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मथुरा: दाऊजी का अगहन पूर्णिमा लक्खी मेला आज से
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श्री दाऊजी महाराज गद्दल धारण किए हुए।
- फोटो : MATHURA
बलदेव (मथुरा)। दाऊजी का 441वां प्राकटॺोत्सव (अगहन पूर्णिमा लक्खी मेला) रविवार से शुरू हो रहा है। इसी दिन 441 वर्ष पूर्व बलदेव जी का प्राकटॺ संवत 1638, सन् 1582 को हुआ था। उस समय श्रीमद् बल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ ने पर्णकुटी में विशाल प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की।
1 वर्ष बाद नए मंदिर में संवत 1639, सन् 1583 को दाऊजी की प्राण-प्रतिष्ठा की। पूजा व्यवस्था गोस्वामी कल्याण देव जी को सौंपी गई। आज भी उनके वंशज व्यवस्था का निर्वहन कर रहे हैं। नए मंदिर का निर्माण दिल्ली के श्यामलाल सेठ ने कराया था। मेले में लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। इसलिए लक्खी मेला के रूप में प्रसिद्ध है।
सबसे प्राचीन विग्रह है दाऊजी का
दाऊजी महाराज का श्री विग्रह पुरातत्व विद्वानों के अनुसार ब्रज के सभी मंदिरों में प्राचीन है। कुषाण कालीन है। बलदेव जी का 8 फीट ऊंचा व साढे़ 3 फीट चौड़ा श्री विग्रह है। इतना विशाल विग्रह कहीं नहीं है। बलदेव जी के पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त हैं। बलदेव जी के सामने उनकी सहधर्मिणी रेवती मैया का विग्रह सुंदर मनोहारी भाव में है।
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दाऊ दादा की रजाई में लगता है 75 मीटर कपड़ा
सर्दी में दाऊ दादा की विशेष रजाई के संबंध में पुजारी रामनिवास शर्मा ने बताया सर्दी से बचाव के लिए दाऊ दादा की रजाई जिसे गद्दल कहते हैं। इसमें 75 मीटर गर्म कपड़ा व 12 किलो रुई भरी जाती है। कोट में 56 मीटर कपड़ा, 8 किलो रूई भरी जाती है।
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1 वर्ष बाद नए मंदिर में संवत 1639, सन् 1583 को दाऊजी की प्राण-प्रतिष्ठा की। पूजा व्यवस्था गोस्वामी कल्याण देव जी को सौंपी गई। आज भी उनके वंशज व्यवस्था का निर्वहन कर रहे हैं। नए मंदिर का निर्माण दिल्ली के श्यामलाल सेठ ने कराया था। मेले में लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। इसलिए लक्खी मेला के रूप में प्रसिद्ध है।
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सबसे प्राचीन विग्रह है दाऊजी का
दाऊजी महाराज का श्री विग्रह पुरातत्व विद्वानों के अनुसार ब्रज के सभी मंदिरों में प्राचीन है। कुषाण कालीन है। बलदेव जी का 8 फीट ऊंचा व साढे़ 3 फीट चौड़ा श्री विग्रह है। इतना विशाल विग्रह कहीं नहीं है। बलदेव जी के पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त हैं। बलदेव जी के सामने उनकी सहधर्मिणी रेवती मैया का विग्रह सुंदर मनोहारी भाव में है।
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दाऊ दादा की रजाई में लगता है 75 मीटर कपड़ा
सर्दी में दाऊ दादा की विशेष रजाई के संबंध में पुजारी रामनिवास शर्मा ने बताया सर्दी से बचाव के लिए दाऊ दादा की रजाई जिसे गद्दल कहते हैं। इसमें 75 मीटर गर्म कपड़ा व 12 किलो रुई भरी जाती है। कोट में 56 मीटर कपड़ा, 8 किलो रूई भरी जाती है।