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Meerut News: धर्म बचाने के लिए पहाड़ों पर चढ़े, कंदमूल खाए और कहलाए बोक्सा

Sat, 06 Jan 2024 12:13 AM IST
मेरठ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ
संवाद न्यूज एजेंसी, मेरठ Updated Sat, 06 Jan 2024 12:13 AM IST
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Climbed mountains to save religion, ate roots and was called Boxa
बिजनौर। प्रशासन ने जिले के एक बोक्सा जनजाति के गांव बाबनसराय में 15 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनसंवाद होने की घोषणा की तो यह गांव चर्चाओं में आ गया। पूरे यूपी में मात्र बिजनौर जिले में ही बाेक्सा जनजाति के आठ गांव हैं। मूलरूप से दिल्ली-राजस्थान के रहने वाले ये लोग औरंगजेब के शासन में धर्म परिर्तन और कत्लेआम के दौरान धर्म बचाने के लिए भागकर पहाड़ों पर छिप गए थे। इन गांवों तक बिजली, पानी, सड़क पहुंची तो ये लोग समाज की मुख्यधारा से जुड़ने लगे हैं। वहीं पीएम के जनसंवाद को लेकर तेजी से अफसर इन गांवों की सूरत बदलने में लगे हुए हैं।
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पूरे यूपी में केवल बिजनौर जिले में ही बाेक्सा जनजाति के आठ गांव हैं। इनमें सबसे ज्यादा रायपुर सादात क्षेत्र के गांव बाबनसराय में 337 परिवार के 1419 लोग यहां रहते हैं। यहां के लोग खुद के बारे में बुजुर्गों से सुनी कहानी बताते हैं और खुद को मूल रूप से दिल्ली-राजस्थान के राजपूत क्षत्रिय मानते हैं। इन लोगों का कहना है कि ये लोग औरंगजेब के समय धर्म परिवर्तन के लिए हो रहे कत्लेआम के दौरान जान बचाकर भाग आए थे। ये लोग कोटद्वार के पहाड़ों पर आकर बस गए। इन्होंने कंदमूल खाकर यहीं काफी समय बिताया। जब नीचे उतरे तो उनकी दाढ़ी, बाल बढ़ चुके थे और बिजनौर के तराई इलाके के निवासियों ने उनकी बढ़ी हुई दाढ़ी देखकर इन्हें बोक कहना शुरू कर दिया था। बोक से ये लोग बोक्सा कहलाने लगे।
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- आज भी कच्चे घर बनाने, हाथ से मछली पकड़ने की कला जानते हैं बोक्सा
अब तो धीरे-धीरे गांव में पक्के मकान बन रहे हैं, लेकिन कई कच्चे मकान आज भी गांव में मौजूद हैं। ये लोग कच्चे मकान की दीवार सरकंडे पर मिट्टी लेपकर तैयार करते थे। जो बारिश या आंधी भी झेल जाते हैं। इसके अलावा इन लोगों के पास पूर्वजों से सौगात में मिली हाथ से मछली पकड़ने की कला भी है। ये लोग नदी में पहुंचकर बिना जाल या कांटे के हाथ से ही मछली पकड़ना जानते हैं।
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- गांव में स्कूल पांचवीं तक, छात्रावास बना, शिवभक्त हैं यहां के लोग
गांव बावनसराय में पांचवीं तक स्कूल है। इससे आगे गांव के बच्चे कोटद्वार पढ़ने जाते हैं। इसके अलावा गांव में सड़क इंटरलॉकिंग हुई, बिजली भी पहुंच गए हैं। छात्रावास तैयार हो चुका है, लेकिन इसके शुरू होेने का इंतजार है। अब प्रधानमंत्री के जनसंवाद को लेकर रोजाना कई अधिकारी गांव में पहुंच रहे हैं और हर ग्रामीण से सरकारी योजनाओं के मिलने के बारे में जानकारी ले रहे हैं। गांव में एक शिव मंदिर है, जहां पर अधिकांश लोग पूजा करते हैं।
- बोक्सा जनजाति की ग्राम प्रधान बनी सीमा
सीमा यहां की ग्राम प्रधान है और बावनसराय में रहती है। गांव में पक्का मकान भी है, लेकिन आज भी अपने कच्चे मकान को भी संजोये हुए है। उसका इस्तेमाल वह रसोई के रूप में कर रही है। सीमा का कहना है कि गांव में पिछले दस सालों में काफी काम हुआ है, उससे पहले यहां की हालत काफी खराब थी।
- खेती, दूध और मजदूरी से गुजारा : दिनेश
बावनसराय निवासी दिनेश ने बताया कि यहां पर कुछ लोगों के पास खेती है, तो कुछ मजदूरी से अपना गुजारा करते हैं। कुछ ने पशु पाल रखे हैं और दूध बेचकर अपना काम चलाते हैं। उनके दादाजी उन्हें बताते थे वे राजस्थान के पास से यहां आए हैं और वह वहां क्षत्रिय थे।

- समस्याओं से लड़ा, खुद सरकारी नौकरी में और बेटी को बनाया इंजीनियर
बावनसराय निवासी महेंद्र सिंह पशुपालन विभाग नगीना में तैनात हैं। उसने उस समय समस्याओं से लड़कर जैसे-तैसे हाईस्कूल किया और पशु पालन विभाग में चतुर्थ श्रेणी नौकरी पा ली। इसके बाद पढ़ाई की अहमियत समझ आई तो बेटी सोनम को बढ़ाया। बेटी को न सिर्फ पढ़ाया, बल्कि उसे दिल्ली से बीटेक भी कराया। महेंद्र सिंह का कहना है कि अब सभी लोग अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे रहे हैं। गांव में बड़ा स्कूल खुले तो और फायदा हो।


- मारकाट हुई, पर हमारे पूर्वजों ने धर्म नहीं छोड़ा : लाल सिंह
गाव के ही लाल सिंह काफी बुजुर्ग हैं। उन्होंने बताया कि उनके दादा उन्हें बताते थे कि उनकी कई पीढ़ी यहीं पर रह रही हैं। वह अपने पूर्वजों से यही सुनते आ रहे हैं कि वे दिल्ली के पास रहते थे। औरंगजेब के समय धर्म परिर्वन के लिए हुई मारकाट से बचकर यहां शरण ली थी। उनके लंबे बाल और दाढ़ी को देखकर ही उन्हें पहले बोक और फिर बोक्सा कहा जाने लगा।
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