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साहित्य चोरी में शिक्षक-शोधार्थी दोनों दंडित होंगे
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मेरठ। अब शोधार्थी से ज्यादा जिम्मेदारी शोध कराने वाले की है। रिसर्च गाइड अच्छी तरह शोध विषय के चयन और शोध कार्य की प्रगति तथा अंतिम रिपोर्ट सबमिट करने तक बारीकी से नजर रखें। ऐसा नहीं करने या साहित्य चोरी पाए जाने पर शोधार्थी को छह महीने में रिवाइज्ड थीसिस जमा करनी होगी परंतु शिक्षक को शोध कराने से वंचित करने के साथ एनुअल इंक्रीमेंट रोकने जैसे नुकसान का सामना करना पड़ेगा। ये विचार मेरठ कॉलेज में चल रहे फैकल्टी इंडक्शन प्रोग्राम के दूसरे दिन रविवार को डॉ. सत्यप्रकाश, पूर्व निदेशक, लीगल स्टडीज इंस्टीट्यूट सीसीएसयू ने व्यक्त किए।
उन्होंने इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट, कॉपी राइट, एथिक्स और साहित्य चोरी पर कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के कार्य को बिना उसका संदर्भ दिए अपने नाम से प्रकाशित करता है तो वह साहित्य चोरी है। शैक्षिक जगत में किसी के कार्य को संदर्भित करने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन उसको एकनॉलेज करना जरूरी है। बौद्धिक कार्य जिसने किया है, उसका वह लीगल राइट है। कोई भी शिक्षक, शोधार्थी या लेखक बिना उसकी अनुमति के उसको प्रयोग नहीं कर सकता है। कॉपीराइट क्रिएटर का अपना मूल विचार होता है, जिसको बिना अनुमति कॉपी नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार कॉपीराइट एक्ट का दुरुपयोग होता गया वहीं, समय-समय पर इसमें संशोधन भी किया गया। जिससे एकेडमिक स्टैंडर्ड को कायम रखा जा सके। साहित्य चोरी की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। इसे ध्यान में रखकर यूजीसी, नई दिल्ली ने एक्ट बनाया। जिसमें शिक्षक और शोधार्थी दोनों के लिए नियम और दंड का प्रावधान है। शिक्षकों के लिए तो उन्हें शोध कार्य से विरक्त करने के साथ एनुअल इंक्रीमेंट रोकने का प्रावधान है। इसलिए अब शोध में अत्यंत सावधानी और बारीकी से परीक्षण की आवश्यकता है।
कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. संजय कुमार ने बताया कि साहित्य चोरी से बचने और उच्च कोटि का शोध करने के लिए सबसे अहम काम है कि अधिक से अधिक साहित्य का अध्ययन एवं विश्लेषण करें। जितना अधिक साहित्य का अध्ययन होगा साहित्य चोरी की गुंजाइश स्वत: ही कम हो जाएगी। कार्यक्रम में आयोजन समिति से डॉ. भूपेंद्र सिंह, डॉ. नीलम कुमारी, डॉ. आनंद सिंह, डॉ. बीना राय, डॉ. सुमन, डॉ. सांत्वना शर्मा, डॉ. नीलम शर्मा मौजूद रहीं। वहीं, धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनुराग जायसवाल ने किया।
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उन्होंने इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट, कॉपी राइट, एथिक्स और साहित्य चोरी पर कहा कि जब कोई व्यक्ति किसी दूसरे के कार्य को बिना उसका संदर्भ दिए अपने नाम से प्रकाशित करता है तो वह साहित्य चोरी है। शैक्षिक जगत में किसी के कार्य को संदर्भित करने पर कोई रोक नहीं है, लेकिन उसको एकनॉलेज करना जरूरी है। बौद्धिक कार्य जिसने किया है, उसका वह लीगल राइट है। कोई भी शिक्षक, शोधार्थी या लेखक बिना उसकी अनुमति के उसको प्रयोग नहीं कर सकता है। कॉपीराइट क्रिएटर का अपना मूल विचार होता है, जिसको बिना अनुमति कॉपी नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार कॉपीराइट एक्ट का दुरुपयोग होता गया वहीं, समय-समय पर इसमें संशोधन भी किया गया। जिससे एकेडमिक स्टैंडर्ड को कायम रखा जा सके। साहित्य चोरी की घटनाएं दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही हैं। इसे ध्यान में रखकर यूजीसी, नई दिल्ली ने एक्ट बनाया। जिसमें शिक्षक और शोधार्थी दोनों के लिए नियम और दंड का प्रावधान है। शिक्षकों के लिए तो उन्हें शोध कार्य से विरक्त करने के साथ एनुअल इंक्रीमेंट रोकने का प्रावधान है। इसलिए अब शोध में अत्यंत सावधानी और बारीकी से परीक्षण की आवश्यकता है।
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कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. संजय कुमार ने बताया कि साहित्य चोरी से बचने और उच्च कोटि का शोध करने के लिए सबसे अहम काम है कि अधिक से अधिक साहित्य का अध्ययन एवं विश्लेषण करें। जितना अधिक साहित्य का अध्ययन होगा साहित्य चोरी की गुंजाइश स्वत: ही कम हो जाएगी। कार्यक्रम में आयोजन समिति से डॉ. भूपेंद्र सिंह, डॉ. नीलम कुमारी, डॉ. आनंद सिंह, डॉ. बीना राय, डॉ. सुमन, डॉ. सांत्वना शर्मा, डॉ. नीलम शर्मा मौजूद रहीं। वहीं, धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अनुराग जायसवाल ने किया।
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