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Mathura News: श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर शाही ईदगाह में पूजा की मांगी हाईकोर्ट से अनुमति
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मथुरा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर शाही ईदगाह में पूजा-पाठ की अनुमति इलाहाबाद हाईकोर्ट से मांगी गई है। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास ने रविवार को हाईकोर्ट में ऑनलाइन अर्जी दाखिल की। इसमें दावा किया कि ईदगाह परिसर में भगवान श्रीकृष्ण का असली गर्भगृह है। हिंदू पक्ष को वहां पूजा की अनुमति दी जाए।
न्यास के अध्यक्ष एवं जन्मभूमि के पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह ने ऑनलाइन अर्जी दाखिल की है। उन्होंने बताया कि अर्जी में हाईकोर्ट से प्रार्थना की गई है कि भगवान श्रीकृष्ण का यह 5251वां जन्मोत्सव है। यह जन्मोत्सव हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार गृह-नक्षत्रों में भी विशेष है। लिहाजा हिंदुओं को अपने आराध्य की पूजा-पाठ उनके असली गर्भगृह में करने की अनुमति दी जाए।
चार बार तोड़ा गया आराध्य का मंदिर
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि मथुरा में कटरा केशव देव स्थान पर आज श्रीकृष्ण जन्मस्थान और विवादित शाही ईदगाह मजिस्द का ढांचा है, वहां पांच हजार साल पहले राजा कंस का कारागार हुआ करता था। कारागार के विषय में इतिहास की पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि यह कुल एरिया 13.37 एकड़ा का है, जिसमें करीब ढाई एकड़ में शाही ईदगाह मस्जिद है। जिसको लेकर दावा है कि यही भगवान श्रीकृष्ण का असली गर्भ गृह है। क्योंकि उसी स्थान पर कारागार था। इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था। इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने कटरा केशवदेव को विभिन्न अध्ययनों और साक्ष्यों के आधार पर मथुरा कटरा केशवदेव को जन्मभूमि माना। जनमान्यता के अनुसार, कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था। इतिहासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। इस भव्य मंदिर पर महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था। 1150 में फिर इसे राजा विजयपाल सिंह देव ने बनवाया। 1351 में फिर फिरोजशाह तुगलक ने तोड़ दिया। इसके बाद यह स्थानीय लोगों ने बनवाया। 1488 में फिर से इसे सिकंदर लोधी द्वारा तोड़ा गया। 1618 में यहां ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला द्वारा बनवाया गया। 1670 में औरंगजेब ने इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर इसको तोड़ा और लूटा साथ ही ईदगाह का निर्माण कराया। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि यहां से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस मंदिर के चारों ओर एक ऊंची दीवार का परकोटा मौजूद था। मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में एक कुआं भी बनवाया गया था। इस कुएं से पानी 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदिर के प्रांगण में बने फव्वारे को चलाया जाता था। इस स्थान पर उस कुएं और बुर्ज के अवशेष अभी तक मौजूद है। 5 अप्रैल 1770 में गोवर्धन बैटल हुआ, जिसमें मराठों की जीत हुई। मराठा पेशवा के अधिकारियों ने कटरा केशव देव की जमीन को नजूल यानी सरकारी भूमि घोषित कर दिया। 1803 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कब्जा करते हुए इस जमीन को मराठों से अपने अधीन कर 1815 में नीलामी किया था। नीलामी में 13400 रुपये में बनारस के राजा पटनीमल ने इसे खरीदा था। 1944 में राजा पटनीमल के उत्तराधिकारी राय कृष्णदास से यह जमीन 13400 रुपये में मदन मोहन मालवीय, भीखनलाल अत्रे, गणेशदत्त के नाम खरीदी गई। इस जमीन की कीमत का भुगतान जुगलकिशोर बिड़ला द्वारा किया गया था।
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आराध्य की जन्मस्थली की बदहाली देख रो उठे पड़े थे पं. मालवीय और बिड़ला
वर्ष 1940 में यहां पंडित मदन मोहन मालवीय आए। उन्होंने श्रीकृष्ण जन्मस्थान की दुर्दशा देखी तो वह रो उठे। 1943 में उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला मथुरा आए और वे भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर रो उठे। मालवीय ने बिड़ला को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पुनर्रुद्धार को लेकर पत्र लिखा। बिड़ला ने सात फरवरी 1944 को कटरा केशव देव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से जमीन खरीदी। बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की और मंदिर का निर्माण शुरू कराया। 1982 में भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ।
192 वर्ष से अपना जन्मस्थान पाने को लड़ रहे श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण अपने जन्मस्थान को पाने की लड़ाई 192 वर्ष से लड़ रहे हैं। वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मस्थान-ईदगाह प्रकरण में 18 वाद प्रचलित हैं। वादकारियों ने वादी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को बनाया है और दूसरे स्थान पर खुद को भक्तगणों की हैसियत से रखा है। 15 मार्च 1832 को अताउल्ला खातिब ने कलेक्टर कोर्ट में पहला मुकदमा दर्ज कराया था। इसमें 1815 में पटनीमल के नाम पर कटरा केशव देव की जमीन की नीलाम की गई थी, उसको रद्द कर मस्जिद की मरम्मत कराए जाने की मांग की गई। यह इस विवाद का पहला मुकदमा था। इसके बाद वर्ष 1897, वर्ष 1920, वर्ष 1928, वर्ष 1944, वर्ष 1945, वर्ष 1955, वर्ष 1960 और वर्ष 1965, 1967 में अलग-अलग वाद दर्ज हुए। फिर वर्ष 1968 आया, उस वक्त मथुरा में डीएम के पद पर आरके गोयल और एसपी के पद पर गिरीश बिहारी थे। उन्होंने 136 वर्ष पुराने इस प्रकरण को खत्म करने का रास्ता समझौते के तौर पर निकाला। डीएम और एसएसपी की मध्यस्थता पर 10 अगस्त 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी ने ढाई रुपये के स्टांप पेपर पर 10 बिंदुओं का समझौतानामा किया था। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के सह सचिव देवघर शर्मा और उनके सहयोगी फूलचंद गुप्ता ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। वहीं, ईदगाह कमेटी की ओर से शहमर मलीह, डा. शाहबुद्दीन, आबिदुल्ला खां, मो. आकूल ने हस्ताक्षर किए थे। अधिवक्ता रज्जाक हुसैन थे। उसी समझौते को जन्मभूमि पक्ष ने अपने वादों में चुनौती दी है।
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न्यास के अध्यक्ष एवं जन्मभूमि के पक्षकार महेंद्र प्रताप सिंह ने ऑनलाइन अर्जी दाखिल की है। उन्होंने बताया कि अर्जी में हाईकोर्ट से प्रार्थना की गई है कि भगवान श्रीकृष्ण का यह 5251वां जन्मोत्सव है। यह जन्मोत्सव हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार गृह-नक्षत्रों में भी विशेष है। लिहाजा हिंदुओं को अपने आराध्य की पूजा-पाठ उनके असली गर्भगृह में करने की अनुमति दी जाए।
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चार बार तोड़ा गया आराध्य का मंदिर
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि मथुरा में कटरा केशव देव स्थान पर आज श्रीकृष्ण जन्मस्थान और विवादित शाही ईदगाह मजिस्द का ढांचा है, वहां पांच हजार साल पहले राजा कंस का कारागार हुआ करता था। कारागार के विषय में इतिहास की पुस्तकों में उल्लेख मिलता है कि यह कुल एरिया 13.37 एकड़ा का है, जिसमें करीब ढाई एकड़ में शाही ईदगाह मस्जिद है। जिसको लेकर दावा है कि यही भगवान श्रीकृष्ण का असली गर्भ गृह है। क्योंकि उसी स्थान पर कारागार था। इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था। इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने कटरा केशवदेव को विभिन्न अध्ययनों और साक्ष्यों के आधार पर मथुरा कटरा केशवदेव को जन्मभूमि माना। जनमान्यता के अनुसार, कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था। इतिहासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। इस भव्य मंदिर पर महमूद गजनवी ने सन 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था। 1150 में फिर इसे राजा विजयपाल सिंह देव ने बनवाया। 1351 में फिर फिरोजशाह तुगलक ने तोड़ दिया। इसके बाद यह स्थानीय लोगों ने बनवाया। 1488 में फिर से इसे सिकंदर लोधी द्वारा तोड़ा गया। 1618 में यहां ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला द्वारा बनवाया गया। 1670 में औरंगजेब ने इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर इसको तोड़ा और लूटा साथ ही ईदगाह का निर्माण कराया। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि यहां से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस मंदिर के चारों ओर एक ऊंची दीवार का परकोटा मौजूद था। मंदिर के दक्षिण पश्चिम कोने में एक कुआं भी बनवाया गया था। इस कुएं से पानी 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदिर के प्रांगण में बने फव्वारे को चलाया जाता था। इस स्थान पर उस कुएं और बुर्ज के अवशेष अभी तक मौजूद है। 5 अप्रैल 1770 में गोवर्धन बैटल हुआ, जिसमें मराठों की जीत हुई। मराठा पेशवा के अधिकारियों ने कटरा केशव देव की जमीन को नजूल यानी सरकारी भूमि घोषित कर दिया। 1803 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कब्जा करते हुए इस जमीन को मराठों से अपने अधीन कर 1815 में नीलामी किया था। नीलामी में 13400 रुपये में बनारस के राजा पटनीमल ने इसे खरीदा था। 1944 में राजा पटनीमल के उत्तराधिकारी राय कृष्णदास से यह जमीन 13400 रुपये में मदन मोहन मालवीय, भीखनलाल अत्रे, गणेशदत्त के नाम खरीदी गई। इस जमीन की कीमत का भुगतान जुगलकिशोर बिड़ला द्वारा किया गया था।
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आराध्य की जन्मस्थली की बदहाली देख रो उठे पड़े थे पं. मालवीय और बिड़ला
वर्ष 1940 में यहां पंडित मदन मोहन मालवीय आए। उन्होंने श्रीकृष्ण जन्मस्थान की दुर्दशा देखी तो वह रो उठे। 1943 में उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला मथुरा आए और वे भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर रो उठे। मालवीय ने बिड़ला को श्रीकृष्ण जन्मभूमि के पुनर्रुद्धार को लेकर पत्र लिखा। बिड़ला ने सात फरवरी 1944 को कटरा केशव देव को राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से जमीन खरीदी। बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना की और मंदिर का निर्माण शुरू कराया। 1982 में भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ।
192 वर्ष से अपना जन्मस्थान पाने को लड़ रहे श्रीकृष्ण
श्रीकृष्ण अपने जन्मस्थान को पाने की लड़ाई 192 वर्ष से लड़ रहे हैं। वर्तमान में इलाहाबाद हाईकोर्ट में श्रीकृष्ण जन्मस्थान-ईदगाह प्रकरण में 18 वाद प्रचलित हैं। वादकारियों ने वादी स्वयं भगवान श्रीकृष्ण को बनाया है और दूसरे स्थान पर खुद को भक्तगणों की हैसियत से रखा है। 15 मार्च 1832 को अताउल्ला खातिब ने कलेक्टर कोर्ट में पहला मुकदमा दर्ज कराया था। इसमें 1815 में पटनीमल के नाम पर कटरा केशव देव की जमीन की नीलाम की गई थी, उसको रद्द कर मस्जिद की मरम्मत कराए जाने की मांग की गई। यह इस विवाद का पहला मुकदमा था। इसके बाद वर्ष 1897, वर्ष 1920, वर्ष 1928, वर्ष 1944, वर्ष 1945, वर्ष 1955, वर्ष 1960 और वर्ष 1965, 1967 में अलग-अलग वाद दर्ज हुए। फिर वर्ष 1968 आया, उस वक्त मथुरा में डीएम के पद पर आरके गोयल और एसपी के पद पर गिरीश बिहारी थे। उन्होंने 136 वर्ष पुराने इस प्रकरण को खत्म करने का रास्ता समझौते के तौर पर निकाला। डीएम और एसएसपी की मध्यस्थता पर 10 अगस्त 1968 को श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह कमेटी ने ढाई रुपये के स्टांप पेपर पर 10 बिंदुओं का समझौतानामा किया था। श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ के सह सचिव देवघर शर्मा और उनके सहयोगी फूलचंद गुप्ता ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। वहीं, ईदगाह कमेटी की ओर से शहमर मलीह, डा. शाहबुद्दीन, आबिदुल्ला खां, मो. आकूल ने हस्ताक्षर किए थे। अधिवक्ता रज्जाक हुसैन थे। उसी समझौते को जन्मभूमि पक्ष ने अपने वादों में चुनौती दी है।