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अर्धचंद्राकार पुल निर्माण के रास्ते बंद
ब्यूरो, अमार उजाला मथुरा
Updated Wed, 14 Sep 2016 12:34 AM IST
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अर्धचंद्राकार पुल
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प्रदेश में बीती बसपा सरकार की वृंदावन समग्र विकास योजना के अंतर्गत वृंदावन के यमुना के चीर घाट से केशी घाट तक प्रस्तावित अर्धचंद्राकार पुल के भविष्य में निर्माण के सभी दरवाजे बंद हो रहे हैं। प्रदेश कैबिनेट ने अर्धचंद्राकार पुल के लिए निर्मित पिलर को ध्वस्त करने का निर्णय लिया है। इस पर कार्रवाई कब होगी इस बारे में अधिकारी बता नहीं पा रहे।
बता दें कि वृंदावन मेेंचीर घाट से केशी घाट तक लगभग 700 मीटर लंबे इस सेतु पर पहले से ही सवाल उठ रहे थे। करीब बीस करोड़ की लागत से बनने वाले इस अर्धचंद्राकार पुल के डिजाइन पर भी कई बार सवाल उठे।
निर्माण से पहले सेतु निगम द्वारा दिखाए गए नक्शे पर इस पुल का मानचित्र कार्यदायी संस्था जेपी ग्रुप के इंजीनियरों ने तैयार किया था। तकनीकी कारणों से तत्कालीन मंडलायुक्त शंभूनाथ शुक्ला और डीएम ने इस पर आपत्ति जताई। मंडलायुक्त ने कहा था कि यमुना की धार में कितने समय तक अर्धचंद्राकार पुल खड़ा रह सकेगा, यह निर्धारित कैसे होगा।
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पुल के निर्माण से होने वाले नुकसान को भांपकर सामाजिक कार्यकर्ता मधुमंगल शुक्ला ने आरटीआई के जरिए एएसआई से पुल के निर्माण में तय मानकों के अनुरूप कार्य होने की जानकारी मांगी, लेकिन जानकारी नहीं दी गई। इसके बाद 2010 में उन्होंने इलाबाद उच्च न्यायालय में रिट दायर की।
जिस पर हाईकोर्ट ने स्टे जारी कर दिया। शासन की ओर की गई जवाबी पैरवी में हाईकोर्ट ने स्टे वापस ले लिया लेकिन शासन ने पुल निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ाया। मधुमंगल शुक्ला के अनुसार बीते दिनों कैबिनेट ने पुल के लिए यमुना में बने पिलर को ध्वस्त करने का फैसला किया है। यह उनकी यमुना को प्राचीन घाटों तक लाने की लंबी लड़ाई की जीत है।
संरक्षित क्षेत्र में हो रहा था निर्माण
यमुना में अर्धचंद्राकार पुल निर्माण की जद में प्राचीन जुगल किशोर मंदिर भी आ रहा था। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अंतर्गत आता है। मंदिर की 100 मीटर की परिधि में एएसआई से बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र लिए ही निर्माण कार्य शुरू किया जाना लोक निर्माण विभाग के लिए सिरदर्द बना था।
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बता दें कि वृंदावन मेेंचीर घाट से केशी घाट तक लगभग 700 मीटर लंबे इस सेतु पर पहले से ही सवाल उठ रहे थे। करीब बीस करोड़ की लागत से बनने वाले इस अर्धचंद्राकार पुल के डिजाइन पर भी कई बार सवाल उठे।
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निर्माण से पहले सेतु निगम द्वारा दिखाए गए नक्शे पर इस पुल का मानचित्र कार्यदायी संस्था जेपी ग्रुप के इंजीनियरों ने तैयार किया था। तकनीकी कारणों से तत्कालीन मंडलायुक्त शंभूनाथ शुक्ला और डीएम ने इस पर आपत्ति जताई। मंडलायुक्त ने कहा था कि यमुना की धार में कितने समय तक अर्धचंद्राकार पुल खड़ा रह सकेगा, यह निर्धारित कैसे होगा।
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पुल के निर्माण से होने वाले नुकसान को भांपकर सामाजिक कार्यकर्ता मधुमंगल शुक्ला ने आरटीआई के जरिए एएसआई से पुल के निर्माण में तय मानकों के अनुरूप कार्य होने की जानकारी मांगी, लेकिन जानकारी नहीं दी गई। इसके बाद 2010 में उन्होंने इलाबाद उच्च न्यायालय में रिट दायर की।
जिस पर हाईकोर्ट ने स्टे जारी कर दिया। शासन की ओर की गई जवाबी पैरवी में हाईकोर्ट ने स्टे वापस ले लिया लेकिन शासन ने पुल निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ाया। मधुमंगल शुक्ला के अनुसार बीते दिनों कैबिनेट ने पुल के लिए यमुना में बने पिलर को ध्वस्त करने का फैसला किया है। यह उनकी यमुना को प्राचीन घाटों तक लाने की लंबी लड़ाई की जीत है।
संरक्षित क्षेत्र में हो रहा था निर्माण
यमुना में अर्धचंद्राकार पुल निर्माण की जद में प्राचीन जुगल किशोर मंदिर भी आ रहा था। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अंतर्गत आता है। मंदिर की 100 मीटर की परिधि में एएसआई से बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र लिए ही निर्माण कार्य शुरू किया जाना लोक निर्माण विभाग के लिए सिरदर्द बना था।