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मरीजों की भरमार, सरकारी अस्पताल बीमार, दवाइयां उधार  

Thu, 27 Apr 2017 12:10 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ Updated Thu, 27 Apr 2017 12:10 PM IST
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govrment hospital sick, patients increased
फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो

यहां के दोनों मुख्य सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भरमार है। लेकिन ये अस्पताल खुद ही बीमार हैं। न तो दवाइयां हैं और न ही इलाज के पुख्ता संसाधन। जो हैं भी, उनका कोई पुरसाहाल नहीं है। आलम यह है कि मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल में उधार की दवाइयों से मरीजों का इलाज किया जा रहा है। लेकिन पुराना भुगतान करने का बजट ही नहीं है। इन दोनों अस्पतालों में सालाना करीब 13 लाख मरीज पहुंचते हैं। मरीज हलकान हो रहे हैं और दोनों अस्पतालों के प्रबंधन इलाज की इस बिगड़ी व्यवस्था के लिए कम बजट और ज्यादा मरीजों का रोना रो रहे हैं। 

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मेडिकल कॉलेज की सूरत
मेडिकल कॉलेज को 1040 बेड से बढ़ाकर 1200 बेड का किया गया है। यहां सालाना करीब सात लाख मरीज आते हैं। पहले यहां चार करोड़ रुपये बजट आता था। जिसे कई साल पहले बढ़ाकर छह करोड़ किया गया था। लेकिन अब 15 करोड़ की डिमांड की जा रही है। हालात ऐसे हैं कि जो संसाधन मेडिकल कॉलेज को उपलब्ध हैं, उनका तक रखरखाव नहीं है। अक्सर दवाइयों के अभाव और तीमारदारों के हंगामे इसकी सुर्खियां बनते रहते हैं। मेडिकल कॉलेज पर पिछले वित्तीय वर्ष दवाओं का करीब ढाई करोड़ रुपये बकाया है।
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जिला अस्पताल का हाल
जिला अस्पताल 250 बेड का बढ़ाकर 300 बेड का किया गया है। यहां भी सालाना करीब छह लाख मरीज पहुंचते हैं। यहां तमाम तरह की दवाइयों के लिए मरीज और डॉक्टर रोना रोते रहते हैं। यहां दवाओं के 50 लाख रुपये बकाया हैं। बजट और स्टाफ के अभाव में आईसीयू भवन तक चालू नहीं हो पाया है। उस पर ताला जड़ा हुआ है। लोग उसके बाहर सोते रहते हैं। यह कब शुरू हो पाएगा, इसका जवाब भी जिला अस्पताल प्रबंधन के पास नहीं है। यहां तीन दिन पहले झुलसी हालत में पहुंची महिला का इलाज करने से मना कर दिया गया था। 
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भुगतती तो जनता ही है
मेडिकल में दवाएं तो छोड़िये, ग्लब्स तक नहीं हैं। वहीं जिला अस्पताल में दवाओं के साथ एंटी रेबीज वैक्सीन तक नहीं है। उसकी कमी का आलम यह है कि यहां रोज हंगामा होने पर पुलिस बुलानी पड़ती है, ताकि इंजेक्शन लगाए जा सकें। देहात से आने वाले ऐसे मरीजों के नोटिस तक चस्पा करने पड़ रहे हैं। इस अव्यवस्था का शिकार आखिरकार जनता ही होती है। अस्पताल प्रबंधन के अनुसार वे उधार दवाईयां सरकार द्वारा अधिकृत एजेंसी से खरीदते हैं। यहां दवाओं की शार्टेज होने या उधार न मिलने पर निजी दुकानों से नगद दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। हाल ही में एंटी रैबीज इंजेक्शन नगद खरीदे गए थे।

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