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बागपत में घूल फांक रहे खजुराहो जैसे पैनल-BAGHPAT
Updated Fri, 26 Jan 2018 01:21 AM IST
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बागपत में धूल फांक रहे खजुराहो जैसे स्तम्भ
बागपत। खजुराहो के स्त्री-पुरुष की आलिंगनबद्ध चित्रकारी वाले मंदिर दुनिया भर में अपनी पहचान रखते हैं। बागपत में गुर्जर प्रतिहार काल के इसी चित्रकारीयुक्त स्तम्भ धूल फांक रहे हैं। इतिहास को संजोने और इन पैनल को संग्रहालय में रखवाने की पहल तक नहीं की गई। उत्तर भारत में प्रतिहार राजाओं के समय में मंदिरों के मुख्य गेट इस तरह की चित्रकारी और मूर्तियां बनाई जाती थी। प्रतिहार राजाओं ने जिले में चार जगहों पर गौरी के मंदिर बनवाए थे, यह बात शोध में सामने आ चुकी है।
जिले के बड़ा गांव उर्फ रावण का ऐतिहासिक महत्व है। किवदंती है कि इसी गांव में रावण ने देवी की पूजा की थी। आज यह पौराणिक मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गया है। वर्तमान में टीले पर मंशा देवी का मंदिर है और इसके आसपास सदियों का इतिहास दबा है। मंशा देवी के मंदिर के परिसर में ही दो स्तम्भ पड़े हैं, इन पर खजुराहो जैसी चित्रकारी और मूर्तियां उकेरी गई है। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन बताते हैं कि उत्तर भारत में गुर्जर प्रतिहार काल के ये पैनल हैं। मिट्टी से निकले और इसके बाद यहां मंदिर परिसर में रखवा दिए गए। प्रतिहार राजाओं ने ही गौरी के मंदिरों का निर्माण कराया और उनके गेट इस तरह के स्तम्भ बनवाए थे। खजुराहो के बाद ऐसी चित्रकारी के स्तम्भ सिर्फ बागपत में ही देखने को मिले थे। बड़ागांव के अलावा प्रतिहार काल में रटौल, बिराल में भी मंदिर बनवाए गए थे। संग्रहालय नहीं होने और देखरेख के अभाव में यह धूल फांक रहे हैं। भगवान विष्णु की दुर्लभ तस्वीर वर्तमान में भी मंशा देवी के मंदिर में मौजूद है।
इसलिए भी जुड़ाव की पुष्टि
बागपत। प्रतिहार शासन काल में जैन धर्म का अधिक विस्तार हुआ। यही नहीं नाग भट्ट द्वितीय को आध्यात्मिक गुरु माना गया है। कई जैन मंदिर इस काल में बनवाए गए। बड़ागांव में जिस स्थान पर देवी का का मंदिर है, इसके निकट जैन समाज का अतिशय क्षेत्र भी है, जिसे त्रिलोक तीर्थ धाम के नाम से जाना जाता है।
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बिखरता इतिहास, इसे कौन संजोए
बागपत। मंशा देवी मंदिर के आसपास कई-कई फुट गहरे खेत हैं। मंदिर टीले पर है, खेत गहरे हो जाने के कारण यहां इतिहास की झलक स्पष्ट मिलती है। खाई में हजारों साल पुरानी ईंटें और दीवारें साफ नजर आती हैं, लेकिन इसे संजोने का कभी प्रयास नहीं किया गया। यहां मिट्टी के पुराने बर्तन मिल चुके हैं। इतिहासकार अमित राय जैन बताते हैं कि गुप्त कालीन ईंटें, प्रतिहार काल के स्तम्भ और बर्तन भी मिले हैं। भगवान विष्णु की प्रतिमा के अलावा यहां राजा भोज और इसके बाद मुगल काल के इतिहास की झलक मिलती है, लेकिन इतिहास को संजोने पर किसी का भी ध्यान नहीं है। यहां उत्खनन कार्य होना चाहिए, ताकि इतिहास की परतें खुल सकें।
एक्सप्रेस-वे में भी प्रयोग की मिट्टी
बागपत। ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे के निर्माण के दौरान किसानों के खेतों से मिट्टी उठाई गई। मिट्टी उठान के दौरान भी यहां से कई ऐतिहासिक पुरावशेष मिले हैं। इस खोदाई के चलते यहां पर यह खेत गहरे हुए हैं। किसान प्रदीप त्यागी का कहना है कि हाईवे के लिए मिट्टी की खोदाई कराई गई है। हजारों साल पुरानी ईंटें आज भी यहां मौजूद हैं।
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बागपत। खजुराहो के स्त्री-पुरुष की आलिंगनबद्ध चित्रकारी वाले मंदिर दुनिया भर में अपनी पहचान रखते हैं। बागपत में गुर्जर प्रतिहार काल के इसी चित्रकारीयुक्त स्तम्भ धूल फांक रहे हैं। इतिहास को संजोने और इन पैनल को संग्रहालय में रखवाने की पहल तक नहीं की गई। उत्तर भारत में प्रतिहार राजाओं के समय में मंदिरों के मुख्य गेट इस तरह की चित्रकारी और मूर्तियां बनाई जाती थी। प्रतिहार राजाओं ने जिले में चार जगहों पर गौरी के मंदिर बनवाए थे, यह बात शोध में सामने आ चुकी है।
जिले के बड़ा गांव उर्फ रावण का ऐतिहासिक महत्व है। किवदंती है कि इसी गांव में रावण ने देवी की पूजा की थी। आज यह पौराणिक मंदिर जीर्ण-शीर्ण हो गया है। वर्तमान में टीले पर मंशा देवी का मंदिर है और इसके आसपास सदियों का इतिहास दबा है। मंशा देवी के मंदिर के परिसर में ही दो स्तम्भ पड़े हैं, इन पर खजुराहो जैसी चित्रकारी और मूर्तियां उकेरी गई है। शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन बताते हैं कि उत्तर भारत में गुर्जर प्रतिहार काल के ये पैनल हैं। मिट्टी से निकले और इसके बाद यहां मंदिर परिसर में रखवा दिए गए। प्रतिहार राजाओं ने ही गौरी के मंदिरों का निर्माण कराया और उनके गेट इस तरह के स्तम्भ बनवाए थे। खजुराहो के बाद ऐसी चित्रकारी के स्तम्भ सिर्फ बागपत में ही देखने को मिले थे। बड़ागांव के अलावा प्रतिहार काल में रटौल, बिराल में भी मंदिर बनवाए गए थे। संग्रहालय नहीं होने और देखरेख के अभाव में यह धूल फांक रहे हैं। भगवान विष्णु की दुर्लभ तस्वीर वर्तमान में भी मंशा देवी के मंदिर में मौजूद है।
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इसलिए भी जुड़ाव की पुष्टि
बागपत। प्रतिहार शासन काल में जैन धर्म का अधिक विस्तार हुआ। यही नहीं नाग भट्ट द्वितीय को आध्यात्मिक गुरु माना गया है। कई जैन मंदिर इस काल में बनवाए गए। बड़ागांव में जिस स्थान पर देवी का का मंदिर है, इसके निकट जैन समाज का अतिशय क्षेत्र भी है, जिसे त्रिलोक तीर्थ धाम के नाम से जाना जाता है।
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बिखरता इतिहास, इसे कौन संजोए
बागपत। मंशा देवी मंदिर के आसपास कई-कई फुट गहरे खेत हैं। मंदिर टीले पर है, खेत गहरे हो जाने के कारण यहां इतिहास की झलक स्पष्ट मिलती है। खाई में हजारों साल पुरानी ईंटें और दीवारें साफ नजर आती हैं, लेकिन इसे संजोने का कभी प्रयास नहीं किया गया। यहां मिट्टी के पुराने बर्तन मिल चुके हैं। इतिहासकार अमित राय जैन बताते हैं कि गुप्त कालीन ईंटें, प्रतिहार काल के स्तम्भ और बर्तन भी मिले हैं। भगवान विष्णु की प्रतिमा के अलावा यहां राजा भोज और इसके बाद मुगल काल के इतिहास की झलक मिलती है, लेकिन इतिहास को संजोने पर किसी का भी ध्यान नहीं है। यहां उत्खनन कार्य होना चाहिए, ताकि इतिहास की परतें खुल सकें।
एक्सप्रेस-वे में भी प्रयोग की मिट्टी
बागपत। ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे के निर्माण के दौरान किसानों के खेतों से मिट्टी उठाई गई। मिट्टी उठान के दौरान भी यहां से कई ऐतिहासिक पुरावशेष मिले हैं। इस खोदाई के चलते यहां पर यह खेत गहरे हुए हैं। किसान प्रदीप त्यागी का कहना है कि हाईवे के लिए मिट्टी की खोदाई कराई गई है। हजारों साल पुरानी ईंटें आज भी यहां मौजूद हैं।