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Mathura News: जीआई टैग से जरी पोशाक की विशिष्टता को मिली कानूनी सुरक्षा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 17 Nov 2025 01:20 AM IST
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The GI tag provides legal protection to the uniqueness of the brocade garment.
जरी की पोशाक तैयार करती महिला कारीगर।
मथुरा। ब्रज क्षेत्र की विश्व प्रसिद्ध ठाकुरजी की जरी पोशाक को भौगोलिक सूचकांक (जीआई टैग) मिलने से मथुरा-वृंदावन के हजारों कारीगरों के हस्तशिल्प की पहचान को नई ताकत मिलेगी। जीआई टैग मिलने से अब पोशाक की शुद्धता और विशिष्टता को कानूनी सुरक्षा मिल गई है। इससे बाजार में इसकी मांग और कीमत दोनों में भारी वृद्धि की उम्मीद है, साथ ही नकल पर भी रोक लगेगी।
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पोशाक निर्माण का यह कार्य मथुरा की हजारों महिला कारीगरों के लिए सशक्तिकरण का सबसे बड़ा माध्यम बन गया है। प्रदेश सरकार की प्रोत्साहन नीतियों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों से इन महिलाओं के जीवन स्तर में बड़ा बदलाव आया है, जिसकी मिसाल मथुरा की प्रियंका और प्रेक्षा जैसी महिलाएं हैं।
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पोशाक बनाने के काम से जुड़ी डेंपियर नगर की प्रियंका बताती हैं कि पहले हमें हमारे काम का सही दाम नहीं मिल पाता था, जिससे परिवार चलाना मुश्किल था। मैंने एनजीओ और एमएसएमई से प्रशिक्षण प्राप्त किया और फिर अपना स्वयं सहायता समूह बनाया। प्रदेश सरकार के प्रोत्साहन और ओडीओपी से हमें बेहतर आय मिल रही है। आज मैं न केवल खुद आत्मनिर्भर हूँ, बल्कि अपने साथ दर्जनों महिलाओं को काम देकर उन्हें भी आत्मनिर्भर बना रही हूँ।
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छटीकरा रोड की रहने वालीं प्रेक्षा ने बताया कि उन्होंने एनजीओ से जुड़कर हाथ की कढ़ाई और जरी कला का काम सीखा और बाद में ठाकुर जी के सुंदर जरी मुकुट बनाना शुरू किया। उनकी लगन और कला की चमक इतनी बढ़ी कि उनके बनाए हुए मुकुट आज देश के विभिन्न कोनों तक पहुंच रहे हैं। प्रेक्षा ने अपनी कला से प्रेरित होकर लगभग 15 और महिलाओं को भी इस काम से जोड़ा है, जो आज अपनी कला से अपने परिवार को सहारा दे रही हैं।
जरी पोशाक को जीआई टैग के लिए खजानी वेलफेयर सोसाइटी ने आवेदन किया था। रोजगार दीदी के नाम से मशहूर और खजानी वेलफेयर सोसाइटी की निदेशक शिप्रा राठी ने इस उपलब्धि पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि योगी सरकार का यह कदम अत्यंत दूरदर्शी है। जीआई टैग इन कारीगरों को एक नई पहचान देगा और उनके उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक मजबूत विश्वसनीयता प्रदान करेगा। यह पहल सांस्कृतिक धरोहर और अर्थव्यवस्था दोनों को मजबूत कर रही है।
उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि सिद्ध करती है कि स्थानीय उत्पादों को सही सरकारी समर्थन मिलने पर वे वैश्विक पटल पर भी अपनी छाप छोड़ सकते हैं और लाखों लोगों के लिए आय और आत्मनिर्भरता का स्थायी स्रोत बन सकते हैं।



साझा विरासत का प्रतीक

इस शिल्प की एक और खास बात यह है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम कारीगर भी पूरी निष्ठा के साथ भगवान कृष्ण की इन पोशाकों का निर्माण करते हैं। यह प्रदेश की गंगा- जमुनी तहजीब की एक बेहतरीन मिसाल पेश करता है। जीआई टैग मिलने से इन सभी कारीगरों को समान रूप से लाभ मिलेगा।
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