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#हिंदीहैंहम: हिंदी की सेविका थीं शैल रस्तोगी... अपनी कलम से रचा 'इतिहास'

Tue, 25 Aug 2020 04:01 PM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Tue, 25 Aug 2020 04:01 PM IST
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Hindi Hai Hum Campaign: Dr. Shail Rastogi created history with her pen in Hindi
स्वर्गीय डॉ. शैल रस्तोगी - फोटो : अमर उजाला

मेरठ में स्व. डॉ. शैल रस्तोगी ने हिंदी की सेविका बनकर काम किया। अपनी साधना के बल पर उन्होंने हर विधा में अपनी छाप छोड़ी। 34 वर्ष तक हिंदी में शिक्षण कर उन्होंने युवाओं को मातृभाषा का महत्व बताया। एकांकी, नाटक, काव्य और लघुकथाएं लिखकर हिंदी साहित्य में स्त्री प्रधानता की नई रेखा खींच दी।

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डॉ. शैल की कलम ने नारी चेतना और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए हिंदी को हथियार बनाया। वे सास-बहू के रिश्ते से लेकर जंग लगे दर्पण लिखतीं। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए डॉ. शैल का समर्पण हिमालय सा अटल था। स्वयं चलने में असमर्थ हुईं, मगर अपनी कलम को कमजोर नहीं होने दिया। हिंदी चिंतन, हिंदी लेखन उनका जीवन था। 
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साहित्य प्रेमी कहते हैं कि हिंदी उनकी पूंजी थी। हिंदी प्रेम रूपी उनके पूंजी भंडार से आशीर्वाद का प्रसाद हर किसी को मिलता। डॉ. शैल के पति स्व. वीरेंद्र स्वरूप रस्तोगी थे। बेटा प्रो. वकुल रस्तोगी मेरठ कॉलेज में हैं। बहू डॉ. बबीता रस्तोगी कनोहर लाल इंटर कॉलेज में शिक्षिका हैं। बेटी डॉ. पूनम मित्तल कनोहर लाल डिग्री कॉलेज में हैं। पूरा परिवार शास्त्रीनगर में रहता है।
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पाठ्यक्रम में शामिल हुईं रचनाएं
डॉ. शैल के बेटे प्रो. वकुल रस्तोगी बताते हैं कि उस समय महिलाओं के लिए माहौल बहुत संकुचित था। उनकी शिक्षा के द्वार धीरे-धीरे खुल रहे थे, उस दौर में मां ने साहित्य सृजन किया। उनकी एकांकी, कविताएं, लघु कथाएं महाराष्ट्र बोर्ड के पाठ्यक्रम में शामिल हुईं। पिताजी उनका पूरा साथ देते थे।

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परिवर्तन के लिए लिखा 
कवि डॉ. सुमनेश सुमन कहते हैं कि स्व. डॉ. शैल रस्तोगी की कविताएं, एकांकी या कहानियां जो भी हो समाज में परिवर्तन की मांग करते थे। लेखन का केंद्र नारी सम्मान और उनका उत्थान करना था। वह सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करने वाली थीं। 

डॉ. शैल रस्तोगी का परिचय
एक सितंबर 1927 को जन्मीं डॉ. शैल रस्तोगी ने आगरा विवि से एमए के बाद बीएचयू से पीएचडी की। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में पीएचडी की। आरजी पीजी कॉलेज में हिंदी विभाग में 34 वर्ष अध्यापन किया। 21 शोधार्थी को पीएचडी कराई। इनके स्वयं के जीवन पर पीएचडी हो चुकी है। पराग, जंग लगे दर्पण, प्रतिबिंब तुम, मन हुए कांच के, धूप लिखे आखर प्रमुख काव्य संग्रह हैं। एकांकी में एक जिंदगी बंजारा को उप्र राज्य पुरस्कार से नवाजा गया। बिना रंगों के इंद्रधनुष, सावधान, सासू जी आलोचना है। भूषण व उनका काव्य, प्रेमचंद और उनका गोदान भी इनकी चर्चित कृतियां हैं। निबंध, लेख, कहानी, काव्य संग्रह, लघुकथाएं, नाटक व एकांकी पर 100 से अधिक पुस्तकें व रचनाएं प्रकाशित हुईं। हिंदुस्तान में वह हाइकु की जनक मानी जाती हैं।

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