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चुनावी माहौल में मोनू की हत्या राजनीतिक साजिश तो नहीं
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चुनावी माहौल में मोनू की हत्या राजनीतिक साजिश तो नहीं
- इस नाजुक समय में हत्या किया जाना खड़े कर रहा अन्य सवाल भी
- पुलिस के सामने व्यवस्था बनाना इस समय है बड़ी चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। लोकसभा चुनाव के नाजुक समय में एक ऐसी हत्या जिसे जातीय संघर्ष का परिणाम माना जा रहा होे, कहीं राजनीतिक साजिश का तो कोई हिस्सा नहीं। पुलिस इस लाइन पर भी काम कर रही है। गांव शोभापुर में जिस तरह से गुर्जर तथा अनुसूचित जाति के लोगों के बीच तनातनी है, उसने तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को न केवल इस समय बल्कि मतदान के दौरान भी अब यहां गंभीरता से निगाह रखनी होगी।
दो अप्रैल 2018 की घटना मेरठ में अचानक नहीं हुई थी। प्रदर्शन करने आए कुछ युवकों के हाथों में जिस तरह से लाठी डंडे थे और जिस तरह से उन्होंने चेहरों पर नकाब लगाकर तोड़फोड़ की, उसने तब भी सवाल खडे किए थे। यानी यह एक सीधा साधा विरोध प्रदर्शन नहीं था। इसकी तह तक जाने की पुलिस ने तब भी पूरी कोशिश की थी। यह सामने आ रहा था कि मामला राजनीतिक रंग में रंगा है। हालांकि इसके दो दिन बाद ही गांव शोभापुर में हुई अनुसूचित जाति के गोपी पारिया की हत्या ने इस पूरे मामले को बड़ा मुद्दा बना दिया था। इस जाति से जुडे़ तमाम संगठनों और पार्टियों ने इसे मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। मामले को पुलिस ने बमुश्किल शांत किया। दोनों जातियों के लोग पूरी तरह से आमने-सामने आ गए थे। इस प्रकरण में सनसनीखेज मोड़ तब आया था जब पिछले साल 15 दिसंबर को गोपी की हत्या के आरोपियों में शामिल इसी गांव के आशीष गुर्जर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस समय भी पुलिस को स्थिति संभालने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। आरोप अनुसूचित जाति के लोगों पर यह कहते हुए लगा कि बदला लेने के लिए आशीष को मारा गया। खून खराबे के और ज्यादा भड़कने के आसार बन गए थे।
दो अप्रैल की घटना के सियासत में बड़े मायने निकले। किसी नेता का जेल जाना, किसी का चुनाव में इसे मुद्दा बनाना जैसे मामलों में सीधे इस घटना के सियासी तार जोड़े गए। अब फिर से चुनाव हैं। गुर्जर पक्ष के एक युवक की हत्या को सियासी षड़यंत्रों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। पुलिस इस लाइन पर काम कर रही है कि इसका कोई राजनीतिक कनेक्शन तो नहीं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी को इस हत्या से कोई सियासी लाभ तो नहीं है। हत्या का समय जानबूझकर यही तो नहीं चुना गया। पुलिस इसकी तह तक ताने की पूरी कोशिश में है।
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- इस नाजुक समय में हत्या किया जाना खड़े कर रहा अन्य सवाल भी
- पुलिस के सामने व्यवस्था बनाना इस समय है बड़ी चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। लोकसभा चुनाव के नाजुक समय में एक ऐसी हत्या जिसे जातीय संघर्ष का परिणाम माना जा रहा होे, कहीं राजनीतिक साजिश का तो कोई हिस्सा नहीं। पुलिस इस लाइन पर भी काम कर रही है। गांव शोभापुर में जिस तरह से गुर्जर तथा अनुसूचित जाति के लोगों के बीच तनातनी है, उसने तमाम सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को न केवल इस समय बल्कि मतदान के दौरान भी अब यहां गंभीरता से निगाह रखनी होगी।
दो अप्रैल 2018 की घटना मेरठ में अचानक नहीं हुई थी। प्रदर्शन करने आए कुछ युवकों के हाथों में जिस तरह से लाठी डंडे थे और जिस तरह से उन्होंने चेहरों पर नकाब लगाकर तोड़फोड़ की, उसने तब भी सवाल खडे किए थे। यानी यह एक सीधा साधा विरोध प्रदर्शन नहीं था। इसकी तह तक जाने की पुलिस ने तब भी पूरी कोशिश की थी। यह सामने आ रहा था कि मामला राजनीतिक रंग में रंगा है। हालांकि इसके दो दिन बाद ही गांव शोभापुर में हुई अनुसूचित जाति के गोपी पारिया की हत्या ने इस पूरे मामले को बड़ा मुद्दा बना दिया था। इस जाति से जुडे़ तमाम संगठनों और पार्टियों ने इसे मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। मामले को पुलिस ने बमुश्किल शांत किया। दोनों जातियों के लोग पूरी तरह से आमने-सामने आ गए थे। इस प्रकरण में सनसनीखेज मोड़ तब आया था जब पिछले साल 15 दिसंबर को गोपी की हत्या के आरोपियों में शामिल इसी गांव के आशीष गुर्जर की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उस समय भी पुलिस को स्थिति संभालने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। आरोप अनुसूचित जाति के लोगों पर यह कहते हुए लगा कि बदला लेने के लिए आशीष को मारा गया। खून खराबे के और ज्यादा भड़कने के आसार बन गए थे।
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दो अप्रैल की घटना के सियासत में बड़े मायने निकले। किसी नेता का जेल जाना, किसी का चुनाव में इसे मुद्दा बनाना जैसे मामलों में सीधे इस घटना के सियासी तार जोड़े गए। अब फिर से चुनाव हैं। गुर्जर पक्ष के एक युवक की हत्या को सियासी षड़यंत्रों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। पुलिस इस लाइन पर काम कर रही है कि इसका कोई राजनीतिक कनेक्शन तो नहीं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी को इस हत्या से कोई सियासी लाभ तो नहीं है। हत्या का समय जानबूझकर यही तो नहीं चुना गया। पुलिस इसकी तह तक ताने की पूरी कोशिश में है।
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