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Meerut News: 1857 में सरधना तहसील पर क्रांतिकारियों ने किया था कब्जा
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- इसके जवाब में अकलपुरा गांव को अंग्रेजों ने तोपों से उड़ा दिया था
शाह आलम त्यागी
सरधना। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र होते ही मेरठ छावनी और शहर का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज दिखाई देता है, लेकिन ग्रामीण मेरठ की यह ज्वाला इतिहास के पन्नों में दब गई, जिसने महीनों तक अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाए रखी।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मेरठ में 10 मई को क्रांति का बिगुल बजने के अगले ही दिन सरधना क्षेत्र में बड़ा घटनाक्रम सामने आया। बाबा नरपत सिंह के नेतृत्व में सरधना चौबीसी के राजपूतों और रांगड़ों के विशाल जत्थों ने सरधना तहसील पर धावा बोल दिया। क्रांतिकारियों ने तहसील परिसर को चारों ओर से घेरकर कुछ ही समय में तहसील पर कब्जा कर लिया। इसके बाद क्रांतिकारियों ने सरधना तहसील को अंग्रेजी शासन से मुक्त घोषित कर दिया। इस घटना ने आसपास के क्षेत्रों में भी विद्रोह की लहर को और तेज कर दिया। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार इस घटना ने सरधना चौबीसी की संगठित शक्ति और अंग्रेजी हुकूमत के प्रति बढ़ते असंतोष को स्पष्ट रूप से सामने ला दिया था। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग इस आंदोलन से जुड़े और अंग्रेजों के खिलाफ माहौल और अधिक उग्र होता चला गया। हालांकि बाद में अंग्रेजी सेना ने कड़े दमन के जरिए स्थिति पर नियंत्रण पाने का प्रयास किया। इस घटना को 1857 की क्रांति में सरधना क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
रिटायर्ड मेजर हिमांशु सिंह ने बताया कि बाबा नरपत सिंह के नेतृत्व में हुई यह कार्रवाई आज भी स्थानीय इतिहास में साहस और बलिदान की मिसाल के रूप में याद की जाती है। 10 और 11 मई के सैनिक विद्रोह के बाद मेरठ शहर अपेक्षाकृत शांत हो गया था। वहीं ग्रामीण इलाकों में सितंबर तक क्रांति की आग धधकती रही। पुराने मेरठ जिले के बागपत, सरधना, पिलखुवा और आसपास के क्षेत्रों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई। सरधना के अकलपुरा, बागपत के बसौद, सिरसली, पांचली खुर्द, सीकरी और बिजरोल जैसे गांव अंग्रेजों के दमन का शिकार हुए। इन गांवों में बाबा शाहमल, बाबा नरपत सिंह, वजीर खान, मेहताब और अचल सिंह जैसे क्रांतिकारियों के नेतृत्व में ग्रामीणों ने अंग्रेजी फौज से सीधी टक्कर ली और हंसते-हंसते शहादत दी।
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इसी क्रांति की एक ऐसी गाथा 22 जुलाई 1857 को सरधना क्षेत्र के राजपूत चौबीसी गांव अकलपुरा में लिखी गई, जिसे स्थानीय लोग आज भी गर्व और पीड़ा के साथ याद करते हैं। अंग्रेजों ने पूरे गांव को घेरकर तोपों से उड़ा दिया था। यह घटना किसी जलियांवाला बाग कांड से कम भयावह नहीं थी लेकिन इतिहास की मुख्यधारा में इसे वह स्थान नहीं मिल पाया।स्थानीय लोगों के अनुसार चौबीसी क्षेत्र के गांव कालिंदी से संबंध रखने वाले बाबा नरपत सिंह की वीरता की कहानियां पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं।
शोध और अंग्रेजी दस्तावेजों से खुली बलिदान की परतें
इतिहासकार डॉ. देवेंद्र सिंह, डॉ. केके शर्मा और डॉ. अमित पाठक के शोध तथा अंग्रेजी दस्तावेजों के अध्ययन से इस बलिदान की परतें खुलनी शुरू हुईं। अंग्रेज अधिकारियों की रिपोर्टों में जिस गढ़ी का जिक्र था, वह दरअसल बाबा नरपत सिंह की गढ़ी थी। अंग्रेज अधिकारियों ने आसपास के गांवों में लगान वसूली का आदेश भेजा लेकिन बाबा नरपत सिंह और उनके साथियों ने अकलपुरा में डेरा डालकर अंग्रेजी शासन की वैधता को खुली चुनौती दे दी। इसके बाद 22 जुलाई की सुबह सूरज निकलने से पहले अंग्रेजी फौज ने अकलपुरा की ओर कूच कर दिया। गांव को चारों ओर से घेर लिया गया। ग्रामीण पहले ही महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर भेज चुके थे और मुकाबले की तैयारी कर चुके थे। अंग्रेजों ने पहले तोपों से हमला किया। फिर रॉयल राइफल के सैनिक गांव में घुस गए। इसके बाद अंधाधुंध कत्लेआम शुरू हुआ। काफी देर तक चली इस भीषण लड़ाई में बाबा नरपत सिंह सहित अनगिनत क्रांतिकारी शहीद हो गए। गांव तबाह हो गया लेकिन ग्रामीणों ने अंग्रेजी सत्ता के सामने घुटने नहीं टेके। संवाद
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शाह आलम त्यागी
सरधना। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र होते ही मेरठ छावनी और शहर का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज दिखाई देता है, लेकिन ग्रामीण मेरठ की यह ज्वाला इतिहास के पन्नों में दब गई, जिसने महीनों तक अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ाए रखी।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मेरठ में 10 मई को क्रांति का बिगुल बजने के अगले ही दिन सरधना क्षेत्र में बड़ा घटनाक्रम सामने आया। बाबा नरपत सिंह के नेतृत्व में सरधना चौबीसी के राजपूतों और रांगड़ों के विशाल जत्थों ने सरधना तहसील पर धावा बोल दिया। क्रांतिकारियों ने तहसील परिसर को चारों ओर से घेरकर कुछ ही समय में तहसील पर कब्जा कर लिया। इसके बाद क्रांतिकारियों ने सरधना तहसील को अंग्रेजी शासन से मुक्त घोषित कर दिया। इस घटना ने आसपास के क्षेत्रों में भी विद्रोह की लहर को और तेज कर दिया। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार इस घटना ने सरधना चौबीसी की संगठित शक्ति और अंग्रेजी हुकूमत के प्रति बढ़ते असंतोष को स्पष्ट रूप से सामने ला दिया था। ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लोग इस आंदोलन से जुड़े और अंग्रेजों के खिलाफ माहौल और अधिक उग्र होता चला गया। हालांकि बाद में अंग्रेजी सेना ने कड़े दमन के जरिए स्थिति पर नियंत्रण पाने का प्रयास किया। इस घटना को 1857 की क्रांति में सरधना क्षेत्र की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
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रिटायर्ड मेजर हिमांशु सिंह ने बताया कि बाबा नरपत सिंह के नेतृत्व में हुई यह कार्रवाई आज भी स्थानीय इतिहास में साहस और बलिदान की मिसाल के रूप में याद की जाती है। 10 और 11 मई के सैनिक विद्रोह के बाद मेरठ शहर अपेक्षाकृत शांत हो गया था। वहीं ग्रामीण इलाकों में सितंबर तक क्रांति की आग धधकती रही। पुराने मेरठ जिले के बागपत, सरधना, पिलखुवा और आसपास के क्षेत्रों ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई। सरधना के अकलपुरा, बागपत के बसौद, सिरसली, पांचली खुर्द, सीकरी और बिजरोल जैसे गांव अंग्रेजों के दमन का शिकार हुए। इन गांवों में बाबा शाहमल, बाबा नरपत सिंह, वजीर खान, मेहताब और अचल सिंह जैसे क्रांतिकारियों के नेतृत्व में ग्रामीणों ने अंग्रेजी फौज से सीधी टक्कर ली और हंसते-हंसते शहादत दी।
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इसी क्रांति की एक ऐसी गाथा 22 जुलाई 1857 को सरधना क्षेत्र के राजपूत चौबीसी गांव अकलपुरा में लिखी गई, जिसे स्थानीय लोग आज भी गर्व और पीड़ा के साथ याद करते हैं। अंग्रेजों ने पूरे गांव को घेरकर तोपों से उड़ा दिया था। यह घटना किसी जलियांवाला बाग कांड से कम भयावह नहीं थी लेकिन इतिहास की मुख्यधारा में इसे वह स्थान नहीं मिल पाया।स्थानीय लोगों के अनुसार चौबीसी क्षेत्र के गांव कालिंदी से संबंध रखने वाले बाबा नरपत सिंह की वीरता की कहानियां पीढ़ियों से सुनाई जाती रही हैं।
शोध और अंग्रेजी दस्तावेजों से खुली बलिदान की परतें
इतिहासकार डॉ. देवेंद्र सिंह, डॉ. केके शर्मा और डॉ. अमित पाठक के शोध तथा अंग्रेजी दस्तावेजों के अध्ययन से इस बलिदान की परतें खुलनी शुरू हुईं। अंग्रेज अधिकारियों की रिपोर्टों में जिस गढ़ी का जिक्र था, वह दरअसल बाबा नरपत सिंह की गढ़ी थी। अंग्रेज अधिकारियों ने आसपास के गांवों में लगान वसूली का आदेश भेजा लेकिन बाबा नरपत सिंह और उनके साथियों ने अकलपुरा में डेरा डालकर अंग्रेजी शासन की वैधता को खुली चुनौती दे दी। इसके बाद 22 जुलाई की सुबह सूरज निकलने से पहले अंग्रेजी फौज ने अकलपुरा की ओर कूच कर दिया। गांव को चारों ओर से घेर लिया गया। ग्रामीण पहले ही महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर भेज चुके थे और मुकाबले की तैयारी कर चुके थे। अंग्रेजों ने पहले तोपों से हमला किया। फिर रॉयल राइफल के सैनिक गांव में घुस गए। इसके बाद अंधाधुंध कत्लेआम शुरू हुआ। काफी देर तक चली इस भीषण लड़ाई में बाबा नरपत सिंह सहित अनगिनत क्रांतिकारी शहीद हो गए। गांव तबाह हो गया लेकिन ग्रामीणों ने अंग्रेजी सत्ता के सामने घुटने नहीं टेके। संवाद