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पहचान खोते हस्तिनापुर को विदुर टीले का सहारा
Updated Mon, 27 Nov 2017 08:38 PM IST
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हस्तिनापुर।
महाभारतकालीन एवं ऐतिहासिक नगरी हस्तिनापुर पहचान खोती जा रही है। इसकी वजह महाभारतकालीन अवशेषों की उपेक्षा एवं जानकारी का अभाव है। यहां का प्राचीन विदुर टीला ऐतिहासिक क्षेत्र के महत्व का बखान करता है। हस्तिनापुर में प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक एवं धर्मावलंबी सौंदर्य की अनुपम इस नगरी के दर्शन करने आते हैं। प्राचीन स्थलों की जानकारी के लिए सरकार ने अभी तक यहां कोई केंद्र स्थापित नहीं किया है। वन्य जीव अभ्यारण्य के आरक्षित जंगल के पांडव वन ब्लॉक के बीचोंबीच स्थित विदुर टीला पठार पर है। इसको उल्टा खेड़ा भी कहा जाता है। इसके पूर्व दिशा में दलदली झील है। इसमें दुर्लभ प्रजाति के बारहसिंघा और मृगों का रहवास है। इसके तीनों ओर विशाल एवं घना जंगल है। हरियाली से भरपूर होने की वजह से यहां का वातावरण काफी मनोरम है। किवदंती है कि महाभारतकाल में महात्मा विदुर के यहां भगवान श्रीकृष्ण ने साग खाया था। इस स्थान पर आज भी महात्मा टीले के ऊपर सरसों और चना उगाया जाता है। दूरदराज से आने वाले भक्त भी इस शाक को अपने साथ लेकर जाते हैं। वहीं, इसे ग्रहण कर पुण्यलाभ अर्जित करते हैं। यह स्थान बूढ़ी गंगा की दलदली झील के धरातल से 50-60 फीट ऊंचाई तक आधा किमी की परिधि तक फैला है। वर्तमान में इस टीले को आनंद गिरी चमत्कारिक आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। यहां पीपल का विशाल वृक्ष है। इसको कौरवों, पांडवों तथा विदुर द्वारा रोपित किया बताया जाता है। इसको भक्त धागा बांधते हैं। जिसे मन्नत पूरी होने पर ही खोला जाता है।
विदुर टीला स्थित मंदिर की देखरेख कर रहे श्री गोविंद गिरी महाराज ने बताया कि यहां अब से लगभग 100 वर्ष पूर्व बाबा आनंद गिरी महाराज से शिष्यों ने कोई चमत्कार दिखाने की विनती की थी। इस पर महाराज श्री ने कहा था कि वे शेर का रूप धारण कर लेंगे परंतु शर्त होगी कि उनके हाथ में एक कड़ा होगा जिसे निकालना पड़ेगा। इसके बाद वे फिर से इंसानी रूप में आ जाएंगे। यह कहने के बाद उन्होंने शेर का रूप धारण कर लिया परंतु उनके तमाम शिष्य डर गये तथा किसी ने कड़ा नहीं निकाला। इसके बाद से वे शेर के रूप में ही रहे। कई भक्त बताते हैं कि इसके बाद महाराज श्री को शेर के रूप में यहां आसपास देखा गया। महाराज श्री इस कुटी पर बनी एक गुफा में पूजा करते थे।
विलुप्त होती इस संस्कृति के संरक्षण की कमान पिछले डेढ़ सौ वर्ष पूर्व श्री आनंद गिरी जी महाराज ने संभाली थी। इस धरा पर कई मंदिरों का निर्माण इन्हीं के सानिध्य में भक्तों द्वारा कराया गया। जिन पर प्रतिवर्ष काफी संख्या में भक्त आकर पूजा-अर्चना कर मन्नतें पूरी करते हैं। वर्तमान में आश्रम के मुख्य सेवादार दिल्ली के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चौ प्रेम सिंह की देखरेख में मंदिर की व्यवस्था चल रही है। उनका कहना है कि मंदिर का जीर्णोद्धार कर श्रद्धालुओं को इसकी ऐतिहासिकता एवं पौराणिकता की जानकारी दी जाएगी। इसके अतिरिक्त यहां ऐतिहासिक नगर में प्राचीन कर्ण मंदिर, प्राचीन पांडवेश्वर मंदिर, द्रौपदी घाट, पांडव टीला उल्टा खेड़ा आदि ऐतिहासिक विरासत मौजूद है।
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मुख्य बातें
विदुर टीले पर बड़ी संख्या में प्रतिवर्ष आते हैं श्रद्धालु
कई पौराणिक कथाएं संजोए हैं इतिहास का महत्व
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महाभारतकालीन एवं ऐतिहासिक नगरी हस्तिनापुर पहचान खोती जा रही है। इसकी वजह महाभारतकालीन अवशेषों की उपेक्षा एवं जानकारी का अभाव है। यहां का प्राचीन विदुर टीला ऐतिहासिक क्षेत्र के महत्व का बखान करता है। हस्तिनापुर में प्रतिवर्ष लाखों पर्यटक एवं धर्मावलंबी सौंदर्य की अनुपम इस नगरी के दर्शन करने आते हैं। प्राचीन स्थलों की जानकारी के लिए सरकार ने अभी तक यहां कोई केंद्र स्थापित नहीं किया है। वन्य जीव अभ्यारण्य के आरक्षित जंगल के पांडव वन ब्लॉक के बीचोंबीच स्थित विदुर टीला पठार पर है। इसको उल्टा खेड़ा भी कहा जाता है। इसके पूर्व दिशा में दलदली झील है। इसमें दुर्लभ प्रजाति के बारहसिंघा और मृगों का रहवास है। इसके तीनों ओर विशाल एवं घना जंगल है। हरियाली से भरपूर होने की वजह से यहां का वातावरण काफी मनोरम है। किवदंती है कि महाभारतकाल में महात्मा विदुर के यहां भगवान श्रीकृष्ण ने साग खाया था। इस स्थान पर आज भी महात्मा टीले के ऊपर सरसों और चना उगाया जाता है। दूरदराज से आने वाले भक्त भी इस शाक को अपने साथ लेकर जाते हैं। वहीं, इसे ग्रहण कर पुण्यलाभ अर्जित करते हैं। यह स्थान बूढ़ी गंगा की दलदली झील के धरातल से 50-60 फीट ऊंचाई तक आधा किमी की परिधि तक फैला है। वर्तमान में इस टीले को आनंद गिरी चमत्कारिक आश्रम के नाम से भी जाना जाता है। यहां पीपल का विशाल वृक्ष है। इसको कौरवों, पांडवों तथा विदुर द्वारा रोपित किया बताया जाता है। इसको भक्त धागा बांधते हैं। जिसे मन्नत पूरी होने पर ही खोला जाता है।
विदुर टीला स्थित मंदिर की देखरेख कर रहे श्री गोविंद गिरी महाराज ने बताया कि यहां अब से लगभग 100 वर्ष पूर्व बाबा आनंद गिरी महाराज से शिष्यों ने कोई चमत्कार दिखाने की विनती की थी। इस पर महाराज श्री ने कहा था कि वे शेर का रूप धारण कर लेंगे परंतु शर्त होगी कि उनके हाथ में एक कड़ा होगा जिसे निकालना पड़ेगा। इसके बाद वे फिर से इंसानी रूप में आ जाएंगे। यह कहने के बाद उन्होंने शेर का रूप धारण कर लिया परंतु उनके तमाम शिष्य डर गये तथा किसी ने कड़ा नहीं निकाला। इसके बाद से वे शेर के रूप में ही रहे। कई भक्त बताते हैं कि इसके बाद महाराज श्री को शेर के रूप में यहां आसपास देखा गया। महाराज श्री इस कुटी पर बनी एक गुफा में पूजा करते थे।
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विलुप्त होती इस संस्कृति के संरक्षण की कमान पिछले डेढ़ सौ वर्ष पूर्व श्री आनंद गिरी जी महाराज ने संभाली थी। इस धरा पर कई मंदिरों का निर्माण इन्हीं के सानिध्य में भक्तों द्वारा कराया गया। जिन पर प्रतिवर्ष काफी संख्या में भक्त आकर पूजा-अर्चना कर मन्नतें पूरी करते हैं। वर्तमान में आश्रम के मुख्य सेवादार दिल्ली के पूर्व विधानसभा अध्यक्ष चौ प्रेम सिंह की देखरेख में मंदिर की व्यवस्था चल रही है। उनका कहना है कि मंदिर का जीर्णोद्धार कर श्रद्धालुओं को इसकी ऐतिहासिकता एवं पौराणिकता की जानकारी दी जाएगी। इसके अतिरिक्त यहां ऐतिहासिक नगर में प्राचीन कर्ण मंदिर, प्राचीन पांडवेश्वर मंदिर, द्रौपदी घाट, पांडव टीला उल्टा खेड़ा आदि ऐतिहासिक विरासत मौजूद है।
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मुख्य बातें
विदुर टीले पर बड़ी संख्या में प्रतिवर्ष आते हैं श्रद्धालु
कई पौराणिक कथाएं संजोए हैं इतिहास का महत्व