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Mathura News: सायरन ने रोका भ्रष्टाचार, कम हुई डीएल बनने की रफ्तार
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मनमोहन पारीक
वृंदावन। परिवहन विभाग में लंबे समय से चले आ रहे दलाली और फर्जीवाड़े के खेल पर अब आधुनिक तकनीक का प्रहार शुरू हो गया है। ड्राइविंग ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग इंस्टीट्यूट को पूरी तरह ऑटोमेशन मोड पर लाते हुए एनआईसी के सारथी एप से जोड़ दिया गया है। इस नई व्यवस्था के लागू होते ही बिना ड्राइविंग जाने दलाली के दम पर लाइसेंस बनवाने की परिपाटी पर पूरी तरह ब्रेक लग गया है।
पारदर्शिता का आलम यह है कि मानवीय हस्तक्षेप खत्म होते ही पहले चरण में ही 50 प्रतिशत अभ्यर्थी टेस्ट में धड़ाम हो गए हैं। अब तक ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया में अधिकारियों और दलालों की सांठगांठ की शिकायतें आम थीं, लेकिन ऑटोमेटेड ट्रैक पर स्थापित कंपनी का अत्याधुनिक सिस्टम इस पारदर्शी व्यवस्था को संचालित कर रहा है। ट्रैक पर तैनात 16 हाई-टेक सीसीटीवी कैमरे और कदम-कदम पर लगे आधुनिक सेंसर अभ्यर्थी की हर गतिविधि पर बारीक नजर रख रहे हैं। टेस्ट के दौरान जरा सी चूक होते ही सेंसर तुरंत सायरन बजाते हैं और सीधे कंप्यूटर को रिपोर्ट भेजते हैं। टेस्ट का परिणाम इंसानी हाथों में न होकर सीधे सॉफ्टवेयर से जारी किया जा रहा है। इससे सिफारिश के रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके हैं।
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अनुभवहीन चालकों की नो-एंट्री
संस्थान में रोजाना औसतन 60 आवेदन पहुंच रहे हैं, जिनमें से 25 से 30 अभ्यर्थियों को स्लॉट के आधार पर ट्रैक पर उतारा जा रहा है। कड़े मानकों के चलते आधे लोग फेल हो रहे हैं। आरआई नरेश कुमार ने स्पष्ट किया है कि कैमरे और सेंसर की रिपोर्ट के बिना अब लाइसेंस बनना नामुमकिन है। फेल होने वाले अभ्यर्थियों को 7 दिन बाद नया स्लॉट बुक कराकर दोबारा टेस्ट देना होगा।
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दोनों वाहनों का अलग टेस्ट अनिवार्य
विभाग ने फर्जीवाड़े की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म करने के लिए दोपहिया और चार पहिया वाहनों के लाइसेंस के लिए अलग-अलग टेस्ट देना अनिवार्य कर दिया है। यदि किसी ने दोनों श्रेणी का आवेदन किया है, तो उसे दोनों वाहन खुद चलाकर ट्रैक पर पास होने होंगे। परिसर में जगह-जगह इसके स्पष्ट नोटिस चस्पा कर दिए गए हैं।
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वृंदावन। परिवहन विभाग में लंबे समय से चले आ रहे दलाली और फर्जीवाड़े के खेल पर अब आधुनिक तकनीक का प्रहार शुरू हो गया है। ड्राइविंग ट्रेनिंग एंड टेस्टिंग इंस्टीट्यूट को पूरी तरह ऑटोमेशन मोड पर लाते हुए एनआईसी के सारथी एप से जोड़ दिया गया है। इस नई व्यवस्था के लागू होते ही बिना ड्राइविंग जाने दलाली के दम पर लाइसेंस बनवाने की परिपाटी पर पूरी तरह ब्रेक लग गया है।
पारदर्शिता का आलम यह है कि मानवीय हस्तक्षेप खत्म होते ही पहले चरण में ही 50 प्रतिशत अभ्यर्थी टेस्ट में धड़ाम हो गए हैं। अब तक ड्राइविंग लाइसेंस प्रक्रिया में अधिकारियों और दलालों की सांठगांठ की शिकायतें आम थीं, लेकिन ऑटोमेटेड ट्रैक पर स्थापित कंपनी का अत्याधुनिक सिस्टम इस पारदर्शी व्यवस्था को संचालित कर रहा है। ट्रैक पर तैनात 16 हाई-टेक सीसीटीवी कैमरे और कदम-कदम पर लगे आधुनिक सेंसर अभ्यर्थी की हर गतिविधि पर बारीक नजर रख रहे हैं। टेस्ट के दौरान जरा सी चूक होते ही सेंसर तुरंत सायरन बजाते हैं और सीधे कंप्यूटर को रिपोर्ट भेजते हैं। टेस्ट का परिणाम इंसानी हाथों में न होकर सीधे सॉफ्टवेयर से जारी किया जा रहा है। इससे सिफारिश के रास्ते पूरी तरह बंद हो चुके हैं।
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अनुभवहीन चालकों की नो-एंट्री
संस्थान में रोजाना औसतन 60 आवेदन पहुंच रहे हैं, जिनमें से 25 से 30 अभ्यर्थियों को स्लॉट के आधार पर ट्रैक पर उतारा जा रहा है। कड़े मानकों के चलते आधे लोग फेल हो रहे हैं। आरआई नरेश कुमार ने स्पष्ट किया है कि कैमरे और सेंसर की रिपोर्ट के बिना अब लाइसेंस बनना नामुमकिन है। फेल होने वाले अभ्यर्थियों को 7 दिन बाद नया स्लॉट बुक कराकर दोबारा टेस्ट देना होगा।
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दोनों वाहनों का अलग टेस्ट अनिवार्य
विभाग ने फर्जीवाड़े की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म करने के लिए दोपहिया और चार पहिया वाहनों के लाइसेंस के लिए अलग-अलग टेस्ट देना अनिवार्य कर दिया है। यदि किसी ने दोनों श्रेणी का आवेदन किया है, तो उसे दोनों वाहन खुद चलाकर ट्रैक पर पास होने होंगे। परिसर में जगह-जगह इसके स्पष्ट नोटिस चस्पा कर दिए गए हैं।