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Mathura News: जल संकट और अनियोजित विकास की समस्या
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वृंदावन। वृंदावन में गहराते जल संकट, गिरते भूजल स्तर, अनियोजित विकास और पर्यावरणीय क्षति को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम ज्ञापन भेजकर उच्चस्तरीय जांच और प्रभावी कार्रवाई की मांग की गई है। आरोप लगाया गया है कि बीते दो दशकों में अनियोजित विकास और भ्रष्टाचार के कारण वृंदावन की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हुई है।
ज्ञापन में कहा गया है कि छटीकरा से चैतन्य विहार, बांके बिहारी बगीचा और टीबी अस्पताल तक बहने वाली पारंपरिक छोटी नहरें (गूल) तथा यमुना से ब्रह्मकुंड तक जल पहुंचाने वाली जलधाराएं समाप्त हो चुकी हैं। इन जल स्रोतों के बंद होने से भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण रुक गया है, जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और कई क्षेत्रों में खारे पानी की समस्या उत्पन्न हो गई है। क्षेत्रवासियों ने यह भी आरोप लगाया कि शहर में बड़ी संख्या में संचालित आरओ प्लांट, अवैध ट्यूबवेल तथा अनियंत्रित भूजल दोहन ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है। उनका कहना है कि अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने से पेयजल, यातायात और अन्य मूलभूत सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ा है। ज्ञापन में वृंदावन के तेजी से हो रहे अनियोजित शहरीकरण पर भी चिंता व्यक्त की गई है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि कभी हरियाली और तुलसी वनों के लिए प्रसिद्ध वृंदावन आज कंक्रीट के जंगल में बदलता जा रहा है।
बहुमंजिला इमारतों, फ्लैटों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के निर्माण से शहर की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा है। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) द्वारा विकसित कॉलोनियों रुक्मिणी विहार, चैतन्य विहार और कैलाश नगर में तेजी से होटल, गेस्ट हाउस और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बढ़ने से यातायात जाम, जल संकट और नागरिक सुविधाओं की समस्याएं विकराल हो गई हैं। साथ ही जंगल और हरित क्षेत्र घटने से वन्य जीवों एवं बंदरों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हुआ है। क्षेत्रवासियों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पिछले लगभग 20 वर्षों में वृंदावन में हुए अनियोजित विकास, अवैध निर्माण और कथित भ्रष्टाचार की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तथा दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए। ज्ञापन देने वालों में प्रमोद शर्मा, नरेंद्र सिंह, महेन्द्र, उमा, राहुल, गिरधर, विनोद, गोपी आदि शामिल हैं।
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ज्ञापन में कहा गया है कि छटीकरा से चैतन्य विहार, बांके बिहारी बगीचा और टीबी अस्पताल तक बहने वाली पारंपरिक छोटी नहरें (गूल) तथा यमुना से ब्रह्मकुंड तक जल पहुंचाने वाली जलधाराएं समाप्त हो चुकी हैं। इन जल स्रोतों के बंद होने से भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण रुक गया है, जिससे भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है और कई क्षेत्रों में खारे पानी की समस्या उत्पन्न हो गई है। क्षेत्रवासियों ने यह भी आरोप लगाया कि शहर में बड़ी संख्या में संचालित आरओ प्लांट, अवैध ट्यूबवेल तथा अनियंत्रित भूजल दोहन ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है। उनका कहना है कि अवैध निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने से पेयजल, यातायात और अन्य मूलभूत सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ा है। ज्ञापन में वृंदावन के तेजी से हो रहे अनियोजित शहरीकरण पर भी चिंता व्यक्त की गई है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि कभी हरियाली और तुलसी वनों के लिए प्रसिद्ध वृंदावन आज कंक्रीट के जंगल में बदलता जा रहा है।
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बहुमंजिला इमारतों, फ्लैटों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के निर्माण से शहर की सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा है। मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) द्वारा विकसित कॉलोनियों रुक्मिणी विहार, चैतन्य विहार और कैलाश नगर में तेजी से होटल, गेस्ट हाउस और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बढ़ने से यातायात जाम, जल संकट और नागरिक सुविधाओं की समस्याएं विकराल हो गई हैं। साथ ही जंगल और हरित क्षेत्र घटने से वन्य जीवों एवं बंदरों का प्राकृतिक आवास भी प्रभावित हुआ है। क्षेत्रवासियों ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि पिछले लगभग 20 वर्षों में वृंदावन में हुए अनियोजित विकास, अवैध निर्माण और कथित भ्रष्टाचार की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए तथा दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए। ज्ञापन देने वालों में प्रमोद शर्मा, नरेंद्र सिंह, महेन्द्र, उमा, राहुल, गिरधर, विनोद, गोपी आदि शामिल हैं।
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