{"_id":"6aba86af72a2d2fc6f0b75d4","slug":"mathura-tap-industry-in-crisis-due-to-rising-brass-prices-and-lack-of-government-support-2026-09-28","type":"story","status":"publish","title_hn":"संकट में मथुरा का टोंटी कारोबार: पीतल के दाम दोगुने, जल जीवन मिशन से भी न मिली राहत; कारोबारियों ने की ये मांग","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
संकट में मथुरा का टोंटी कारोबार: पीतल के दाम दोगुने, जल जीवन मिशन से भी न मिली राहत; कारोबारियों ने की ये मांग
Mon, 28 Sep 2026 08:54 PM IST
Arun Parashar
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Published by: Arun Parashar
Updated Mon, 28 Sep 2026 08:54 PM IST
सार
कारोबारियों का कहना है कि सरकारी क्षेत्र में पीटीएमटी को बढ़ावा मिलने से भी पीतल की टोंटियों की मांग प्रभावित हुई है। मथुरा के टोंटी उद्योग को एक जनपद एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना में शामिल किए जाने के बावजूद कारोबारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला।
विज्ञापन
मथुरा का टोंटी कारोबार।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें
देशभर में पहचान रखने वाला मथुरा का टोंटी कारोबार लगातार सिमट रहा है। वर्ष 2019 से पहले जिले में टोंटी बनाने वाली करीब 150 इकाइयां संचालित थीं, लेकिन अब इनकी संख्या घटकर महज 35-40 रह गई है। कारोबारियों का कहना है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह उद्योग पूरी तरह संकट में आ सकता है।
टोंटी कारोबार में इस्तेमाल होने वाले पीतल के स्क्रैप की कीमत दो वर्ष पहले करीब 400-450 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर 900-950 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। पीतल में जस्ता और तांबा मिलाकर टोंटी, हैंडल और अन्य एसेसरीज तैयार की जाती हैं। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से उत्पादन लागत बढ़ गई है, जबकि बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है।
कारोबारियों को जल जीवन मिशन से इस उद्योग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। उनका कहना है कि सरकारी क्षेत्र में पीटीएमटी को बढ़ावा मिलने से भी पीतल की टोंटियों की मांग प्रभावित हुई है। मथुरा के टोंटी उद्योग को एक जनपद एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना में शामिल किए जाने के बावजूद कारोबारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। कारोबार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं। कारोबारियों ने उद्योग को बचाने के लिए कच्चे माल की कीमत नियंत्रित करने और सरकारी योजनाओं में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की मांग की है।
विज्ञापन
पीतल के स्क्रैप की कीमत दोगुने से अधिक होने से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है। सरकार से सहयोग और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में स्थानीय टोंटी निर्माताओं को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिला। -नीरज वशिष्ट, अध्यक्ष, टैप्स एंड कॉक्स एसोसिएशन
मथुरा का टोंटी उद्योग लगातार संकट में है। इकाइयों की संख्या तेजी से घट रही है। व्यापार में मुनाफा सिर्फ 10-12 प्रतिशत होता है और सरकार को 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ रहा है। समय रहते कच्चे माल और बाजार से जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। -आनंद माहेश्वरी, सचिव, टैप्स एंड कॉक्स एसोसिएशन
विज्ञापन
टोंटी कारोबार में इस्तेमाल होने वाले पीतल के स्क्रैप की कीमत दो वर्ष पहले करीब 400-450 रुपये प्रति किलो थी, जो अब बढ़कर 900-950 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। पीतल में जस्ता और तांबा मिलाकर टोंटी, हैंडल और अन्य एसेसरीज तैयार की जाती हैं। कच्चे माल की बढ़ती कीमतों से उत्पादन लागत बढ़ गई है, जबकि बाजार में प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी है।
विज्ञापन
कारोबारियों को जल जीवन मिशन से इस उद्योग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। उनका कहना है कि सरकारी क्षेत्र में पीटीएमटी को बढ़ावा मिलने से भी पीतल की टोंटियों की मांग प्रभावित हुई है। मथुरा के टोंटी उद्योग को एक जनपद एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना में शामिल किए जाने के बावजूद कारोबारियों को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। कारोबार से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में लोग जुड़े हैं। कारोबारियों ने उद्योग को बचाने के लिए कच्चे माल की कीमत नियंत्रित करने और सरकारी योजनाओं में स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देने की मांग की है।
विज्ञापन
पीतल के स्क्रैप की कीमत दोगुने से अधिक होने से उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है। सरकार से सहयोग और जल जीवन मिशन जैसी योजनाओं में स्थानीय टोंटी निर्माताओं को प्राथमिकता मिलने की उम्मीद थी, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिला। -नीरज वशिष्ट, अध्यक्ष, टैप्स एंड कॉक्स एसोसिएशन
मथुरा का टोंटी उद्योग लगातार संकट में है। इकाइयों की संख्या तेजी से घट रही है। व्यापार में मुनाफा सिर्फ 10-12 प्रतिशत होता है और सरकार को 18 प्रतिशत जीएसटी देना पड़ रहा है। समय रहते कच्चे माल और बाजार से जुड़ी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। -आनंद माहेश्वरी, सचिव, टैप्स एंड कॉक्स एसोसिएशन