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भाद्रपद अमावस्या 23 अगस्त को, होगा समस्याओं का निदान
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भाद्रपद अमावस्या अर्थात् कुशोत्पाटिनी या कुशाग्रहणी अमावस्या 23 अगस्त को मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्य विनोद त्यागी ने बताया कि इस दिन स्नान, दान, जप, तप, व्रत और पितरों का तर्पण करने की परंपरा है। इस दिन वर्ष भर के धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और श्राद्ध आदि कार्यों के लिए कुश इकट्ठा किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए धार्मिक कार्य व्यक्ति को कर्ज, संकट और जीवन की समस्याओं से मुक्ति दिलाते हैं।
...सूर्य को अर्घ्य देने के लिए कुश आवश्यक
...सनातन संस्कृति में कुश का विशेष स्थान है। इंडियन काउंसिल ऑफ़ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के सचिव आचार्य कौशल वर्ष ने बतायाकी पूजा, दान, सूर्य को अर्घ्य देने और अन्य धार्मिक कार्यों में कुश का उपयोग अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि कुश के बिना की गई पूजा निष्फल होती है। कुश में ऊर्जा तरंगों को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता होती है, जिसके कारण इसे पूजा-पाठ में शामिल किया गया है। कुश के आसन पर बैठकर पूजन। कुश की पवित्री धारण करना और कुश से पूजन सामग्री को अभिमंत्रित करना आवश्यक माना जाता है। भाद्रपद अमावस्या को कुश संग्रहण का विधान है। आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वाराह अवतार धारण कर धरती को रसातल से निकाला। तब उनका शरीर जल से भीग गया। पानी को हटाने के लिए उन्होंने अपने शरीर को झटका। जहां-जहां पानी के छींटे गिरे। वहां कुश उग आए। तभी से कुश को पूजनीय माना जाता है। इस दिन कुश संग्रह करने की परंपरा इसी कथा से प्रेरित है।
.. दाहिने हाथ से तोड़ना चाहिए कुश
.. आचार्य कौशल वश ने बताया कि भाद्रपद अमावस्या के दिन स्नान आदि के बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके दाहिने हाथ से कुश तोड़ना चाहिए। कुश तोड़ते समय इस मंत्र का जाप कर ऊँ हूं फट्-फट् स्वाहा। कुश पूर्णतः हरा-भरा और बिना कटा-फटा होना चाहिए। इस दिन संग्रहित कुश को वर्ष भर पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में उपयोग किया जाता है। सनातन संस्कृति में प्रकृति और वनस्पतियों को विशेष सम्मान दिया गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में वनों को ‘कानन’ कहा जो प्राकृतिक रूप से उगने वाली वनस्पतियों को दर्शाता है।
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...सूर्य को अर्घ्य देने के लिए कुश आवश्यक
...सनातन संस्कृति में कुश का विशेष स्थान है। इंडियन काउंसिल ऑफ़ एस्ट्रोलॉजिकल साइंस के सचिव आचार्य कौशल वर्ष ने बतायाकी पूजा, दान, सूर्य को अर्घ्य देने और अन्य धार्मिक कार्यों में कुश का उपयोग अनिवार्य माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है कि कुश के बिना की गई पूजा निष्फल होती है। कुश में ऊर्जा तरंगों को अवशोषित करने की अद्भुत क्षमता होती है, जिसके कारण इसे पूजा-पाठ में शामिल किया गया है। कुश के आसन पर बैठकर पूजन। कुश की पवित्री धारण करना और कुश से पूजन सामग्री को अभिमंत्रित करना आवश्यक माना जाता है। भाद्रपद अमावस्या को कुश संग्रहण का विधान है। आचार्य मनीष स्वामी ने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने वाराह अवतार धारण कर धरती को रसातल से निकाला। तब उनका शरीर जल से भीग गया। पानी को हटाने के लिए उन्होंने अपने शरीर को झटका। जहां-जहां पानी के छींटे गिरे। वहां कुश उग आए। तभी से कुश को पूजनीय माना जाता है। इस दिन कुश संग्रह करने की परंपरा इसी कथा से प्रेरित है।
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.. दाहिने हाथ से तोड़ना चाहिए कुश
.. आचार्य कौशल वश ने बताया कि भाद्रपद अमावस्या के दिन स्नान आदि के बाद पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके दाहिने हाथ से कुश तोड़ना चाहिए। कुश तोड़ते समय इस मंत्र का जाप कर ऊँ हूं फट्-फट् स्वाहा। कुश पूर्णतः हरा-भरा और बिना कटा-फटा होना चाहिए। इस दिन संग्रहित कुश को वर्ष भर पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में उपयोग किया जाता है। सनातन संस्कृति में प्रकृति और वनस्पतियों को विशेष सम्मान दिया गया है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में वनों को ‘कानन’ कहा जो प्राकृतिक रूप से उगने वाली वनस्पतियों को दर्शाता है।
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