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Meerut News: संस्कारों के साथ जीवन जीने का संदेश दिया
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आर्य समाज साकेत में आयोजित कार्यक्रम।......स्रोत स्वम्
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। आर्य समाज साकेत की ओर से 57वें वार्षिकोत्सव एवं वेद प्रचार सप्ताह कार्यक्रम में यज्ञ के बाद वेद मंत्रों के साथ आहुतियां दी गईं। स्वामी शरणानंद परिव्राजक ने वेद मंत्रों के विषय में विस्तार से बताया। यजमान सविता, नवीन, रतनेश, ब्रजेश कुशवाह, सेजल रहीं। यजमानों को ऋषि दयानंद का चित्र और वैदिक साहित्य भेंट किया गया। कार्यक्रम में श्रेष्ठ संस्कारों के साथ जीवन जीने का संदेश दिया गया।
यज्ञ के बाद भजन संध्या हुई। योगेश दत्त आर्य ने ईश्वर स्तुति के मधुर भजन सुनाए। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रकाश डाला और वेद स्वाध्याय एवं ऋषि-मुनियों के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना कर समाज सुधार का बीड़ा उठाया। उनके विचारों से प्रभावित होकर अनेक क्रांतिकारियों ने देश के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी और बलिदान भी दिया।
मुख्य वक्ता स्वामी शरणानंद परिव्राजक ने महर्षि दयानंद के दर्शन को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा उत्तम सड़कें, कारखाने, सुख-सुविधाएं हों लेकिन मनुष्य बिगड़ा हो तो सब नरक बन जाएगा। उन्होंने संस्कारों की महत्ता पर जोर दिया। महर्षि दयानंद ने 16 संस्कार बताए हैं। इनमें कुछ गर्भकाल में, कुछ मां की गोद में, कुछ घर के आंगन में और कुछ गुरुकुल में प्राप्त होते हैं। विदुषी माता, धर्मात्मा पिता और आचरणवान आचार्य की कृपा से बच्चा ज्ञानी व देवता बनता है। सद्गुणों की वृद्धि और दोष निवारण ही संस्कार है।
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उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में केवल भौतिक शिक्षा दी जा रही है। इससे विलासिता बढ़ रही है। पहले आध्यात्मिक शिक्षा, ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल, मोक्ष, संध्या, उपासना सीखनी चाहिए। तभी देवत्व प्राप्त होता है। अध्यक्षता डॉ. भारत राठी ने की। संचालन बलराम चौधरी ने किया। इस अवसर पर गंगाराम, किशन लाल कुशवाहा, मुरारी लाल, यशपाल सिंह, नरेंद्र पाल सिंह, राजपाल सिंह, अशोक कुमार, राजेश सेठी, अशोक सुधाकर रहे।
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मेरठ। आर्य समाज साकेत की ओर से 57वें वार्षिकोत्सव एवं वेद प्रचार सप्ताह कार्यक्रम में यज्ञ के बाद वेद मंत्रों के साथ आहुतियां दी गईं। स्वामी शरणानंद परिव्राजक ने वेद मंत्रों के विषय में विस्तार से बताया। यजमान सविता, नवीन, रतनेश, ब्रजेश कुशवाह, सेजल रहीं। यजमानों को ऋषि दयानंद का चित्र और वैदिक साहित्य भेंट किया गया। कार्यक्रम में श्रेष्ठ संस्कारों के साथ जीवन जीने का संदेश दिया गया।
यज्ञ के बाद भजन संध्या हुई। योगेश दत्त आर्य ने ईश्वर स्तुति के मधुर भजन सुनाए। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रकाश डाला और वेद स्वाध्याय एवं ऋषि-मुनियों के जीवन चरित्र से प्रेरणा लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना कर समाज सुधार का बीड़ा उठाया। उनके विचारों से प्रभावित होकर अनेक क्रांतिकारियों ने देश के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी और बलिदान भी दिया।
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मुख्य वक्ता स्वामी शरणानंद परिव्राजक ने महर्षि दयानंद के दर्शन को सरल भाषा में समझाया। उन्होंने कहा उत्तम सड़कें, कारखाने, सुख-सुविधाएं हों लेकिन मनुष्य बिगड़ा हो तो सब नरक बन जाएगा। उन्होंने संस्कारों की महत्ता पर जोर दिया। महर्षि दयानंद ने 16 संस्कार बताए हैं। इनमें कुछ गर्भकाल में, कुछ मां की गोद में, कुछ घर के आंगन में और कुछ गुरुकुल में प्राप्त होते हैं। विदुषी माता, धर्मात्मा पिता और आचरणवान आचार्य की कृपा से बच्चा ज्ञानी व देवता बनता है। सद्गुणों की वृद्धि और दोष निवारण ही संस्कार है।
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उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में केवल भौतिक शिक्षा दी जा रही है। इससे विलासिता बढ़ रही है। पहले आध्यात्मिक शिक्षा, ईश्वर, आत्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल, मोक्ष, संध्या, उपासना सीखनी चाहिए। तभी देवत्व प्राप्त होता है। अध्यक्षता डॉ. भारत राठी ने की। संचालन बलराम चौधरी ने किया। इस अवसर पर गंगाराम, किशन लाल कुशवाहा, मुरारी लाल, यशपाल सिंह, नरेंद्र पाल सिंह, राजपाल सिंह, अशोक कुमार, राजेश सेठी, अशोक सुधाकर रहे।