मौत का खौफ: कैंसर ने छीनीं इतनी जिंदगियां, हर तरफ फैला डर... जान की दुश्मन बनी ये बड़ी वजह, सरकार से मदद की गुहार
मेरठ जिले के कुछ गांवों में कैंसर का ऐसा कहर मचा है कि हर तरफ लोगों में खौफ ही खौफ बैठा है। इन गांवों में न जाने कितने लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। अब ऐसे में इन लोगों की सरकार से मदद की गुहार है।
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कैंसर! ये ऐसी बीमारी है जो मरीज के साथ पूरे परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से तोड़ देती है। शुरू में पता चल जाए तो उम्मीद रहती है, लेकिन देर हो जाए तो डॉक्टर भी कुछ नहीं कर पाते। गांवों में पहले जहां कैंसर के इक्का-दुक्का मामले ही आते थे वहीं, अब एक ही परिवार के कई लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। आईएमए के पूर्व अध्यक्ष डॉ. सुनील गुप्ता कहते हैं जिले में 50 हजार लोग कैंसर से लड़ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि सिस्टम सो रहा है और लोग बेबस हैं।
दुनिया भर में मशहूर मेरठ के क्रिकेट बल्लों में जादुई चमक भरने वाले राकेश (41 वर्ष) की जिंदगी में कैंसर ने कभी न भूलने वाला गम भर दिया। राकेश कहते हैं... सोचा था मैं नहीं रहूंगा तो पत्नी सुषमा (38 वर्ष) सब संभाल लेंगी। लेकिन छह महीने बाद सुषमा को भी आंतों का कैंसर हो गया। पता चलने के छह महीने बाद ही वह दुनिया छोड़ गईं। बेटी मुस्कान (11 वर्ष) और बेटे श्रीतिज (15 वर्ष) पर खेलने-पढ़ने की उम्र में दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। जो थोड़ी बहुत जमा-पूंजी थी वह इलाज में खत्म हो चुकी है। अब दिन-रात मौत से जंग चल रही है। देखते हैं आखिर जीत किसकी होती है।
रोहटा रोड के गांव गोलाबढ़ निवासी राकेश की आंखों में आंसू हैं और जिस्म में असहनीय पीड़ा। यह कहानी अकेले उनकी नहीं है। मेरठ में उनके जैसे करीब 50 हजार लोग हैं जो कैंसर से लड़ रहे हैं। काली नदी किनारे बसे गांवों के हर मोहल्ले में कैंसर के कहर की दर्दनाक दास्तां है। पिठलोकर, अतराड़ा, माछरा, शाहपुर जैनपुर, अरनावली, पूठ, भोला, लखवाया, खानपुर, गोटका, कपसाड गांव में हालात विकट हैं। चिंता की बात यह है कि न तो इन गांवों को केंद्र में रख कोई बड़ा शोध हो रहा है और न ही इनका यह दर्द किसी भी मंच पर मुद्दा बन पाता है। इन गांवों में कोई कहता है कि काली नदी के पानी से यह सब हो रहा है तो किसी का मानना है कि यह खेतों में अंधाधुंध डाले जा रहे उर्वरक और कीटनाशकों की देन है। जो थोड़े सक्षम हैं उनमें से कोई सबमर्सिबल लगा रहा है तो कोई आरओ। कई किसान अपने खाने के लिए जैविक ढंग से खेती भी कर रहे हैं। लेकिन अधिकांश के पास कोई रास्ता नहीं है। इन्हें कैंसर की विभीषिका से बचने के लिए शासन, प्रशासन और सरकार से पहल का इंतजार है।
आठ लाख कर्ज लिया फिर भी नहीं बच पाईं विमलेश
गोलाबढ़ के रहने वाले विजय कुमार (50 वर्ष) पत्नी विमलेश को याद कर भावुक हो गए। बोले, दो साल पहले विमलेश को गर्भाशय में कैंसर हो गया, आठ लाख कर्ज लेकर इलाज कराया पर उसे बचा नहीं सका। दो अप्रैल 2021 को विमलेश दुनिया से चली गईं।
विजय वेल्डिंग करके रोजाना औसतन 300 रुपये कमाते हैं। घर में दो जवान बेटियां मोनिका (25 वर्ष) और पिंकी (22 वर्ष) हैं। बेटे संदीप, विक्की और नीरज के भविष्य की चिंता खाए जा रही है। करीब 11 साल पहले डूडा द्वारा बनवाए गए मकान की छत जर्जर होकर गिर रही है। विजय कहते हैं कि पांच साल के भीतर ही गांव में कैंसर कई लोगों की जान ले चुका है।
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अतराड़ा में 50 लोग गंवा चुके हैं कैंसर से जान
खरखौदा के अतराड़ा की गिनती संपन्न गांवों में होती है। करीब 10 हजार आबादी वाले गांव में लोगों के पास खेती की जमीन भी अच्छी है। लेकिन गांव से सटकर बहने वाली काली नदी में जहरीला पानी यहां कैंसर बांट रहा है। सरकारी हैडपंप का पानी भी कुछ देर रखते ही तो पीला हो जाता है। किसान सुखबीर सिंह (66 वर्ष) बताते हैं कि करीब 50 साल पहले एक बुजुर्ग महिला की कैंसर से मौत हुई तो इलाके में शोर मच गया था। तब डर इतना था कि अंतिम संस्कार भी यहां न करके ब्रजघाट पर किया गया था। दुखी मन से सुखबीर कहते हैं कि अब तो हालात इतने खराब हैं कि हर दूसरे-तीसरे महीने कैंसर से किसी ने किसी की मौत हो जाती है। कई परिवार तो ऐसे हैं जिन्होंने सारी कमाई इलाज में लगा दी, लेकिन अपने मरीज को बचा नहीं पाए।
किसान अमित त्यागी बताते हैं कि पिछले कुछ सालों में 50 के करीब लोगों की मौत कैंसर से हुई। कैंसर फैलने का कारण वे यहां से गुजर रही काली नदी को बताते हैं। इसकी वजह से गांव का पानी खराब हो चुका है। जो लोग खर्च वहन कर सकते हैं, वे सभी आरओ-सबमर्सिबल लगवा रहे हैं। प्रशासन को चाहिए कि इस समस्या का हल कराए नहीं तो नदी के आसपास वाले गांवों में लोग कैंसर की चपेट में आते रहेंगे।
मां और दादी की हुई मात, अंतिम स्टेज में हुई पहचान
अतराड़ा के किसान विनय त्यागी कैंसर के कारण अपनी माता ओम देवी और दादी सुमित्रा देवी को खो चुके हैं। विनय बताते हैं कि मौत से चार महीने पहले ही पता चल पाया कि माता जी का कैंसर अंतिम स्टेज में है। वे बताते हैं कि गांव का पानी बहुत खराब हो चुका है, ऐसे में वे अब सब्जी भी आर्गेनिक उगा रहे हैं। घर पर आरओ लगवा लिया है। गांव के ही अशोक कुमार बताते हैं कि दो साल पहले भाभी रेखा (45 वर्ष) की कैंसर से मौत हो गई। पांच साल पहले कैंसर का पता चला था। दिल्ली तक इलाज कराया। 15-16 लाख रुपये लग गए लेकिन जान नहीं बची। पवन त्यागी बताते हैं कि 15 दिन पहले ही उनके चाचा रामकुमार (57 वर्ष) की कैंसर से मौत हो गई। मौत से आठ दिन पहले ही कैंसर का पता चल पाया। गांव में दो महीने पहले बिजेंद्र शर्मा (62 वर्ष) की कैंसर से मौत हुई। दो साल पहले सतेश्वर त्यागी (55 वर्ष) की कैंसर से मौत हुई। विनय कहते हैं कि किस-किस के नाम गिनाएं, महेश चंद त्यागी, प्रतीत त्यागी, बिजेंद्र त्यागी की मौत भी कैंसर से मौत हो चुकी है।
माछरा में कैंसर ने छीनीं 10 से ज्यादा जिंदगियां
माछरा में दस से ज्यादा लोगों की जान कैंसर की वजह से गई है। यहां से निकल रहे छोइया नाले की वजह से पानी प्रदूषित हो गया है। गांव के ही अमित त्यागी बताते हैं कि राजेंद्र, सत्यपाल, कृष्ण, कुसुम, मंगलू, कैलावती, गुरुदत्त, राजकिशोर, आदि की मृत्यु कैंसर से हुई है। गांव के पानी मे फ्लोराइड की मात्रा अधिक है। पूर्व प्रधान राकेश त्यागी एवं वर्तमान प्रधान निर्मला शर्मा के पति यतेंद्र शर्मा ने बताया कि पानी की टंकी के निर्माण के लिए पैमाइश होने के बाद भी काम नहीं हो पाया।
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कपसाड में भी हालात विकट
दो वर्ष में कपसाड गांव में बुजुर्गों के साथ युवा भी कैंसर चपेट में आए हैं। कैंसर के डर की वजह से आमतौर पर परिजन पुष्टि के बावजूद मरीज को बीमारी का नाम नहीं बताते हैं। गांव के लोगों का कहना है कि कुंवरपाल (65 वर्ष), जयदान (60 वर्ष) व बलदान (60 वर्ष), मंगल (50 वर्ष), सुरेंद्र (55 वर्ष) की मौत कैंसर से हो चुकी है। मदन, सुमत्रा, कैलाशो की मौत छह महीने के अंदर ही हुई है। पूर्व ग्राम प्रधान सतीश कुमार व गांव निवासी आदेश ने बताया अब तक कई लोगों की कैंसर की बीमारी से मौत हो चुकी हैं।
हौसला और परिवार का था साथ, कैंसर को दे दी मात
अगर समय से पता चल जाए तो इंसान कैंसर से जंग जीत भी सकता है। जिले के कई लोगों ने इसे साबित भी किया है। सकारात्मक सोच, हौसला और परिवार का साथ इनके लिए संजीवनी बन गया। ये कैंसर को हराकर सामान्य जीवन जी रहे हैं और लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं।
10 साल चली जंग... जीत प्रमिला की हुई
कैंसर को हराने वाली बेगमपुल निवासी प्रमिला दीक्षित घरेलू महिला हैं। बताती हैं कि 10 साल पहले अचानक पता चला कि कैंसर है। ऐसा लगा जिंदगी बदल गई है, लेकिन हौसला नहीं खोया। पति का पूरा सहयोग रहा। कीमोथेरेपी व रेडियोथेरेपी हुई। 10 साल दवाई खाई। अगर कुछ भी बीमारी लगे तो जांच कराएं और हौसला रखें। बीमारी को जरूर हरा देंगे, चाहे कैंसर ही क्यों न हो।
टीना ने कैंसर को दो बार हराया
सूरजकुंड स्पोर्ट्स हाउस में रहने वाली टीना चड्ढा दो बार कैंसर को मात दे चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पहले 2015 में कैंसर का पता चला था। इसके बाद 2020 में। दोनों ही बार बेहतर इलाज और हिम्मत से कैंसर को हरा दिया। पति का पूरा सहयोग रहा, जिससे हिम्मत बनी रही। परिवार का साथ बहुत जरूरी है, जिससे कोई भी जंग जीत सकते हैं।
सब कुछ बदला और जीत गईं नीता
कैंसर को हराने वाली नीता शर्मा आर्मी स्कूल में क्राफ्ट टीचर हैं और श्रद्धापुरी फेस वन में रहती हैं। उन्हें 2013 में कैंसर का पता चला था। इनका कहना है कि जब उन्हें पता चला कि कैंसर है तो एक बार तो बहुत कमजोर पड़ गई थी। लगा सब कुछ खत्म हो गया है। मगर परिवार ने हौसला दिया। इच्छाशक्ति जागी। खानपान और लाइफ स्टाइल बदला और इलाज कराया। फिर सब आसान होता चला गया।
खराब दिनचर्या और प्रदूषण जिम्मेदार
कैंसर से बचने के लिए सबसे ज्यादा खराब दिनचर्या और प्रदूषण जिम्मेदार है। खानपान का ध्यान रखें। कोई दिक्कत हो तो जांच कराएं। शुरुआती स्टेज पर अगर कैंसर का पता चल जाए तो उससे इलाज आसान होता है। - डॉ उमंग मित्थल, कैंसर रोग विशेषज्ञ
घबराएं नहीं, इलाज संभव है
कैंसर को लेकर घबराएं नहीं। कैंसर का इलाज संभव है और तमाम लोगों ने सही इलाज से कैंसर की जंग को जीता भी है। सही जांच और बेहतर इलाज आवश्यक है। - डॉ. सुनील गुप्ता, चेयरमैन, केएमसी कैंसर संस्थान