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इतनी रंग बिरंगी दुनिया...
ब्यूरो, अमर उजाला वृंदावन
Updated Wed, 23 Sep 2015 12:07 AM IST
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युगल सरकार की क्रीड़ास्थली सोमवार देर रात से मंगलवार भोर तक काव्य रस से सराबोर रही। राधाष्टमी के पावन अवसर पर स्वामी हरिदास संगीत और नृत्य महोत्सव में सूफी गायन, हिंदी कविता और उर्दू शायरी ने भावों की त्रिवेणी में श्रोताओं को जमकर भिगोया। सूफी गायिका डा. ममता जोशी से शुरू हुए सिलसिले को डा. कुमार विश्वास ‘इतनी रंग बिरंगी दुनिया दो आंखों में कैसे आए...’ गीत तक ले गए।
डा. ममता जोशी ने अपने भक्तिपूर्ण गायन में ‘रस में बांकौ छबीलौ अलबेलौ भजन प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद मीराबाई के भजनों पर प्रस्तुति दी। बारिश ने कार्यक्रम में खलल जरूर डाला लेकिन कवियों ने श्रोताओं की शृंखला को बिखरने नहीं दिया। युवाओं के प्रिय कवि डा. कुमार विश्वास के संचालन में हिंदी कविता और उर्दू शायरी की कड़ियां मशहूर शायर डा. वसीम बरेलवी तक गईं।
शुरुआत कवि कुमार मनोज से हुई, जिसे मनवीर मधुर ओज तक ले गए। मधुर ने राजनीति पर कटाक्ष करते हुए पढ़ा कि ‘जुबां से काम करते हैं, दिल से दुआ नहीं करते हैं, सियासी लोग कभी किसी का भला नहीं करते।’ कवयित्री सरिता शर्मा ने ब्रज की होली पर काव्य पाठ किया और ‘अइयो खेलन होरी, कसम तोहे मोरी, उमर मेरी थोड़ी, तोहे तर कर दूंगी’ गीत सुनाया। डा. वसीम बरेलवी की शायरी ‘फूल तो फूल हैं आंखों से घिरे रहते हैं, कांटे बेकार हिफाजत में लगे रहते हैं’ और डा. विश्वास ने ‘कोई दिवाना कहता है’ से शृंगार को पूर्णता दी।
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डा. ममता जोशी ने अपने भक्तिपूर्ण गायन में ‘रस में बांकौ छबीलौ अलबेलौ भजन प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद मीराबाई के भजनों पर प्रस्तुति दी। बारिश ने कार्यक्रम में खलल जरूर डाला लेकिन कवियों ने श्रोताओं की शृंखला को बिखरने नहीं दिया। युवाओं के प्रिय कवि डा. कुमार विश्वास के संचालन में हिंदी कविता और उर्दू शायरी की कड़ियां मशहूर शायर डा. वसीम बरेलवी तक गईं।
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शुरुआत कवि कुमार मनोज से हुई, जिसे मनवीर मधुर ओज तक ले गए। मधुर ने राजनीति पर कटाक्ष करते हुए पढ़ा कि ‘जुबां से काम करते हैं, दिल से दुआ नहीं करते हैं, सियासी लोग कभी किसी का भला नहीं करते।’ कवयित्री सरिता शर्मा ने ब्रज की होली पर काव्य पाठ किया और ‘अइयो खेलन होरी, कसम तोहे मोरी, उमर मेरी थोड़ी, तोहे तर कर दूंगी’ गीत सुनाया। डा. वसीम बरेलवी की शायरी ‘फूल तो फूल हैं आंखों से घिरे रहते हैं, कांटे बेकार हिफाजत में लगे रहते हैं’ और डा. विश्वास ने ‘कोई दिवाना कहता है’ से शृंगार को पूर्णता दी।
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