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केमिकल का मेल, स्वास्थ्य से हो रहा खेल
अमर उजाला ब्यूरों
Updated Thu, 20 Oct 2016 02:28 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
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जसड़ सुल्तान नगर गांव समय दोपहर एक बजे। एक मकान में 15 से 20 लोग केमिकल से मिठाई तैयार कर रहे हैं। चारों तरफ गंदगी का अंबार है। तैयार रसगुल्लों में मक्खी और गंदगी भरी हुई है। एक युवक सोन पापड़ी तैयार करने के लिए ट्रे पर चप्पल पहने खड़ा है। मिल्क केक तैयार करने में पाउडर का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह खुलासा अमर उजाला संवाददाता द्वारा किए गए स्टिंग में हुआ।
इस स्टिंग से यह साफ हो गया कि मिठाई में भारी केमिकल का प्रयोग कर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। मुनाफा कमाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है। मिल्क केक, सोनपापड़ी से लेकर रसगुल्लों को बनाने में उन प्रतिबंधित कलरों और पाउडर का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे फूड सेफ्टी एंड स्टेंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। हर रोज यहां पर कई क्विंटल मिठाई तैयार कर शहरी मार्केट में खपाई जा रही है। जिस घर में मिठाई तैयार हो रही थी उसमें 15-20 लोगों की लेबर काम कर रही थी। आपसी बातचीत में एक युवक ने बताया कि ट्रे की साइज में सोन पापड़ी को लाने के लिए वो उसके ऊपर खड़ा है। उससे जब पूछा कि हाथों से क्यों नहीं करते तो उसने बताया कि हाथ से करने टाइम ज्यादा लगता है। सोन पापड़ी के साथ मिल्क केक और अन्य तरह की बर्फी भी ऐसे ही तैयार की जा रही है।
गोदाम दूसरी जगह संचालित
कार्रवाई के डर से जसड़ में दो स्तर पर काम हो रहा है। जहां भट्टी चल रही है, वहां 30-40 किलो मिठाई ही मिलेगी। हर कारोबारी ने गोदाम कहीं दूसरी जगह बनाया है। मिठाई तैयार होते ही उसे तत्काल घरों के अंदर बने गोदाम में भेज दिया जाता है।
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सेटिंग का खेल
जसड़ गांव में दर्जनों घरों के अंदर मिठाई तैयार करने का काम होती है जिसमें से अधिकांश मिठाई तैयार करने के लिए कुछ इसी तरह का फार्मूला अपना रहे हैं, लेकिन चुनिंदा मामले को छोड़ दिया जाये तो कभी यहां पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है। आरोप लग रहे हैं कि विभागीय अधिकारियों से सीधी सेटिंग है जिनकी शह पर पूरा कारोबार पनप रहा है।
मिलावटी मिठाइयों की देहरादून तक सप्लाई
एक बड़ी से कढ़ाही में चासनी तैयार हो रही थी। इसमें मक्खियां पड़ी थी। उसी चासनी को निकाल कर रसगुल्ले, मिल्क केक तैयार किया जा रहा था। हर रोज यहां पर इसी तरह से मिठाई तैयार होती है। जो मेरठ में कई बड़े दुकानदारों तक पहुंचती हैं। यह भी जानकारी मिली कि दिल्ली, देहरादून, रुड़की व अन्य शहरों तक सप्लाई की जा रही है।
यह केमिकल होता है प्रयोग
कलर रसगुल्ले, मिल्क केक, सोनपापड़ी, चमचम आदि मिठाइयां तैयार करने के लिए सिंथेटिक कलरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें सूखा पाउडर, रिफाइंड, हाइड्रो, वनस्पति घी मिलाया जाता है। इतना ही नहीं दूध को फाड़ने के लिए भी केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस दौरान दूध भी पाउडर डालकर तैयार किया जा रहा था।
इतनी सस्ती मिठाई कैसे
आज दूध 40 रुपये से कम में नहीं मिलेगा। चीन भी 40 रुपये प्रति किलो है। यदि एक किलो मिल्क केक तैयार करना है तो उसमें 200 रुपये से अधिक का खर्चा आयेगा, लेकिन यहां पर 100 से 110 रुपये प्रति किलो में दिया जा रहा है। वहीं रसगुल्ला 70 रुपये, सोनपापड़ी 60 रुपये, मिल्क केक 110 रुपये प्रति किलो तैयार करके दिया जा रहा है। इसे शहर के व्यापारी खरीद कर 250 से 300 रुपये प्रति किलो बेच रहे हैं।
कई गांवों में चल रहा धंधा
जसड़ सुल्ताननगर सहित क्षेत्र के डाहर, गोटका, जैनपुर आदि गांवों में धड़ल्ले से यह धंधा चल रहा है। लोगों का कहना है कि बिना मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर यह काम संभव नहीं है।
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इस स्टिंग से यह साफ हो गया कि मिठाई में भारी केमिकल का प्रयोग कर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जा रहा है। मुनाफा कमाने के लिए केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है। मिल्क केक, सोनपापड़ी से लेकर रसगुल्लों को बनाने में उन प्रतिबंधित कलरों और पाउडर का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसे फूड सेफ्टी एंड स्टेंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। हर रोज यहां पर कई क्विंटल मिठाई तैयार कर शहरी मार्केट में खपाई जा रही है। जिस घर में मिठाई तैयार हो रही थी उसमें 15-20 लोगों की लेबर काम कर रही थी। आपसी बातचीत में एक युवक ने बताया कि ट्रे की साइज में सोन पापड़ी को लाने के लिए वो उसके ऊपर खड़ा है। उससे जब पूछा कि हाथों से क्यों नहीं करते तो उसने बताया कि हाथ से करने टाइम ज्यादा लगता है। सोन पापड़ी के साथ मिल्क केक और अन्य तरह की बर्फी भी ऐसे ही तैयार की जा रही है।
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गोदाम दूसरी जगह संचालित
कार्रवाई के डर से जसड़ में दो स्तर पर काम हो रहा है। जहां भट्टी चल रही है, वहां 30-40 किलो मिठाई ही मिलेगी। हर कारोबारी ने गोदाम कहीं दूसरी जगह बनाया है। मिठाई तैयार होते ही उसे तत्काल घरों के अंदर बने गोदाम में भेज दिया जाता है।
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सेटिंग का खेल
जसड़ गांव में दर्जनों घरों के अंदर मिठाई तैयार करने का काम होती है जिसमें से अधिकांश मिठाई तैयार करने के लिए कुछ इसी तरह का फार्मूला अपना रहे हैं, लेकिन चुनिंदा मामले को छोड़ दिया जाये तो कभी यहां पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है। आरोप लग रहे हैं कि विभागीय अधिकारियों से सीधी सेटिंग है जिनकी शह पर पूरा कारोबार पनप रहा है।
मिलावटी मिठाइयों की देहरादून तक सप्लाई
एक बड़ी से कढ़ाही में चासनी तैयार हो रही थी। इसमें मक्खियां पड़ी थी। उसी चासनी को निकाल कर रसगुल्ले, मिल्क केक तैयार किया जा रहा था। हर रोज यहां पर इसी तरह से मिठाई तैयार होती है। जो मेरठ में कई बड़े दुकानदारों तक पहुंचती हैं। यह भी जानकारी मिली कि दिल्ली, देहरादून, रुड़की व अन्य शहरों तक सप्लाई की जा रही है।
यह केमिकल होता है प्रयोग
कलर रसगुल्ले, मिल्क केक, सोनपापड़ी, चमचम आदि मिठाइयां तैयार करने के लिए सिंथेटिक कलरों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इनमें सूखा पाउडर, रिफाइंड, हाइड्रो, वनस्पति घी मिलाया जाता है। इतना ही नहीं दूध को फाड़ने के लिए भी केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस दौरान दूध भी पाउडर डालकर तैयार किया जा रहा था।
इतनी सस्ती मिठाई कैसे
आज दूध 40 रुपये से कम में नहीं मिलेगा। चीन भी 40 रुपये प्रति किलो है। यदि एक किलो मिल्क केक तैयार करना है तो उसमें 200 रुपये से अधिक का खर्चा आयेगा, लेकिन यहां पर 100 से 110 रुपये प्रति किलो में दिया जा रहा है। वहीं रसगुल्ला 70 रुपये, सोनपापड़ी 60 रुपये, मिल्क केक 110 रुपये प्रति किलो तैयार करके दिया जा रहा है। इसे शहर के व्यापारी खरीद कर 250 से 300 रुपये प्रति किलो बेच रहे हैं।
कई गांवों में चल रहा धंधा
जसड़ सुल्ताननगर सहित क्षेत्र के डाहर, गोटका, जैनपुर आदि गांवों में धड़ल्ले से यह धंधा चल रहा है। लोगों का कहना है कि बिना मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर यह काम संभव नहीं है।