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इंसानियत के रहनुमा थे इमाम हुसैन, लोग अलग-अलग तरीकों से करते हैं शहादत को याद
Fri, 06 Sep 2019 02:27 AM IST
मेरठ ब्यूरो
मोहम्मद शाह आलम, अमर उजाला, मेरठ
मोहम्मद शाह आलम, अमर उजाला, मेरठ
Published by: मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 06 Sep 2019 02:27 AM IST
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मवाना में हजरत अली असगर का झूला निकालते सोगवार
- फोटो : अमर उजाला
मोहर्रम नेकी और कुर्बानी का पैगाम देता है। इस्लाम को मानने वाले विभिन्न समुदाय के लोग अलग-अलग तरीकों से इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं। जो कि दूसरों की खिदमत एवं भलाई करते हुए बुराई के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हो गए। मोहर्रम त्योहार नहीं है जिसे मनाया जाए। इस महीने में चाहिए कि हम उस खुदा की ज्यादा से ज्यादा इबादत करें।
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मोहर्रम मुस्लिम कलेंडर के अनुसार पहला महीना है। 1430 साल पहले इसी महीने की दस तारीख़ को पैगम्बर हजरत मौहम्मद (स.अ.व.) के नवासे हजरत इमाम हुसैन को यजीद की फौज ने तीन दिन भूखा-प्यासा रख शहीद कर दिया था। इसीलिए इस महीने की खास अहमियत है। हजरत इमाम हुसैन ने सच्चाई की खातिर अपनी और अपने बच्चों की कुर्बानी को अहमियत दी। जब तक दुनिया का मुकाम चलता रहेगा तब तक हजरत इमाम हुसैन का नाम बाकी रहेगा। मौलाना यूसुफ कासमी ने हदीस के हवाले से बताया कि 680 ईसवीं में माविया के मरने के बाद उसका बेटा यजीद शाम के तख्त पर बादशाह बनकर बैठा। वह बहुत ही जालिम था। यजीद वह सभी काम करता था जो कि इस्लाम मजहब़ के अनुसार हराम थे। यजीद ने बादशाह बनते ही इमाम हुसैन के सामने अपनी फर्माबरदारी करने का सवाल रखा। मगर हजरत हुसैन ने साफ इनकार कर दिया। यजीद ने अपने वजीर को खत लिखा कि यदि हुसैन मेरी फर्माबरदारी ने करें तो उनका सिर कलम कर दो। जिसके चलते हजरत इमाम हुसैन ने मदीना छोड़ दिया और हज करने के इरादे मक्का पहुंचे, मगर वहां भी हाजियों के रूप धारण करते हुए यजीद के सिपाही पहुंचे। जो कि काबे मेें ही हजरत इमाम हुसैन का कत्ल कर देना चाहते थे। हजरत इमाम हुसैन ने काबे शरीफ की अहमियत का ख्याल करते हुए मक्का से हज के एक दिन पहले ही वहां से आगे की ओर रवाना हो गए। हजरत इमाम हुसैन का काफिला मोहर्रम की दो तारीख को कर्बला पहुंचा। वहां यजीद की फौज ने इमाम हुसैन को घेर लिया। हजरत इमाम हुसैन के साथ काफिले में औरतें और बच्चे भी थे। जिनमें छ: महीने का बच्चा अली असगर और 90 साल के हबीब इब्रे मजाहिर भी थे, जो कुल 72 आदमी थे। जबकि यजीद की फौज में हजारों आदमी थे। जब हजरत इमाम हुसैन करबला में जाकर रुके तो अपने खेमे नहरे फुरात के किनारे लगा लिये, मगर यजीदी फौज ने वहां से खेमे का हटवा दिये। यजीदी फौज ने सातवीं मोहर्रम से हजरत हुसैन और उनके परिवार का पानी बंद कर दिया, लेकिन फिर भी हजरत इमाम हुसैन ने यजीद की फर्माबरदारी कुबूल नहीं की। मोहर्रम की दसवीं तारीख की सुबह से हजरत इमाम हुसैन के सथियों की शहादत होने लगी। दोपहर तक हजरत इमाम हुसैन के बेटे, भतीजे, भांजे एवं दोस्त शहीद हो चुके थे। सिर्फ छ: महीने के अली असगर ही बचे थे। यजीदी फौज ने उसका भी कत्ल कर दिया। मौलाना साबिर ने बताया कि हजरत इमाम हुसैन ने इस्लाम को खून देकर सींचा है। वहीं, वो मजहब है जिसको यजीद मिटा देना चाहता था। वहीं, हजरत इमाम हुसैन ने तीरों की बौछारों में भी नमाज कायम रखी और यादे इलाही में मशगूल रहे। मोहर्रम की दसवीं तारीख जिसको आशूरा कहते हैं यह मोहर्रम की पहली कड़ी है दूसरी चेहल्लुम। तीसरी कड़ी चुप ताजिया है। हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी हर कोई मानता है। जो कि हमें बुराई से लड़ने की तालीम देती है।
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