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बस नाम के हैं जन औषधि केंद्र, दवाओं की किल्लत

Fri, 09 Jul 2021 11:39 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 09 Jul 2021 11:39 PM IST
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Jan Aushadhi Kendras are just in name, there is a shortage of medicines
मऊ। जिले में सरकार की तरफ से जनता को सस्ती दवा दिलाने के संचालित प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्रों का लाभ जरूरतमंदों को मिलता नहीं दिख रहा है। विभागीय उदासीनता के कारण जिले में इसका प्रचार-प्रसार नहीं पा रहा है। वहीं सरकारी अस्पताल के डॉक्टर भी कमीशन के चक्कर में मरीजों को महंगी दवाएं लिखते हैं। इसके अलावा जनऔषधि केंद्र पर हर मर्ज की दवा भी उपलब्ध नहीं है, जिससे गरीब मरीजों को बाहर से महंगी दवा खरीदनी पड़ती है। इन खामियों के चलते जिला अस्पताल परिसर में प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र होने के बाद परसिर के बाहर निजी मेडिकल स्टोरों पर सरकारी अस्पताल के मरीजों की भीड़ आसानी से देखी जा सकती है।
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शुक्रवार को अमर उजाला की टीम ने जिला अस्पताल के ओपीडी में पहुंचकर पड़ताल की गई। इस दौरान किसी भी चिकित्सक के पास जेनेरिक दवाओं की सूची तक उपलब्ध नहीं मिली। जानकारी करने पर यह बात सामने आई कि जिले में कुल 13 जन औषधि केंद्र खोले गए हैैं। लेकिन इन दवाओं की दुकानों का कही प्रचार प्रसार नहीं किया गया है।
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जिला अस्पताल स्थित जन औषधि केंद्र पर पहुंचकर दवा के बारे में जानकारी की गई तो पता चला कि वहां महज 45 प्रकार की दवाएं मौजूद है। इसमें साधारण रोगों के साथ साथ कुछ एंटीबायोटिक शामिल थे। नाम न छापने की शर्त पर एक दवा विक्रेता ने बताया कि आर्डर देने के बाद भी दवा उपलब्ध नहीं होती। ऐसे में वो क्या करें, मरीज आते भी हैं लेकिन दवा नहीं रहती। इन बातों को जानकार भी अधिकारी मौन साधे हैं। दुकानदार ने बताया कि वह सीएमएस के साथ अन्य ओपीडी के डॉक्टरों को दुकान पर उपलब्ध दवाओं की सूची कई बाद दिया है। लेकिन दवा नहीं लिखी जाती।
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जिले में कुल 13 जन औषधि केंद्र मौजूद हैं। इसमें एक सदर अस्पताल के परिसर में दूसरा अस्पताल परिसर के बाहर मौजूद है। इसके अलावा एक भीटी में है। इसके बाद सभी शहर से बाहर मौजूद है। प्राइवेट को छोड़ दिया जाए तो सरकारी अस्पताल के चिकित्सक भी इस औषधि केंद्र की दवा नहीं लिखते। दवा के पर्चियों पर ब्रांडेड दवाएं ही लिखी मिल रही हैं।
वेतन लाखों में पर कमीशन का है मोह
मऊ। विभाग की तरफ से भी व्यापक प्रचार प्रसार न होने से जेनेरिक दवाओं के बारे में लोगों को जानकारी नहीं हो पा रही है। जिला अस्पताल के ओपीडी में चिकित्सकों के पास जेनरिक दवाओं की सूची तक उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। जिससे मरीजों को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। वहीं, ब्रांडेड दवा के थोक और अधिकतम खुदरा मूल्य में भारी अंतर होता है। कमीशन के चक्कर में चिकित्सक ब्रांडेड दवाओं को लिखने का मोह नहीं छोड़ पा रहे। हालात यह है कि जिला अस्पताल परिसर मेंही प्रधानमंत्री औषधि केंद्र तो बनाया गया है। लेकिन पहुंचने वाले मरीजों की संख्या सीमित ही रहती है।
क्या होती हैं जेनेरिक दवाएं
किसी दवा की पेटेंट अवधि जब एक बार खत्म हो जाए तो उसके बाद कोई भी कंपनी उस दवा का निर्माण और मार्केटिंग कर सकती है। इसके लिए उन्हें सबसे पहले उस दवा को बनाने वाली कंपनी से इजाजत लेने की जरुरत नहीं होती है। हर कंपनी को इस बात का ध्यान जरूर रखना पड़ता है कि जो जेनेरिक दवाई वो बना रही है, उसका असर उसकी मूल दवा जैसा ही हो। मतलब कॉपी की गई दवाई उतनी ही मात्रा में एक्टिव इंग्रेडिएंट रीलिज करता हो और शरीर के द्वारा उसी मात्रा में एब्जॉर्व किया जाए, जैसे ऑरिजनल दवा की होती है। ऐसी दवाएं जेनेरिक कही जाती हैं।जेनेरिक दवाओं को जब एक ट्रेड नाम या ब्रांड नाम के तहत बेचा जाए तो उसे ब्रांडेड जेनेरिक कहा जाता है।

ड्रग इंसपेक्टर अरविंद कुमार का कहना है कि जेनेरिक दवाओं को लेकर समय-समय पर प्रचार प्रसार कराया जाता है। मेडिकल स्टोरों पर बजट के हिसाब से दवाएं रखी जाती है।
सीएमओ डॉ. सतीश चंद्र सिंह ने बताया कि जिला अस्पताल, सीएचसी, पीएचसी के चिकित्सकों के यहां जेनेरिक दवाओं की सूची उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है।
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