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कार्तिक पूर्णिमा : सरकारी मेले का दर्जा देने के लिए भेजा प्रस्ताव
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दोहरीघाट। दो हरियों भगवान राम और परशुराम की मिलन स्थली दोहरीघाट में आदिकाल से लगने वाले ऐतिहासिक पौराणिक कार्तिक पूर्णिमा के मेले को सरकारी मेला घोषित करने की मांग का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।
उत्तर वाहिनी सरयू के तट पर आदिकाल से लगने वाला कार्तिक पूर्णिमा का पौराणिक और ऐतिहासिक मेला है। यह मेला दो दिनों तक रात और दिन लगता है। यह पूर्वांचल के हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। नगर पंचायत अध्यक्ष ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा मेले को सरकारी मेला का दर्जा देने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।
मेले में जिले के साथ आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर सहित विभिन्न जिलों से लाखों श्रद्धालु सरयू नदी में स्नान के लिए आते हैं। लेकिन सरयू नदी में आने वाली बाढ़ के चलते केवल रामघाट ही स्नान के लिए बचा है, बाकी के घाट कट गए हैं, इससे श्रद्धालु, जान जोखिम में डालकर बदहाल घाटों पर स्नान के लिए बाध्य हैं।
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वही अधिकांश मंदिर और धर्मशालाओं के नदी में विलीन होने के कारण श्रद्धालुओं को रात में रुकने में काफी दिक्कतों का सामाना करना पड़ता है। नगर पंचायत प्रशासन की तरफ से सीमित संसाधनों से मेले की साफ सफाई सहित अन्य कार्य का व्यवस्था की जाती है, जो अपर्याप्त है। लोगो का कहना है कि अगर प्रशासन इसे सरकारी मेला घोषित कर देता तो काफी हद तक लोगो की समस्याओं का समाधान हो जाता और श्रद्धालुओं को भी सहूलियत मिल जाती।
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उत्तर वाहिनी सरयू के तट पर आदिकाल से लगने वाला कार्तिक पूर्णिमा का पौराणिक और ऐतिहासिक मेला है। यह मेला दो दिनों तक रात और दिन लगता है। यह पूर्वांचल के हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। नगर पंचायत अध्यक्ष ने बताया कि कार्तिक पूर्णिमा मेले को सरकारी मेला का दर्जा देने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है।
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मेले में जिले के साथ आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, जौनपुर सहित विभिन्न जिलों से लाखों श्रद्धालु सरयू नदी में स्नान के लिए आते हैं। लेकिन सरयू नदी में आने वाली बाढ़ के चलते केवल रामघाट ही स्नान के लिए बचा है, बाकी के घाट कट गए हैं, इससे श्रद्धालु, जान जोखिम में डालकर बदहाल घाटों पर स्नान के लिए बाध्य हैं।
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वही अधिकांश मंदिर और धर्मशालाओं के नदी में विलीन होने के कारण श्रद्धालुओं को रात में रुकने में काफी दिक्कतों का सामाना करना पड़ता है। नगर पंचायत प्रशासन की तरफ से सीमित संसाधनों से मेले की साफ सफाई सहित अन्य कार्य का व्यवस्था की जाती है, जो अपर्याप्त है। लोगो का कहना है कि अगर प्रशासन इसे सरकारी मेला घोषित कर देता तो काफी हद तक लोगो की समस्याओं का समाधान हो जाता और श्रद्धालुओं को भी सहूलियत मिल जाती।