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शहीदों के बलिदान को रखें याद
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
Updated Sun, 24 Jan 2016 11:11 PM IST
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सरायसादी जनता जूनियर हाईस्कूल में रविवार को शहीद बंधु चौहान व स्वतंत्रता सेनानी सुदामा चौहान की स्मृति में ‘जरा याद करो कुर्बानी’ समारोह में 29 शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई।
विभिन्न दलों के राजनेताओं और शिक्षाविदों ने अपने विचार रखते हुए कहा कि शहीदों के बलिदान को याद करते हुए ही बेहतर भविष्य की कल्पना की जा सकती है। समाज व देश सही मायने में तरक्की तभी कर सकता है जब शहीदों के बलिदान से प्रेरणा ली जाए।
समारोह में आजमगढ़ से कांग्रेस के पूर्व सांसद डॉ. संतोष सिंह ने कहा कि कोई भी आहुति चंद लोगों द्वारा नहीं होती। यज्ञ तब पूर्ण होता है जब सहयोग करने वालों की श्रृंखला हो। आजादी दिलाने में महती भूमिका महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह जैसे महानायकों की रही है।
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लेकिन अंग्रेजों से जंग लड़ रहे जांबाजों की मदद करने, संरक्षण देने वाले भी सेनानी की ही श्रेणी में आएंगे। उन्होंने प्यास से तड़प रहे कुंवर सिंह व उनके साथियों को अजमतगढ़ में कुएं में ही चीनी डालकर पानी पिलाने वाले गोगा साव व भीमा साव का उदाहरण भी दिया।
उन्होंने विकसित भारत का ख्वाब पूरा होने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति व सभ्यता को आवश्यक बताया। समारोह में शिरकत कर रहे बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. आनंद मिश्रा दीपायन ने कहा कि देश को आजाद कराने के लिए बंधु चौहान सरीखे लोग उस समय पीछे नहीं हटे, जब उन्हें पता था कि कदम आगे बढ़ाने पर उन्हें यातना, जेल या मौत नसीब होगी।
उन्होंने आजादी दिलाने में चंद वर्ग के लोगों की ही भूमिका बताए जाने पर नाराजगी जताई। कहा कि आज यहां पर जिन 29 शहीदों की कुर्बानी याद की जा रही है उन्हें भुलाने की कोशिश की गई। उन्होंने अतीत में खोते जा रहे सेनानियों की शहादत से नई पीढ़ी को परिचित कराने व उससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता बताई।
बलिया के भाजपा नेता व पूर्व मंत्री राजधारी सिंह ने कहा कि 1857 का गदर रहा हो या 1942 का आंदोलन, दोनों में पूर्वांचल के वीर सपूतों ने कुर्बानी दी। उन्होंने भोगवादी संस्कृति में हो रही लिप्तता पर चिंता जताते हुए शहीदों से प्रेरणा लेकर आतंकवाद व सामाजिक सद्भाव को मिटाने की जंग को आजादी की तरह ही लेने की जरूरत बताई।
समारोह की आयोजक जिला निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य शकुंतला चौहान ने कहा कि देश की आजादी की लड़ाई लड़ते समय कोई जाति-पाति नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद चुनावी समीकरण व वोट की राजनीति ने उथल-पुथल मचा दिया।
इसका खामियाजा है कि आज कि राजनीति भी अपनी दिशा से भटक गई है। हमारा देश ऐसा हो जहां लोगों के दिलों में जाति-धर्म नहीं बल्कि इंसानियत बसती हो। विधिचंद चौहान ने आगंतुकों का आभार जताया। संचालन प्रमोद राय ने किया।
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विभिन्न दलों के राजनेताओं और शिक्षाविदों ने अपने विचार रखते हुए कहा कि शहीदों के बलिदान को याद करते हुए ही बेहतर भविष्य की कल्पना की जा सकती है। समाज व देश सही मायने में तरक्की तभी कर सकता है जब शहीदों के बलिदान से प्रेरणा ली जाए।
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समारोह में आजमगढ़ से कांग्रेस के पूर्व सांसद डॉ. संतोष सिंह ने कहा कि कोई भी आहुति चंद लोगों द्वारा नहीं होती। यज्ञ तब पूर्ण होता है जब सहयोग करने वालों की श्रृंखला हो। आजादी दिलाने में महती भूमिका महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, भगत सिंह जैसे महानायकों की रही है।
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लेकिन अंग्रेजों से जंग लड़ रहे जांबाजों की मदद करने, संरक्षण देने वाले भी सेनानी की ही श्रेणी में आएंगे। उन्होंने प्यास से तड़प रहे कुंवर सिंह व उनके साथियों को अजमतगढ़ में कुएं में ही चीनी डालकर पानी पिलाने वाले गोगा साव व भीमा साव का उदाहरण भी दिया।
उन्होंने विकसित भारत का ख्वाब पूरा होने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति व सभ्यता को आवश्यक बताया। समारोह में शिरकत कर रहे बीएचयू के प्रोफेसर डॉ. आनंद मिश्रा दीपायन ने कहा कि देश को आजाद कराने के लिए बंधु चौहान सरीखे लोग उस समय पीछे नहीं हटे, जब उन्हें पता था कि कदम आगे बढ़ाने पर उन्हें यातना, जेल या मौत नसीब होगी।
उन्होंने आजादी दिलाने में चंद वर्ग के लोगों की ही भूमिका बताए जाने पर नाराजगी जताई। कहा कि आज यहां पर जिन 29 शहीदों की कुर्बानी याद की जा रही है उन्हें भुलाने की कोशिश की गई। उन्होंने अतीत में खोते जा रहे सेनानियों की शहादत से नई पीढ़ी को परिचित कराने व उससे प्रेरणा लेने की आवश्यकता बताई।
बलिया के भाजपा नेता व पूर्व मंत्री राजधारी सिंह ने कहा कि 1857 का गदर रहा हो या 1942 का आंदोलन, दोनों में पूर्वांचल के वीर सपूतों ने कुर्बानी दी। उन्होंने भोगवादी संस्कृति में हो रही लिप्तता पर चिंता जताते हुए शहीदों से प्रेरणा लेकर आतंकवाद व सामाजिक सद्भाव को मिटाने की जंग को आजादी की तरह ही लेने की जरूरत बताई।
समारोह की आयोजक जिला निवर्तमान जिला पंचायत सदस्य शकुंतला चौहान ने कहा कि देश की आजादी की लड़ाई लड़ते समय कोई जाति-पाति नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद चुनावी समीकरण व वोट की राजनीति ने उथल-पुथल मचा दिया।
इसका खामियाजा है कि आज कि राजनीति भी अपनी दिशा से भटक गई है। हमारा देश ऐसा हो जहां लोगों के दिलों में जाति-धर्म नहीं बल्कि इंसानियत बसती हो। विधिचंद चौहान ने आगंतुकों का आभार जताया। संचालन प्रमोद राय ने किया।