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अज्ञानता ही अशांति का कारण : चिन्मयानंद बापू

Sun, 26 Oct 2025 10:18 PM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ Updated Sun, 26 Oct 2025 10:18 PM IST
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Ignorance is the cause of unrest: Chinmayanand Bapu
सदर भैंसाली ग्राउंड में श्रीमद्भागवत कथा करते हुए बापू ने कहा श्रद्धा के साथ कथा में आना चाहिए
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माई सिटी रिपोर्टर

मेरठ। अंतरराष्ट्रीय कथा वाचक और विश्व कल्याण मिशन ट्रस्ट के संस्थापक चिन्मयानंद बाबू ने कहा कि जीवन में अशांति का कारण अज्ञान है। किताबों से शब्दों का ज्ञान मिलता है। अनुभव का ज्ञान कथा और संतों के सान्निध्य से प्राप्त होता है। संतों का मार्गदर्शन प्रकाश की तरह भ्रम को दूर करता है। शरीर को सुख-दुख हो सकता है। आत्मा सदा अछूती ही रहती है। सत्य के रहस्य को जानने के लिए श्रद्धा के साथ कथा में आना जरूरी है। अज्ञानता ही भ्रम का कारण है।
सदर भैंसाली ग्राउंड में चल रही श्रीमद्भागवत कथा करते हुए उन्होंने यह बात कही। उन्होंने कहा कि भागवत कथा सुनते हुए श्रद्धा के साथ ज्ञान प्राप्त कर लें तो अज्ञान का अंधेरा खत्म हो जाएगा। उन्होंने कहा कि मनुष्य की मूल आवश्यकताएं रोटी, कपड़ा और मकान हैं। जब मनुष्य इसको प्राप्त कर लेता है तो इसके बाद औरों के अहित में लग जाता है। समाज हमें मान सम्मान देता है तो हमें भी उसे देने के लिए विचार करना चाहिए। दान ही मनुष्य जीवन को सार्थक करता है। अगर हम किसी के प्रति गलत विचार रखेंगे तो उसका परिणाम हमें ही भुगतना पड़ेगा। इस दौरान व्यास पूजन और अन्य धार्मिक क्रियाएं भी संपूर्ण की गई।
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- कर्मों से होता है वर्ण का निर्धारण
- बापू ने वर्ण व्यवस्था पर बोलते हुए कहा कि भगवान पिछले जन्मों के गुण और कर्मों के आधार पर वर्ण तय करते हैं। सोशल मीडिया पर ब्राह्मण विरोधी प्रचार करने वालों को काले कौवे बताते हुए उन्होंने कहा कि यह भगवान के लेटे हुए स्वरूप का गलत अर्थ निकाला जाता है। वर्ण का निर्धारण मुख, भुजा, उदर या चरण से नहीं बल्कि गुण और कर्मों से होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि आज भी जयचंद जैसे लोग देश, कार्यालय, घर को तोड़ने की साजिश रच रहे हैं। उनसे सावधान रहें।
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..दुख सुख हमारे कर्मों का फल

..चिन्मयानंद बापू ने कहा कि संसार में कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है। कोई तन से दुखी है तो कोई मन से है। दुख और सुख हमारे कर्मों का फल हैं। भगवान को दोष देना व्यर्थ है। परमात्मा हमेशा मंगलकारी है। संतान हो या न हो दोनों ही स्थिति में लोग दुखी हैं। सच्चा सुख एकांत में है। भगवान के सान्निध्य में आकर सब सुखी हो जाते हैं। उन्होंने कमल के समान संसार में रहने की सलाह दी। जो पानी में रहकर भी उससे अछूता रहता है। कहा कि संसार में कोई भी स्थायी रूप से अपना नहीं है। जो हम अपना मानते हैं वह मोह का भ्रम है। परमात्मा ही साये की तरह हमेशा हमारे साथ रहता है। सत्कर्म और मौन रहकर भगवान की कृपा प्राप्त की जा सकती है। नारद जी और संतकुमार के प्रसंग के विषय में उन्होंने कहा कि कथा से पापी आत्मा भी मोक्ष प्राप्त कर सकती है।
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