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Mathura News: द्वापरकालीन दृश्य साकार, घाटों-मंदिरों तक पहुंची यमुना

Wed, 19 Jul 2023 11:56 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा Updated Wed, 19 Jul 2023 11:56 PM IST
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The scene of Dwapar period came true, Yamuna reached the ghats and temples
मथुरा। यमुना में आई बाढ़ ने ब्रजवासियों को एक बार फिर द्वापरयुगीन लीलाओं का भान करा दिया। वर्ष 2010 के बाद यमुना में आई बाढ़ को मथुरा-वृंदावन के मंहत, संत और पुरोहित बाढ़ नहीं मान रहे बल्कि इसे भगवत कृपा मानकर सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं और वृंदावन में तो यमुना पुलिन उत्सव मना रहे हैं। वृंदावन में करीब 500 वर्ष पुराने ठाकुर मदनमोहन मंदिर को यमुना ने छू लिया और मंदिर के नीचे परिक्रमा मार्ग में बहने लगी। इसे देख भक्त आल्हादित हो उठे और आराध्य ठाकुर मदनमोहन का स्मरण करने लगे। यमुना वृंदावन के चीरघाट, केशीघाट, कालीदह, भ्रमरघाट एवं पौराणिक स्थल ज्ञानगुदड़ी तक पहुंच चुकी है।
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भले ही दिल्ली में बाढ़ आई हो, लेकिन ब्रज में मां यमुना की आगमन से पूरा ब्रज मंडल आनंदित हो रहा है। ब्रजजन संत समाज के मुख से यह नहीं निकल रहा की बाढ़ आ गई, हर ओर एक ही शब्द, एक ही बात और एक ही आवाज कि मां यमुना आ गई है। बीते दिनों महावन स्थित रमणरेती आश्रम के महंत कार्ष्णि गुरु शरणानंद ने हर्षोल्लास के साथ मां युमना का स्वागत किया। उन्होंने जल में भावपूर्ण स्नान और पूजन किया। रमण बिहारी महाराज को नाव में बैठाकर यमुना की सैर कराई। इससे सभी संत प्रेरित हो गए और अपने-अपने धाम में मां यमुना का पूजन करने के साथ ही नौका लीला आदि होने लगे।
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राधावल्लभ मंदिर, श्री सुदामा कुटी, जगन्नाथ घाट व कात्यायनी मंदिर सहित अनेक आश्रमों में भक्तों ने मां के आगमन का स्वागत किया। उधर, यमुना में बाढ़ आने से वर्षों से मिट्टी में दबे घाटों पर पिछले एक सप्ताह से यमुना की लहर हिलोर मार रही हैं। धार्मिक महत्व को खुद में समेटे आधा दर्जन घाटों पर यमुना जल की कलकल यहां लोगों को आनंदित कर रही है। यमुना का जल चक्रतीर्थघाट, गऊघाट, कृष्णगंगा घाट, मुरलीधर घाट पर तक पहुंचा।
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वृंदावन के जगदीश गुरुजी ने कहा कि यमुना भगवान कृष्ण की पटरानी है। वह समय-समय पर अपने पौराणिक स्थलों पर आकर ब्रजवासियों को कृष्णकालीन लीलाओं का दर्शन कराने के साथ ही स्मरण कराती हैं कि ये वही स्थल हैं, जहां भगवान कृष्ण और गोपियों ने लीलाएं कीं। द्वापरयुगीन ज्ञानगुदड़ी, वह स्थान है, जहां भगवान कृष्ण से बिछुड़ने के बाद गोपियों को ज्ञान देने उद्धव आए थे। ऐसे पावन स्थल पर यमुना के आने से ब्रजवासी यमुना पुलिन उत्सव मना रहे हैं।


गऊघाट
इसे सोमनाथ घाट के नाम से भी पहचाना जाता है। यहां सोमेश्वर महादेव का मंदिर होने के कारण इसे यह नाम मिला है। कहते है कि इस स्थान पर मथुरा की गायें यमुना में पानी पीने के लिए आती थी, जिससे इसे गऊघाट कहने लगे। देखरेख के अभाव में घाट की स्थिति बेहद खराब हो चुकी है। यहां तक यमुना का जल न होने के कारण भक्तों ने भी यहां आना बंद कर दिया है। लेकिन आज यमुना यहां हिलोर ले रही है।
नरेश शर्मा बब्बू पंडित, गऊघाट

कृष्णगंगाघाट
माना जाता है कि कृष्णगंगा घाट पर महर्षि वेद व्यास द्वारा चार वेद, 18 पुराणों का लेखन संकलित किया गया है, जिससे व्यास जी का नाम कृष्णद्वापायन भी पड़ा है। इसका वर्णन ब्रह्म पुराण और पदम पुराण में मिलता है। यहां पर कालिंदेश्वर महादेव का मंदिर भी है, जिनके संबंध में कहा कि यहां जपतप करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह घाट वास्तुकला की दृष्टि से बेहद खूबसूरत है। स्थानीय लोगों के सहयोग से यहां का रखरखा होता है, लेकिन यमुना जल के अभाव में यह घाट भी अपना अस्तित्व खो रहा था। आज यमुना का पानी आने से इसका पौराणिक स्वरूप निखर गया है।
योगेश आवा, कृष्णगंगा लाल दरवाजा

चक्रतीर्थ घाट
कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण महाभारत युद्ध काल के बाद जब यहां आए तो उन्होंने यमुना के तट पर अपने चक्र को रखा, इसीलिए इसे चक्रतीर्थघाट कहा जाने लगा। यह घाट भी निर्माण कला की दृष्टि से बहुत सुंदर है। हालांकि पिछले कई सालों से मिट्टी में पूरी तरह से दब चुका था। इसके पास कई वर्षो से यमुना जल की धारा नहीं आई है। आठ दिन पहले यहां यमुना ने एक बार फिर प्राचीन काल की यादों को जीवंत किया है।

नानकचंद माहौर, माया टीला
मुरलीधर घाट

अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासंघ के ब्रज प्रांत महामंत्री पंडित अमित भारद्वाज ने बताया कि मुरलीधर घाट वही घाट है जहां, छड़ीमार होली का आयोजन होता है। गोकुल बैराज बनने से पहले पौराणिक मुरलीधर घाट पर यमुना प्रवाहित होती थी। आज यमुना जी यहां फिर से पहुंच गई है।गोकुल के तीर्थ पुरोहित केशवदेव दीक्षित का कहना है कि प्राचीन मुरलीधर घाट का बड़ा महत्व है। द्वापरयुगीन इसी घाट पर गोचारण लीला के समय भगवान कृष्ण ने अपने अधरों से पहली बार मुरली बजाई थी। तभी से भगवान कृष्ण का नाम मुरलीधर पड़ा। यमुना के इस कृष्णकालीन स्थल पर आने से ब्रजवासी अपने आप को धन्य समझ रहे हैं।
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