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सियासत के रंग निराले: पहले बनवाया सीएम, फिर चौधरी चरण सिंह के सामने चुनाव लड़े रामचंद्र विकल
Thu, 14 Mar 2019 01:25 PM IST
Dimple Sirohi
मदन बालियान, अमर उजाला, मेरठ
मदन बालियान, अमर उजाला, मेरठ
Published by: Dimple Sirohi
Updated Thu, 14 Mar 2019 01:25 PM IST
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रामचंद्र विकल व चौधरी चरण सिंह
सियासत के रंग भी निराले होते हैं। कुछ फैसले इतिहास बनते हैं और जब-जब लोकतंत्र का मेला लगता है, इनका जिक्र जरूर होता है। ऐसा ही मुकाबला रहा किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह और गुर्जर नेता रामचंद्र विकल के बीच।
एक समय साल 1967 में बड़े चौधरी यानी चौधरी चरण सिंह को यूपी का सीएम बनाने का प्रस्ताव रामचंद्र विकल ने ही रखा था। लेकिन इंदिरा गांधी के कहने पर गुर्जर नेता रामचंद्र विकल बागपत से चुनाव लड़ने पहुंचे तो चौ. चरण सिंह मुजफ्फरनगर से चुनाव मैदान में उतर गए। बागपत में एक बार रामचंद्र विकल जीते तो दो बार चौ. चरण सिंह।
तब चौधरी चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बीच चलता था शह-मात का खेल
साल1967 में चौ. चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बीच मनमुटाव बढ़ गया। सीबी गुप्ता सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए चौ. चरण सिंह से कई विभाग वापस लिए गए तो उन्होंने 17 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी और सरकार गिर गई। इसके बाद चौ. चरण सिंह की अगुवाई में सरकार बनाने की कवायद शुरू हुई।
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एक समय साल 1967 में बड़े चौधरी यानी चौधरी चरण सिंह को यूपी का सीएम बनाने का प्रस्ताव रामचंद्र विकल ने ही रखा था। लेकिन इंदिरा गांधी के कहने पर गुर्जर नेता रामचंद्र विकल बागपत से चुनाव लड़ने पहुंचे तो चौ. चरण सिंह मुजफ्फरनगर से चुनाव मैदान में उतर गए। बागपत में एक बार रामचंद्र विकल जीते तो दो बार चौ. चरण सिंह।
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तब चौधरी चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बीच चलता था शह-मात का खेल
साल1967 में चौ. चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बीच मनमुटाव बढ़ गया। सीबी गुप्ता सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए चौ. चरण सिंह से कई विभाग वापस लिए गए तो उन्होंने 17 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़ दी और सरकार गिर गई। इसके बाद चौ. चरण सिंह की अगुवाई में सरकार बनाने की कवायद शुरू हुई।
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मुख्यमंत्री के नाम पर जब चर्चा शुरू हुई तो गुर्जर नेता रामचंद्र विकल और चौ. चरण सिंह के नाम सामने आए। कयास लगाए ही जा रहे थे कि रामचंद्र विकल ने खुद ही चौ. चरण सिंह के नाम का प्रस्ताव रख दिया। बाद में चौधरी चरण सिंह ने विकल को उप मुख्यमंत्री बनाया।
साल 1971 का लोकसभा चुनाव आते-आते रामचंद्र विकल कांग्रेस में वापस चले गए। चौ. चरण सिंह ने नई पार्टी बीकेडी का गठन किया और पहला लोकसभा चुनाव बागपत से लड़ने वाले थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यहां पर बड़ा सियासी दांव चला और रामचंद्र विकल को बागपत से कांग्रेस का टिकट दिया।
बीकेडी के संसदीय बोर्ड ने विकल के सामने तब के सांसद रघुवीर सिंह शास्त्री को चुनाव लड़ाने कहा। इसके बाद चौधरी चरण सिंह मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ने चले गए। विकल बागपत में जीतकर लोकसभा पहुंचे। साल 1977 और 1980 में चौ. चरण सिंह ने बागपत सीट से चुनाव लड़ा और रामचंद्र विकल को हराया।
साल 1971 का लोकसभा चुनाव आते-आते रामचंद्र विकल कांग्रेस में वापस चले गए। चौ. चरण सिंह ने नई पार्टी बीकेडी का गठन किया और पहला लोकसभा चुनाव बागपत से लड़ने वाले थे। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने यहां पर बड़ा सियासी दांव चला और रामचंद्र विकल को बागपत से कांग्रेस का टिकट दिया।
बीकेडी के संसदीय बोर्ड ने विकल के सामने तब के सांसद रघुवीर सिंह शास्त्री को चुनाव लड़ाने कहा। इसके बाद चौधरी चरण सिंह मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ने चले गए। विकल बागपत में जीतकर लोकसभा पहुंचे। साल 1977 और 1980 में चौ. चरण सिंह ने बागपत सीट से चुनाव लड़ा और रामचंद्र विकल को हराया।
रामचंद्र विकल का परिचय
दादरी के रहने वाले रामचंद्र विकल की पहचान देश के बड़े गुर्जर नेताओं में होती है। रामचंद्र विकल का दादरी तहसील के बसंतपुर नया गांव में आठ नवंबर 1916 को जन्म हुआ। वह तीनों सदनों के सदस्य रहे। पं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ काम किया। 26 जून 2011 को उनका निधन हुआ।
इंदिरा गांधी खुद उतरीं थीं चुनाव के प्रचार में
चौधरी चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बीच सियासी मनमुटाव था। रामचंद्र विकल को टिकट देने के बाद खुद इंदिरा गांधी प्रचार में उतरीं और बागपत में सभाएं कीं। लोगों से मुलाकात की।
दादरी के रहने वाले रामचंद्र विकल की पहचान देश के बड़े गुर्जर नेताओं में होती है। रामचंद्र विकल का दादरी तहसील के बसंतपुर नया गांव में आठ नवंबर 1916 को जन्म हुआ। वह तीनों सदनों के सदस्य रहे। पं. जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ काम किया। 26 जून 2011 को उनका निधन हुआ।
इंदिरा गांधी खुद उतरीं थीं चुनाव के प्रचार में
चौधरी चरण सिंह और इंदिरा गांधी के बीच सियासी मनमुटाव था। रामचंद्र विकल को टिकट देने के बाद खुद इंदिरा गांधी प्रचार में उतरीं और बागपत में सभाएं कीं। लोगों से मुलाकात की।