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नसोपुर की रामलीला: मंथरा ने लगाया अयोध्या में ग्रहण, राम गए वनवास
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बढुआ गोदाम। नगर क्षेत्र के नसोपुर में चल रही रामलीला में रविवार की रात में रामवन गमन की लीला का मंचन हुआ। इस प्रसंग के दौरान अयोध्यावासियों के शोकमग्न होने के सजीव प्रदर्शन को देख कर पंडाल में उपस्थित दर्शक भी गमगीन नजर आए।
मंचित लीला में अयोध्या में राम विवाह के पश्चात राजा दशरथ अपने मंत्री एवं सखा सुमन्त से विचार विमर्श करते हैं कि अब उम्र को देखते हुए अयोध्या की बागडोर राम के हाथों सौंपकर वानप्रस्थ आश्रम को प्रस्थान किया जाए। गहन मंत्रणा के बाद अयोध्या में राम को राज्य देने की तैयारी शुरू हो जाती है। पूरे नगर में साफ-सफाई रंगरोगन शुरू हो जाता है। राम के राजा बनाए जाने की सूचना पाकर हर अयोध्यावासी प्रसन्न है। तभी देवताओं की प्रेरणा से महारानी कैकेई की प्रिय दासी मंथरा को यह बात चुभ जाती है। वह राम के राजा बनने की बात पर कैकेई को भड़का देती है, परिणामस्वरूप कैकेई राजा दशरथ से राम को वनवास एवं भरत को राज तिलक देने के लिए मजबूर कर देती है। राम के राजतिलक के उल्लास में डूबी अयोध्या राम के वन जाने की सूचना से शोक में डूब जाती है। तमाम प्रयासों के बाद भी राम अपने पिता के आदेश के पालन के क्रम में वन जाने की तैयारी करते हैं। राम के साथ ही जानकी और लक्ष्मण भी वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। रात के अंधेरे में वन के लिए राम के प्रस्थान करने के पश्चात सरयू तट पर राम की मुलाकात निषादराज केवट से होती है। राम वन गमन की लीला में अजय तिवारी ने दशरथ, गोलू तिवारी ने सखे सुमंत, मनोज यादव ने कैकेई, पंकज तिवारी ने केवट, दुर्ग विजय तिवारी ने डहकू, गुड्डू सिंह ने चपेटू की भूमिका निभाई। इस दौरान प्रेम शंकर सिंह, शेषनाथ यादव, निवर्तमान कार्यवाहक अध्यक्ष अंजनी सिंह, हरि गोविंद तिवारी, धीरेंद्र प्रताप सिंह आदि रहे। व्यास पीठ पर परमानंद शर्मा एवं केशरी उपाध्याय ने शृंगार किया।
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मंचित लीला में अयोध्या में राम विवाह के पश्चात राजा दशरथ अपने मंत्री एवं सखा सुमन्त से विचार विमर्श करते हैं कि अब उम्र को देखते हुए अयोध्या की बागडोर राम के हाथों सौंपकर वानप्रस्थ आश्रम को प्रस्थान किया जाए। गहन मंत्रणा के बाद अयोध्या में राम को राज्य देने की तैयारी शुरू हो जाती है। पूरे नगर में साफ-सफाई रंगरोगन शुरू हो जाता है। राम के राजा बनाए जाने की सूचना पाकर हर अयोध्यावासी प्रसन्न है। तभी देवताओं की प्रेरणा से महारानी कैकेई की प्रिय दासी मंथरा को यह बात चुभ जाती है। वह राम के राजा बनने की बात पर कैकेई को भड़का देती है, परिणामस्वरूप कैकेई राजा दशरथ से राम को वनवास एवं भरत को राज तिलक देने के लिए मजबूर कर देती है। राम के राजतिलक के उल्लास में डूबी अयोध्या राम के वन जाने की सूचना से शोक में डूब जाती है। तमाम प्रयासों के बाद भी राम अपने पिता के आदेश के पालन के क्रम में वन जाने की तैयारी करते हैं। राम के साथ ही जानकी और लक्ष्मण भी वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। रात के अंधेरे में वन के लिए राम के प्रस्थान करने के पश्चात सरयू तट पर राम की मुलाकात निषादराज केवट से होती है। राम वन गमन की लीला में अजय तिवारी ने दशरथ, गोलू तिवारी ने सखे सुमंत, मनोज यादव ने कैकेई, पंकज तिवारी ने केवट, दुर्ग विजय तिवारी ने डहकू, गुड्डू सिंह ने चपेटू की भूमिका निभाई। इस दौरान प्रेम शंकर सिंह, शेषनाथ यादव, निवर्तमान कार्यवाहक अध्यक्ष अंजनी सिंह, हरि गोविंद तिवारी, धीरेंद्र प्रताप सिंह आदि रहे। व्यास पीठ पर परमानंद शर्मा एवं केशरी उपाध्याय ने शृंगार किया।
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