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गंगा में बढ़ेगा सफाई दूतों का कुनबा
अमर उजाला ब्यूरों
Updated Sun, 06 Nov 2016 02:12 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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हस्तिनापुर सेंक्चुरी क्षेत्र में कछुओं का कुनबा बढ़ने जा रहा है। हस्तिनापुर में तीन साल पहले खुले कछुआ पालन केंद्र की सफलता के बाद प्रदेश सरकार ने सेंक्चुरी क्षेत्र के हर जिले में एक कछुआ पालन केंद्र खोलने की मंजूरी दे दी है। अब मेरठ के अलावा बिजनौर, मुजफ्फरनगर, हापुड़ और बुलंदशहर जिले में भी कछुआ पालन केंद्र खुलेंगे। इससे गंगा में जल को निर्मल बनाने में सहायक कछुओं की संख्या में तेजी से इजाफा होगा।
गंगा नदी के किनारे वर्ष-2013 में हस्तिनापुर में पहला कछुआ पालन केंद्र खोला गया था। मुख्य वन संरक्षक मेरठ जोन मुकेश कुमार ने इस केंद्र की सफलता का हवाला देते हुए सेंक्चुरी के बाकी जिलों में भी एक-एक केंद्र खोलने की मांग की थी। इस पर चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ने भी अपनी मुहर लगा दी है। जल्द ही बिजनौर, मुजफ्फरनगर, हापुड़ और बुलंदशहर जिले में कछुआ पालन केंद्र खोले जाएंगे। केंद्र संचालन में वन विभाग की मदद डब्ल्यूडब्ल्यूएफ करेगा। मुख्य वन संरक्षक का कहना है उत्तर प्रदेश में कछुआ पालन केंद्र में जैसी सफलता हस्तिनापुर में मिली है, ऐसी और कहीं नहीं मिली। स्थानीय लोगों का भी अच्छा सपोर्ट मिल रहा है। गंगा की सफाई की दृष्टि से यह काफी अच्छा है।
अब तक 1069 कछुए छोड़े
कछुआ पालन केंद्र से जुड़े डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वैज्ञानिक संजीव यादव ने बताया कि वर्ष-2013 से अब तक गंगा में 1069 कछुए छोड़े जा चुके हैं। 506 कछुए और तैयार हैं। इन्हें दिसंबर में गंगा में छोड़ा जाएगा। केंद्र ने अभी तक कछुओं के 1705 अंडे उठाए हैं, जिनमें से 1575 को रीस्टॉक किया है। सफलता का अनुपात 92 फीसदी है। गंगा नदी के 60 किमी के दायरे में 148 स्थानीय लोग कछुआ संरक्षण से जुड़ चुके हैं।
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गंगा में हैं 12 प्रजातियां
दुनिया में करीब 300 प्रजाति के कछुए पाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में 15 प्रजाति के कछुए हैं। इनमें से 12 प्रजाति के कछुए हस्तिनापुर सेंक्ुचरी क्षेत्र में पाए जाते हैं। छह प्रजाति के कछुए विलुप्त होने की कगार पर हैं। इनका संरक्षण जरूरी है। इस लिहाज से पालन केंद्र चलाया जा रहा है। कछुओं के कई महत्व हैं। इसे नदी का सफाई कर्मचारी भी कहा जाता है। यह मांसाहारी और शाकाहारी होते हैं। ये नदी की खाद्य शृंखला के उच्च उपभोक्ता हैं। कछुओं को भगवान विष्णु का दूसरा अवतार भी कहा जाता है।
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गंगा नदी के किनारे वर्ष-2013 में हस्तिनापुर में पहला कछुआ पालन केंद्र खोला गया था। मुख्य वन संरक्षक मेरठ जोन मुकेश कुमार ने इस केंद्र की सफलता का हवाला देते हुए सेंक्चुरी के बाकी जिलों में भी एक-एक केंद्र खोलने की मांग की थी। इस पर चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन ने भी अपनी मुहर लगा दी है। जल्द ही बिजनौर, मुजफ्फरनगर, हापुड़ और बुलंदशहर जिले में कछुआ पालन केंद्र खोले जाएंगे। केंद्र संचालन में वन विभाग की मदद डब्ल्यूडब्ल्यूएफ करेगा। मुख्य वन संरक्षक का कहना है उत्तर प्रदेश में कछुआ पालन केंद्र में जैसी सफलता हस्तिनापुर में मिली है, ऐसी और कहीं नहीं मिली। स्थानीय लोगों का भी अच्छा सपोर्ट मिल रहा है। गंगा की सफाई की दृष्टि से यह काफी अच्छा है।
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अब तक 1069 कछुए छोड़े
कछुआ पालन केंद्र से जुड़े डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के वैज्ञानिक संजीव यादव ने बताया कि वर्ष-2013 से अब तक गंगा में 1069 कछुए छोड़े जा चुके हैं। 506 कछुए और तैयार हैं। इन्हें दिसंबर में गंगा में छोड़ा जाएगा। केंद्र ने अभी तक कछुओं के 1705 अंडे उठाए हैं, जिनमें से 1575 को रीस्टॉक किया है। सफलता का अनुपात 92 फीसदी है। गंगा नदी के 60 किमी के दायरे में 148 स्थानीय लोग कछुआ संरक्षण से जुड़ चुके हैं।
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गंगा में हैं 12 प्रजातियां
दुनिया में करीब 300 प्रजाति के कछुए पाए जाते हैं। उत्तर प्रदेश में 15 प्रजाति के कछुए हैं। इनमें से 12 प्रजाति के कछुए हस्तिनापुर सेंक्ुचरी क्षेत्र में पाए जाते हैं। छह प्रजाति के कछुए विलुप्त होने की कगार पर हैं। इनका संरक्षण जरूरी है। इस लिहाज से पालन केंद्र चलाया जा रहा है। कछुओं के कई महत्व हैं। इसे नदी का सफाई कर्मचारी भी कहा जाता है। यह मांसाहारी और शाकाहारी होते हैं। ये नदी की खाद्य शृंखला के उच्च उपभोक्ता हैं। कछुओं को भगवान विष्णु का दूसरा अवतार भी कहा जाता है।