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बूढ़ा हुआ सूचना का बुनियादी तंत्र
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गांवों में अधिकतर चौकीदारों की उम्र साठ के पार
मोहम्मद शाह आलम
सरूरपुर। गांवों में तैनात चौकीदार पुलिस विभाग को सूचना देने से मुंह मोड़ने लगे हैं। पहले से ही पुलिस विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले चौकीदारों की हालत वक्त के हिसाब से दयनीय हो गई है। साथ ही अधिकतर चौकीदार बुढ़ापे की ओर अग्रसर हैं। कुछ चौकीदारों की आंखों की रोशनी घट गई है। उन्हें लाठी का सहारा लेना पड़ रहा है। इसके चलते सुरक्षा की रीढ़ कमजोर हो रही है।
पुलिस विभाग की नियमावली के अनुसार पुलिसकर्मियों के अतिरिक्त प्रत्येक गांव में एक चौकीदार भी तैनात किए जाता है। ये जनसंख्या के हिसाब से नियुक्त किए जाते थे। बड़े गांवों में एक से दो तक चौकीदार रखे गए हैं। गांवों में चौकीदार पुलिस विभाग के लिए काफी अहम होता है। इसकी सूचना पर पुलिस कार्रवाई करती है। चौकीदार अपने गांव की अंदरूनी गतिविधियों की सूचना देता है। साथ ही किसी अप्रिय घटना से पुलिस विभाग को अवगत कराते रहे हैं। गांव के चौकीदारों की सूचना पर पुलिस विभाग ने कई बार बड़े खुलासे किए और वारदातों पर नकेल कसी। बदलते वक्त के साथ पुलिस विभाग में चौकीदार की अहमियत कम होती चली गई। गांव का चौकीदार वर्तमान में थाने का चौकीदार तक सीमित होकर रह गया है। ऐसे में जब चौकीदार अधिकतर समय थाने में काम करता रहेगा तो गांव में किसी घटना की जानकारी कैसे दे पाएगा। गांव की सूचना देने वाले चौकीदार की अहमियत को दरकिनार कर थानेदार भी अब उनकी सूचनाओं को गंभीरता से नहीं लेते हैं। वहीं दूसरी ओर विभिन्न गांवों में तैनात चौकीदार बुढ़ापे की दहलीज पर जा चुके हैं।
गांवों में तैनात चौकीदार जिनमें अधिकतर वृद्ध हो चुके हैं। उन्हें थाने में पहुंचने के लिए काफी दिक्कत उठानी पड़ती है। चौकीदार शौराज, सत्तार, रामकिशन, प्रकाश आदि ने बताया कि वे थाना बनने के समय से चौकीदार हैं। अब वे बुढ़ापे के चलते स्वस्थ नहीं हैं। कुछ गांवों आज भी चौकीदार की तैनाती नहीं की गई है। वहीं, चुनाव के वक्त में चौकीदारों को याद किया जाता है। उनकी पोलिंग बूथ पर ड्यूटी लगाई जाती है। सरूरपुर थाने में 27 में से सात गांव में चौकीदार नहीं हैं। हालांकि रोहटा थाने में 31 में से 15 चौकीदार नहीं हैं। कोई प्रोत्साहन नहीं मिलने पर ग्रामीणों की नजरों में इसका खास मुकाम नहीं रहा है।
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चौकीदार को आज आसमान छूतीं महंगाई में मानदेय के नाम पर मात्र पंद्रह सौ रुपए मिल रहे हैं। हालांकि चौकीदार पुलिस विभाग के लिए अहम कड़ी हैं। चौकीदार इन्द्रपाल, रामवीर, जगदीश, लियाकत, महेन्द्र आदि का कहना है कि उन्होंने पांच रुपये मानदेय से शुरूआत की गई थी। निर्धारित मानदेय में गुजारा होना मुश्किल है। कई बार शासन से मानदेय बढ़ाने की मांग कर चुके हैं, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
* बिना चौकीदार वाले गांव में तैनाती के लिए रिपोर्ट भेजी गई है। वहीं बुढ़ापे के चलते चौकीदारों की अस्वस्थता की बात अपनी जगह सहीहै। चौकीदारों तैनाती कार्यकाल में आयु सीमा के बारे में जानकारी की जाएगी।
संजय कुमार, थाना प्रभारी सरूरपुर।
* आगामी लोकसभा चुनाव से पहले खाली पड़े गांवों में चौकीदारों की नियुक्ति हो जाए। इसके लिए उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट भेज दी गई है।
धनवीर सिंह, थाना प्रभारी रोहटा।
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मोहम्मद शाह आलम
सरूरपुर। गांवों में तैनात चौकीदार पुलिस विभाग को सूचना देने से मुंह मोड़ने लगे हैं। पहले से ही पुलिस विभाग की रीढ़ कहे जाने वाले चौकीदारों की हालत वक्त के हिसाब से दयनीय हो गई है। साथ ही अधिकतर चौकीदार बुढ़ापे की ओर अग्रसर हैं। कुछ चौकीदारों की आंखों की रोशनी घट गई है। उन्हें लाठी का सहारा लेना पड़ रहा है। इसके चलते सुरक्षा की रीढ़ कमजोर हो रही है।
पुलिस विभाग की नियमावली के अनुसार पुलिसकर्मियों के अतिरिक्त प्रत्येक गांव में एक चौकीदार भी तैनात किए जाता है। ये जनसंख्या के हिसाब से नियुक्त किए जाते थे। बड़े गांवों में एक से दो तक चौकीदार रखे गए हैं। गांवों में चौकीदार पुलिस विभाग के लिए काफी अहम होता है। इसकी सूचना पर पुलिस कार्रवाई करती है। चौकीदार अपने गांव की अंदरूनी गतिविधियों की सूचना देता है। साथ ही किसी अप्रिय घटना से पुलिस विभाग को अवगत कराते रहे हैं। गांव के चौकीदारों की सूचना पर पुलिस विभाग ने कई बार बड़े खुलासे किए और वारदातों पर नकेल कसी। बदलते वक्त के साथ पुलिस विभाग में चौकीदार की अहमियत कम होती चली गई। गांव का चौकीदार वर्तमान में थाने का चौकीदार तक सीमित होकर रह गया है। ऐसे में जब चौकीदार अधिकतर समय थाने में काम करता रहेगा तो गांव में किसी घटना की जानकारी कैसे दे पाएगा। गांव की सूचना देने वाले चौकीदार की अहमियत को दरकिनार कर थानेदार भी अब उनकी सूचनाओं को गंभीरता से नहीं लेते हैं। वहीं दूसरी ओर विभिन्न गांवों में तैनात चौकीदार बुढ़ापे की दहलीज पर जा चुके हैं।
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गांवों में तैनात चौकीदार जिनमें अधिकतर वृद्ध हो चुके हैं। उन्हें थाने में पहुंचने के लिए काफी दिक्कत उठानी पड़ती है। चौकीदार शौराज, सत्तार, रामकिशन, प्रकाश आदि ने बताया कि वे थाना बनने के समय से चौकीदार हैं। अब वे बुढ़ापे के चलते स्वस्थ नहीं हैं। कुछ गांवों आज भी चौकीदार की तैनाती नहीं की गई है। वहीं, चुनाव के वक्त में चौकीदारों को याद किया जाता है। उनकी पोलिंग बूथ पर ड्यूटी लगाई जाती है। सरूरपुर थाने में 27 में से सात गांव में चौकीदार नहीं हैं। हालांकि रोहटा थाने में 31 में से 15 चौकीदार नहीं हैं। कोई प्रोत्साहन नहीं मिलने पर ग्रामीणों की नजरों में इसका खास मुकाम नहीं रहा है।
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चौकीदार को आज आसमान छूतीं महंगाई में मानदेय के नाम पर मात्र पंद्रह सौ रुपए मिल रहे हैं। हालांकि चौकीदार पुलिस विभाग के लिए अहम कड़ी हैं। चौकीदार इन्द्रपाल, रामवीर, जगदीश, लियाकत, महेन्द्र आदि का कहना है कि उन्होंने पांच रुपये मानदेय से शुरूआत की गई थी। निर्धारित मानदेय में गुजारा होना मुश्किल है। कई बार शासन से मानदेय बढ़ाने की मांग कर चुके हैं, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।
* बिना चौकीदार वाले गांव में तैनाती के लिए रिपोर्ट भेजी गई है। वहीं बुढ़ापे के चलते चौकीदारों की अस्वस्थता की बात अपनी जगह सहीहै। चौकीदारों तैनाती कार्यकाल में आयु सीमा के बारे में जानकारी की जाएगी।
संजय कुमार, थाना प्रभारी सरूरपुर।
* आगामी लोकसभा चुनाव से पहले खाली पड़े गांवों में चौकीदारों की नियुक्ति हो जाए। इसके लिए उच्चाधिकारियों को रिपोर्ट भेज दी गई है।
धनवीर सिंह, थाना प्रभारी रोहटा।