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मुक्ति हेतु काम क्रोध लोभ मोह को त्यागना ही भगवान की भक्ती
Updated Sun, 09 Sep 2018 11:32 PM IST
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मुहम्मदाबाद गोहना क्षेत्र के सुतरही गांव में रविवार को संत निरंकारी सत्संग भवन की ओर से सत्संग का आयोजन किया गया। जिसमें महात्मा रामूराम ने श्रद्धालुओं को भगवान की भक्ति के आड़े आने वाले काम, लोभ, क्रोध पर प्रवचन दिया।
उन्होंने प्रवचन में बताया कि भगवान कण-कण में विराजमान हैं। हमें सच्चे हृदय और सच्चे मन से उन्हें तलाशना होगा, तभी हमें निरंकार ब्रह्म का दर्शन हो सकता है। जब इंसान अपने मन का अभिमान छोड़ कर गुरु की शरण में आ जाता है, तो उसको एक पल में जीवन-मुक्ति प्राप्त हो जाती है। जीवन-मुक्ति का भाव है इस संसार में रहते हुए परम ब्रह्म परमात्मा में अभेद हो जाना, इसको अपना बना लेना। दुनिया तो समझती है की इस शरीर के होते हुए मुक्ति हो ही नहीं सकती, जीते जी आत्मा परमात्मा की हो ही नहीं सकती। मुक्ति पाने के लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से भरे शारीर को त्यागना पड़ता है। जरूरत शारीर त्यागने की नहीं, उपरोक्त इन विषयों को त्यागने की है। महात्मा रामू राम ने सम्मेलन के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं को कहा कि हमें अपने शरीर को त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं हमारे अंदर जो अंधविश्वास भौतिकता के पीछे की दौड़ एवं अहंकार भरा हुआ है उससे त्यागने की जरूरत है।
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उन्होंने प्रवचन में बताया कि भगवान कण-कण में विराजमान हैं। हमें सच्चे हृदय और सच्चे मन से उन्हें तलाशना होगा, तभी हमें निरंकार ब्रह्म का दर्शन हो सकता है। जब इंसान अपने मन का अभिमान छोड़ कर गुरु की शरण में आ जाता है, तो उसको एक पल में जीवन-मुक्ति प्राप्त हो जाती है। जीवन-मुक्ति का भाव है इस संसार में रहते हुए परम ब्रह्म परमात्मा में अभेद हो जाना, इसको अपना बना लेना। दुनिया तो समझती है की इस शरीर के होते हुए मुक्ति हो ही नहीं सकती, जीते जी आत्मा परमात्मा की हो ही नहीं सकती। मुक्ति पाने के लिए काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से भरे शारीर को त्यागना पड़ता है। जरूरत शारीर त्यागने की नहीं, उपरोक्त इन विषयों को त्यागने की है। महात्मा रामू राम ने सम्मेलन के अंत में उपस्थित श्रद्धालुओं को कहा कि हमें अपने शरीर को त्यागने की कोई आवश्यकता नहीं हमारे अंदर जो अंधविश्वास भौतिकता के पीछे की दौड़ एवं अहंकार भरा हुआ है उससे त्यागने की जरूरत है।
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