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Mau Lok Sabha: जब कल्पनाथ राय की पत्नी और बेटे हुए एक-दूसरे के विरोधी, कायम था सियासी दबदबा

Thu, 18 Apr 2024 07:29 PM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, मऊ
अमर उजाला नेटवर्क, मऊ Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Thu, 18 Apr 2024 07:29 PM IST
सार

Mau Lok Sabha: पत्रकार रामकृष्ण द्विवेदी ने इंदिरा गांधी के प्रचार की बदौलत मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह को करीब 15,000 वोटों से पराजित किया था। भारत के इतिहास में ये पहला मौका था जब कोई मुख्यमंत्री इस तरह उपचुनाव में पराजित हुआ था। चुनाव परिणाम तब आया जब सदन में राज्यपाल का अभिभाषण चल रहा था। टीएन सिंह ने भाषण के बीच में अपने इस्तीफे की घोषणा करके सबको चौंका दिया था। 

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When Kalpnath Rai wife and son were against each other in mau lok sabha election
राजनीतिक बिसात - फोटो : प्रतीकात्मक

विस्तार

लोकसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ गई है। 'राजग' और 'इंडी' गठबंधन के साथ-साथ अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी राजनीतिक बिसात पर मोहरे चलने शुरू कर दिए हैं। पूर्वांचल में सियासी ताप आसानी से महसूस हो रही है। घोसी संसदीय सीट पर सुभासपा और सपा ने अपने-अपने उम्मीदवारों के नाम का एलान कर दिया है। सुभासपा के टिकट पर अरविंद राजभर मैदान में हैं जबकि सपा ने राजीव राय को इस सीट से चुनाव मैदान में उतारा है।

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अतीत के चुनाव परिणामों की बात करें तो इस सीट पर दो दशक तक दिग्गज कांग्रेसी कल्पनाथ राय का दबदबा था। उन्हें पूर्वांचल में विकास पुरुष के नाम से जाना जाता था। कभी वामपंथियों और उसके बाद कांग्रेस का गढ़ रहे घोसी संसदीय क्षेत्र में अब स्व. कल्पनाथ राय की विरासत और कांग्रेस की सियासत के साथ ही वामपंथियों की राजनीति भी पूरी तरह हाशिए पर है। 
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अंतिम बार 1998 में कांग्रेस ने यहां जीत दर्ज की थी। 1999 के चुनाव में कांग्रेस में कल्पनाथ राय की राजनीतिक विरासत को लेकर परिवार में घमासान दिखा। अपने पिता की विरासत बचाने को लेकर उनके बेटे सिद्धार्थ राय जदयू के टिकट पर चुनाव में उतरे। कांग्रेस के टिकट पर कल्पनाथ राय की पत्नी सुधा राय मैदान में उतरी। मगर दोनों को हार का सामना करना पड़ा।
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जब इंदिरा गांधी ने धुरंधर कांग्रेसी टीएन सिंह के खिलाफ मांगा वोट
पीडीडीयू नगर। आमतौर पर प्रधानमंत्री विधानसभा के उपचुनाव में प्रचार करने नहीं जाता, लेकिन मार्च 1971 में हुए विधानसभा उपचुनाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ख़ुद कांग्रेस के उम्मीदवार रामकृष्ण द्विवेदी के समर्थन में प्रचार करने गोरखपुर के मानीराम गई थीं। इसकी वजह ये थी कि कांग्रेस का विभाजन हो चुका था और त्रिभुवन नारायण सिंह, मोरारजी देसाई और चंद्रभानु गुप्त के समर्थक थे। इसलिए इंदिरा गांधी नहीं चाहती थीं कि मानीराम से टीएन सिंह विधानसभा के सदस्य बनें।

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