जगह कांवड़िये कुछ देर रुककर मोबाइल से घरवालों से बात करते दिखाई दिए। कोई बच्चों से बात कर रहा था तो कोई पत्नी या माता-पिता का हाल पूछ रहा था। कुछ मिनट की बातचीत के बाद चेहरे पर सुकून दिखाई दिया और फिर कांवड़ कंधे पर रखकर आगे बढ़ गए। मुरादनगर निवासी संतोष तिवारी ने कहा कि अपनों की आवाज सुनना ही थकान में सबसे बड़ा सहारा रहा।



शिविर में आराम मिला, लेकिन घर की नींद याद आई
हाईवे से गुजर रहे कांवड़ियों ने बातचीत में बताया कि सेवा शिविरों में खाने-पीने और आराम की अच्छी व्यवस्था रही। दिनभर पैदल चलने के बाद कुछ घंटे सोने का मौका मिला तो शरीर को राहत मिली। मगर घर में परिवार के बीच मिलने वाली नींद और सुकून अलग है। कहा, यहां भोजन से पेट भर जाता है, लेकिन घर का खाना मन भर देता है। घर की याद आंखों में है, अपनों की आवाज कानों में और भोलेनाथ का नाम जुबान पर। कांवड़ियों के कदमों में दर्द जरूर है, लेकिन मन में एक ही इच्छा है, गंगाजल भोलेनाथ को चढ़े और फिर घर की चौखट पर लौटकर अपनों से मिलें।

दौराला - हाईवे से झांकी वाली कांवड़ लेकर गुजरते कांवड़ियां। स्रोत : संवाद

दौराला - हाईवे से झांकी वाली कांवड़ लेकर गुजरते कांवड़ियां। स्रोत : संवाद

दौराला - हाईवे से झांकी वाली कांवड़ लेकर गुजरते कांवड़ियां। स्रोत : संवाद

दौराला - हाईवे से झांकी वाली कांवड़ लेकर गुजरते कांवड़ियां। स्रोत : संवाद

दौराला - हाईवे से झांकी वाली कांवड़ लेकर गुजरते कांवड़ियां। स्रोत : संवाद

दौराला - हाईवे से झांकी वाली कांवड़ लेकर गुजरते कांवड़ियां। स्रोत : संवाद

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