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वर्षों से बदलते रहे कॉपियां, सोता रहा विवि प्रशासन
Updated Sun, 18 Mar 2018 02:28 AM IST
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वर्षों से बदलते रहे कॉपियां, सोता रहा विवि प्रशासन
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में एमबीबीएस ही नहीं बल्कि दूसरे सभी विषयों की कॉपियां घूस लेकर बड़ी आसानी से बदली जा रहीं थी। वो भी अबसे नहीं बल्कि वर्षों से ये खेल चल रहा था।
आंसर बुक सेंटर प्रभारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इस खेल को अंजाम दे रहे थे। बाकायदा छात्रों का एक ग्रुप इनके संपर्क में था। छुटभैया छात्रनेता इनके लिए शिकार तलाशने का काम कर रहे थे। जिस छात्र-छात्रा का पेपर बिगड़ जाता, उसकी कॉपी बदलने का ठेका लिया जाता रहा और विवि प्रशासन सोता रहा। इतनी बड़ा स्कैंडल सामने आने के बाद विवि पर ये अब तक का सबसे बड़ा दाग लग गया। इसको लेकर दिन भर विवि में अफरातफरी मची रही। हर कोई हैरान था कि ये सब क्या चल रहा है।
विश्वविद्यालय में पीसीएस स्तर के अफसर को रजिस्ट्रार बनाया जाता है। शासन से उसकी नियुक्ति होती है। लेकिन यहां प्रशासनिक कार्यों पर किसी का ध्यान नहीं रहता। हर लापरवाही पर ठीकरा कुलपति के सिर ही फोड़ दिया जाता है। ऐसे में इस विवि में सुधार कैसे हो सकता है। साल 2006 में जब यहां कॉपी मूल्यांकन घोटाला सामने आया तो लगा कि अब स्थिति में सुधार आएगा। लेकिन जिस तरह से इस स्कैंडल का खुलासा हुआ है, उससे तमाम सवाल खड़े हो गए हैं। आरोपी कविराज और विश्वविद्यालय के कर्मचारी पवन कुमार, संदीप और कपिल ने कुबूल किया है कि वे वर्ष 2014 से इस खेल को अंजाम दे रहे थे। सौ के करीब कॉपियां बदली गईं। लेकिन विवि में किसी को भनक क्यों नहीं लगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके बारे में और भी बहुतों को पता था। लेकिन मोटी रकम के बंटवारे ने सबकी जुबान सिल रखी थी।
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कुलपति ही सब करेंगे तो ये बाकी क्या कर रहे
इस पूरे प्रकरण से सवाल खड़े हो गए हैं कि अगर विश्वविद्यालय में कुलपति ही सब कुछ करेंगे तो बाकी के पदों पर बैठे अफसर क्या कर रहे हैं। क्यों नहीं इतने बड़े स्कैंडल की किसी को भनक लगी। आखिर क्यों विवि की सबसे महत्वपूर्ण जगह आंसर बुक सेंटर की मॉनीटरिंग नहीं की गई। इन सब बातों से साफ है कि कोई भी अफसर या कर्मचारी अपने दायित्व का पालन नहीं कर रहा है। लापरवाही का आलम ये है कि कुलपति के अलावा शनिवार दोपहर तक भी कॉपियां बदलने के मामले में विश्वविद्यालय में किसी अफसर को पूरे प्रकरण की जानकारी नहीं थी। कौन-कौन कर्मचारी लिप्त हैं, इस तक का जवाब किसी के पास नहीं मिला। ऐसे में इन अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि ये आखिर क्या कर रहे हैं।
...ये एसटीएफ है किसी को भी उठा लेगी
मेरठ। आरोपी पवन विवि की कर्मचारी कल्याण परिषद का चुनाव जीतकर अध्यक्ष बना था। एसटीएफ की टीम ने उसे कैंपस से पकड़ा तो कर्मचारी यूनियन के लोग एकत्र हो गए। उन्होंने रजिस्ट्रार ऑफिस में इस तरह से कर्मचारियों को पकड़ने का विरोध कर दिया। इसके बाद कर्मचारियों ने कुलपति के दफ्तर में पहुंचकर हंगामा कर दिया कि ऐसे बिना बताए कैसे टीम किसी को पकड़कर ले जा सकती है। इस पर कुलपति प्रो. एनके तनेजा ने सबको डपट दिया। स्पष्ट कह दिया कि ये एसटीएफ की टीम है, आप लोगों से पूछकर कार्रवाई नहीं करेगी। अगर कोई इतना गंभीर काम कर रहा है तो उसको एसटीएफ पकड़ेगी ही। कुलपति की डपट के बाद कर्मचारी चुपचाप वहां से निकल लिए। कुलपति ने साफ कहा कि ऐसा अपराध करने वालों के साथ विश्वविद्यालय कतई नहीं रहेगा।
ताबड़तोड़ दबिश से मचा हड़कंप
एसटीएफ की टीम ने शनिवार को आंसर बुक सेंटर के पास से कार्यालय अधीक्षक पवन कुमार को उठाया तो हड़कंप मच गया। इसके बाद टीम ने कांशीराम शोध पीठ पहुंचकर यहां पर कॉपियों की देखरेख में लगाए गए चतुर्थ क्लास कर्मचारी कपिल को उठा लिया। ताबड़तोड़ दबिश से पूरे विश्वविद्यालय में हड़कंप मचा रहा। हर कोई एसटीएफ की टीम के छापे को लेकर बात कर रहा था।
एसटीएफ ने इस स्कैंडल के पीछे काम करने वाले रैकेट को शुक्रवार से ही चिह्नित कर लिया था। सबसे पहले बिजनौर निवासी कविराज को पकड़ा गया। उसने बताया कि एमबीबीएस की कॉपी बदलने के काम को वह कार्यालय अधीक्षक पवन कुमार, चतुर्थ कर्मचारी संदीप और कपिल के साथ मिलकर अंजाम दे रहा था। इसी के चलते एसटीएफ ने पूरी फील्डिंग लगा रखी थी। पवन और कपिल को कैंपस से पकड़ा तो संदीप की ड्यूटी एमबीबीएस के सेंटर से कॉपियां लानी की थी। उसे एसटीएफ ने विवि के गेट पर ही दबोच लिया। इस पूरी कार्रवाई से विवि में हड़कंप मचा रहा। हर कोई कार्रवाई को लेकर आशंकित दिखा।
एमबीबीएस पेपर आउट होने के बाद रोज हो रही बार कोडिंग
- कुछ दिन पहले ही शिकायत पर हटाई गई थी पवन की ड्यूटी
मेरठ। एमबीबीएस पेपर आउट होने के बाद कुलपति ने पुरानी सारी व्यवस्था बदलवा दी थी। एमबीबीएस की कॉपियां की अब रोज बार कोडिंग हो रही थी। ऐसे में 13 मार्च से हुई परीक्षाओं में पवन, कविराज, संदीप और कपिल के मंसूबे पूरे नहीं हो पाए। कॉपी के लिखते ही एसटीएफ की टीम ने कविराज को रंगे हाथ दबोच लिया।
सहायक अधीक्षक पवन कुमार की ड्यूटी लंबे समय से आंसर बुक सेंटर पर थी। वो यहां प्रभारी होने के नाते खेल करा रहा था। विवि प्रशासन के पास भी ऐसी शिकायतें पहुंच रहीं थी कि कॉपियों में फेरबदल किया जा रहा है। लेकिन इस बात का प्रमाण विवि के पास नहीं था। ऐसी शिकायतों के चलते कुलपति ने कुछ दिन पहले ही पवन कुमार की ड्यूटी यहां से हटाकर गोपनीय विभाग में लगा दी थी। लेकिन विवि को ये अंदाजा नहीं था कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक इस खेल को अंजाम दिला रहे हैं। कपिल की ड्यूटी आजकल कांशीराम शोध पीठ में लगी थी। यहां पर विवि के कॉलेजों में हो रहीं परीक्षाओं की कॉपियां रखी जा रही हैं। तीसरे आरोपी संदीप की ड्यूटी एमबीबीएस के कॉलेजों से पेपर खत्म होने के बाद कॉपियों को आंसर बुक सेंटर पर लाने की जिम्मेदारी थी।
तीन सेंटरों पर रखी जा रहीं कॉपियां
एमबीबीएस की कॉपियां आजकल आंसर बुक सेंटर पर रखी जा रही हैं। इसके अलावा कॉलेजों में जो परीक्षाएं चल रही हैं उनकी कॉपियां कांशीराम शोधपीठ में रखी जा रहीं हैं। जो पुरानी कॉपियां हैं वे स्पोर्ट्स बिल्डिंग में रखी जाती हैं। बता दें कि हर साल विश्वविद्यालय में 30 लाख से ज्यादा कॉपियां आती हैं।
कॉपियां रोजाना मूल्यांकन केंद्र भेजें
शनिवार को विश्वविद्यालय के तीन कर्मचारियों के पकड़े जाने पर कुलपति ने एमबीबीएस की कॉपियों को अब परीक्षा सेंटरों से विवि लाकर बार कोडिंग करने के बाद सीधे मूल्यांकन केंद्रों पर भेजने के आदेश जारी कर दिए हैं।
खास बातें:
- विश्वविद्यालय का कोई अफसर नहीं निभा रहा जिम्मेदारी
- इतना बड़ा स्कैंडल होने के बाद किसी को नहीं चला पता
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मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में एमबीबीएस ही नहीं बल्कि दूसरे सभी विषयों की कॉपियां घूस लेकर बड़ी आसानी से बदली जा रहीं थी। वो भी अबसे नहीं बल्कि वर्षों से ये खेल चल रहा था।
आंसर बुक सेंटर प्रभारी और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी इस खेल को अंजाम दे रहे थे। बाकायदा छात्रों का एक ग्रुप इनके संपर्क में था। छुटभैया छात्रनेता इनके लिए शिकार तलाशने का काम कर रहे थे। जिस छात्र-छात्रा का पेपर बिगड़ जाता, उसकी कॉपी बदलने का ठेका लिया जाता रहा और विवि प्रशासन सोता रहा। इतनी बड़ा स्कैंडल सामने आने के बाद विवि पर ये अब तक का सबसे बड़ा दाग लग गया। इसको लेकर दिन भर विवि में अफरातफरी मची रही। हर कोई हैरान था कि ये सब क्या चल रहा है।
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विश्वविद्यालय में पीसीएस स्तर के अफसर को रजिस्ट्रार बनाया जाता है। शासन से उसकी नियुक्ति होती है। लेकिन यहां प्रशासनिक कार्यों पर किसी का ध्यान नहीं रहता। हर लापरवाही पर ठीकरा कुलपति के सिर ही फोड़ दिया जाता है। ऐसे में इस विवि में सुधार कैसे हो सकता है। साल 2006 में जब यहां कॉपी मूल्यांकन घोटाला सामने आया तो लगा कि अब स्थिति में सुधार आएगा। लेकिन जिस तरह से इस स्कैंडल का खुलासा हुआ है, उससे तमाम सवाल खड़े हो गए हैं। आरोपी कविराज और विश्वविद्यालय के कर्मचारी पवन कुमार, संदीप और कपिल ने कुबूल किया है कि वे वर्ष 2014 से इस खेल को अंजाम दे रहे थे। सौ के करीब कॉपियां बदली गईं। लेकिन विवि में किसी को भनक क्यों नहीं लगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि इसके बारे में और भी बहुतों को पता था। लेकिन मोटी रकम के बंटवारे ने सबकी जुबान सिल रखी थी।
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कुलपति ही सब करेंगे तो ये बाकी क्या कर रहे
इस पूरे प्रकरण से सवाल खड़े हो गए हैं कि अगर विश्वविद्यालय में कुलपति ही सब कुछ करेंगे तो बाकी के पदों पर बैठे अफसर क्या कर रहे हैं। क्यों नहीं इतने बड़े स्कैंडल की किसी को भनक लगी। आखिर क्यों विवि की सबसे महत्वपूर्ण जगह आंसर बुक सेंटर की मॉनीटरिंग नहीं की गई। इन सब बातों से साफ है कि कोई भी अफसर या कर्मचारी अपने दायित्व का पालन नहीं कर रहा है। लापरवाही का आलम ये है कि कुलपति के अलावा शनिवार दोपहर तक भी कॉपियां बदलने के मामले में विश्वविद्यालय में किसी अफसर को पूरे प्रकरण की जानकारी नहीं थी। कौन-कौन कर्मचारी लिप्त हैं, इस तक का जवाब किसी के पास नहीं मिला। ऐसे में इन अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं कि ये आखिर क्या कर रहे हैं।
...ये एसटीएफ है किसी को भी उठा लेगी
मेरठ। आरोपी पवन विवि की कर्मचारी कल्याण परिषद का चुनाव जीतकर अध्यक्ष बना था। एसटीएफ की टीम ने उसे कैंपस से पकड़ा तो कर्मचारी यूनियन के लोग एकत्र हो गए। उन्होंने रजिस्ट्रार ऑफिस में इस तरह से कर्मचारियों को पकड़ने का विरोध कर दिया। इसके बाद कर्मचारियों ने कुलपति के दफ्तर में पहुंचकर हंगामा कर दिया कि ऐसे बिना बताए कैसे टीम किसी को पकड़कर ले जा सकती है। इस पर कुलपति प्रो. एनके तनेजा ने सबको डपट दिया। स्पष्ट कह दिया कि ये एसटीएफ की टीम है, आप लोगों से पूछकर कार्रवाई नहीं करेगी। अगर कोई इतना गंभीर काम कर रहा है तो उसको एसटीएफ पकड़ेगी ही। कुलपति की डपट के बाद कर्मचारी चुपचाप वहां से निकल लिए। कुलपति ने साफ कहा कि ऐसा अपराध करने वालों के साथ विश्वविद्यालय कतई नहीं रहेगा।
ताबड़तोड़ दबिश से मचा हड़कंप
एसटीएफ की टीम ने शनिवार को आंसर बुक सेंटर के पास से कार्यालय अधीक्षक पवन कुमार को उठाया तो हड़कंप मच गया। इसके बाद टीम ने कांशीराम शोध पीठ पहुंचकर यहां पर कॉपियों की देखरेख में लगाए गए चतुर्थ क्लास कर्मचारी कपिल को उठा लिया। ताबड़तोड़ दबिश से पूरे विश्वविद्यालय में हड़कंप मचा रहा। हर कोई एसटीएफ की टीम के छापे को लेकर बात कर रहा था।
एसटीएफ ने इस स्कैंडल के पीछे काम करने वाले रैकेट को शुक्रवार से ही चिह्नित कर लिया था। सबसे पहले बिजनौर निवासी कविराज को पकड़ा गया। उसने बताया कि एमबीबीएस की कॉपी बदलने के काम को वह कार्यालय अधीक्षक पवन कुमार, चतुर्थ कर्मचारी संदीप और कपिल के साथ मिलकर अंजाम दे रहा था। इसी के चलते एसटीएफ ने पूरी फील्डिंग लगा रखी थी। पवन और कपिल को कैंपस से पकड़ा तो संदीप की ड्यूटी एमबीबीएस के सेंटर से कॉपियां लानी की थी। उसे एसटीएफ ने विवि के गेट पर ही दबोच लिया। इस पूरी कार्रवाई से विवि में हड़कंप मचा रहा। हर कोई कार्रवाई को लेकर आशंकित दिखा।
एमबीबीएस पेपर आउट होने के बाद रोज हो रही बार कोडिंग
- कुछ दिन पहले ही शिकायत पर हटाई गई थी पवन की ड्यूटी
मेरठ। एमबीबीएस पेपर आउट होने के बाद कुलपति ने पुरानी सारी व्यवस्था बदलवा दी थी। एमबीबीएस की कॉपियां की अब रोज बार कोडिंग हो रही थी। ऐसे में 13 मार्च से हुई परीक्षाओं में पवन, कविराज, संदीप और कपिल के मंसूबे पूरे नहीं हो पाए। कॉपी के लिखते ही एसटीएफ की टीम ने कविराज को रंगे हाथ दबोच लिया।
सहायक अधीक्षक पवन कुमार की ड्यूटी लंबे समय से आंसर बुक सेंटर पर थी। वो यहां प्रभारी होने के नाते खेल करा रहा था। विवि प्रशासन के पास भी ऐसी शिकायतें पहुंच रहीं थी कि कॉपियों में फेरबदल किया जा रहा है। लेकिन इस बात का प्रमाण विवि के पास नहीं था। ऐसी शिकायतों के चलते कुलपति ने कुछ दिन पहले ही पवन कुमार की ड्यूटी यहां से हटाकर गोपनीय विभाग में लगा दी थी। लेकिन विवि को ये अंदाजा नहीं था कि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तक इस खेल को अंजाम दिला रहे हैं। कपिल की ड्यूटी आजकल कांशीराम शोध पीठ में लगी थी। यहां पर विवि के कॉलेजों में हो रहीं परीक्षाओं की कॉपियां रखी जा रही हैं। तीसरे आरोपी संदीप की ड्यूटी एमबीबीएस के कॉलेजों से पेपर खत्म होने के बाद कॉपियों को आंसर बुक सेंटर पर लाने की जिम्मेदारी थी।
तीन सेंटरों पर रखी जा रहीं कॉपियां
एमबीबीएस की कॉपियां आजकल आंसर बुक सेंटर पर रखी जा रही हैं। इसके अलावा कॉलेजों में जो परीक्षाएं चल रही हैं उनकी कॉपियां कांशीराम शोधपीठ में रखी जा रहीं हैं। जो पुरानी कॉपियां हैं वे स्पोर्ट्स बिल्डिंग में रखी जाती हैं। बता दें कि हर साल विश्वविद्यालय में 30 लाख से ज्यादा कॉपियां आती हैं।
कॉपियां रोजाना मूल्यांकन केंद्र भेजें
शनिवार को विश्वविद्यालय के तीन कर्मचारियों के पकड़े जाने पर कुलपति ने एमबीबीएस की कॉपियों को अब परीक्षा सेंटरों से विवि लाकर बार कोडिंग करने के बाद सीधे मूल्यांकन केंद्रों पर भेजने के आदेश जारी कर दिए हैं।
खास बातें:
- विश्वविद्यालय का कोई अफसर नहीं निभा रहा जिम्मेदारी
- इतना बड़ा स्कैंडल होने के बाद किसी को नहीं चला पता