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‘होरी खेलन आयौ श्याम आज याएे रंग में बोरो री’
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Tue, 03 Mar 2015 12:08 AM IST
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अपने हर रूप से दुनिया को प्रेम के रंग में रंगने वाले कन्हैया का गोकुलसोमवार अपने लाला के साथ होली खेल रहा था। रंगों की बौछार, अबीर-गुलाल केसाथ छड़ी की मार हर उम्र को आनंदित कर देने वाली रही। इसी बीच परंपरागतरूप में सजी गोपियां और ग्वाल-बाल रसिया और धमार के स्वरों पर जमकर झूमे।
आयोजन का शुभारंभ सुबह प्राचीन नंदराय ठाकुरजी मंदिर से हुआ। यहां सेपालकी में सवार ठाकुरजी का डोला निकला। सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुहोरी और रसिया गायन करते हुए पीछे-पीछे चल रहे थे। इस दौरान छत से झांकरहे गांववासियों ने पुष्प वर्षा की तो सारा मार्ग पुष्प पंखुड़ियों से सजगया। जब डोला यमुना के प्राचीन मुरलीधर घाट पहुंचा तो रंगोत्सव का उत्साहचरम पर पहुंचा और शुरुआत हुई नटखट आनंद की।
घाट पर गोपियों के रूप में सजीमहिलाओं ने सखा रूप में सजे ग्वाल-बालों पर छड़ियों की बरसात की। इस मारके पीछे छिपा प्रेम कुछ इस प्रकार था कि- रंग में रंग लई, बांह पकड़ लईलाजन मर गई होरी में..., होरी खेलन आयौ श्याम आज जाय रंग में बोरो री..स्वर फूट पड़े। सेवायत छनिया पुजारी, मथुरा ने बताया भगवान श्रीकृष्ण केबाल स्वरूप से होली खेलने के दौरान गोपिकाएं उन्हें छड़ी से मीठी-मीठी मारमारती हैं। भगवान की इस प्राचीन लीला को जीवंत रखने के लिए समूचे गोकुल आजभी होली में मस्ती में खो जाता है। आयोजन के दौरान कृष्ण बल्लभ गौड़,दिलीप गौड़, संकेत सरदार, अनुभव तैलंग आदि मौजूद थे।
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राजभोग के बाद भांग का भोग
मथुरा। प्राचीन नंदराय ठाकुरजी राजभोग लगाने के बाद पालकी में सवार होकरनिकलते हैं। इसके बाद मुरलीधर घाट पर प्रभु को पहले भांग का भोग उसके बादमिष्ठान का भोग लगाया जाता है। इसके बाद टेसू के फूलों के रंग से भरीपिचकारियों से रंग की मार होरी को यादगार बनाती है। यहीं से डोला दोबाराप्राचीन मंदिर की ओर जाता है। इस बीच अबीर गुलाल की मार से बदरा भी लाल होजाते हैं।
होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया
मथुरा। ब्रज की होरी, रसिया और धमार की मार ने होरी की मस्ती को और बढ़ादिया। ‘चंचल गुजरिया आज बनी भोरी, तेरी हमारी मचे आज होरी’, मजा चखाय दउंआज तोय होरी में, आज बिरज में होरी रे रसिया, होरी रे रसिया बरजोरी रेरसिया को सुन हर कोई झूम उठा।
झूम के नाचे विदेशी
गोकुल की प्रसिद्ध छड़ी मार होली का आनंद लेने आए विदेशी आयोजन में खूबथिरके। कई फोटोग्राफर भी खुद को रोक नहीं पाए और इस आयोजन का हिस्सा बने।स्थानीय लोगों ने उनके साथ नृत्य किया तो गोपिकाओं ने उन पर छड़ी बरसाकरउन्हें होली की अनुभूति कराई।
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आयोजन का शुभारंभ सुबह प्राचीन नंदराय ठाकुरजी मंदिर से हुआ। यहां सेपालकी में सवार ठाकुरजी का डोला निकला। सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालुहोरी और रसिया गायन करते हुए पीछे-पीछे चल रहे थे। इस दौरान छत से झांकरहे गांववासियों ने पुष्प वर्षा की तो सारा मार्ग पुष्प पंखुड़ियों से सजगया। जब डोला यमुना के प्राचीन मुरलीधर घाट पहुंचा तो रंगोत्सव का उत्साहचरम पर पहुंचा और शुरुआत हुई नटखट आनंद की।
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घाट पर गोपियों के रूप में सजीमहिलाओं ने सखा रूप में सजे ग्वाल-बालों पर छड़ियों की बरसात की। इस मारके पीछे छिपा प्रेम कुछ इस प्रकार था कि- रंग में रंग लई, बांह पकड़ लईलाजन मर गई होरी में..., होरी खेलन आयौ श्याम आज जाय रंग में बोरो री..स्वर फूट पड़े। सेवायत छनिया पुजारी, मथुरा ने बताया भगवान श्रीकृष्ण केबाल स्वरूप से होली खेलने के दौरान गोपिकाएं उन्हें छड़ी से मीठी-मीठी मारमारती हैं। भगवान की इस प्राचीन लीला को जीवंत रखने के लिए समूचे गोकुल आजभी होली में मस्ती में खो जाता है। आयोजन के दौरान कृष्ण बल्लभ गौड़,दिलीप गौड़, संकेत सरदार, अनुभव तैलंग आदि मौजूद थे।
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राजभोग के बाद भांग का भोग
मथुरा। प्राचीन नंदराय ठाकुरजी राजभोग लगाने के बाद पालकी में सवार होकरनिकलते हैं। इसके बाद मुरलीधर घाट पर प्रभु को पहले भांग का भोग उसके बादमिष्ठान का भोग लगाया जाता है। इसके बाद टेसू के फूलों के रंग से भरीपिचकारियों से रंग की मार होरी को यादगार बनाती है। यहीं से डोला दोबाराप्राचीन मंदिर की ओर जाता है। इस बीच अबीर गुलाल की मार से बदरा भी लाल होजाते हैं।
होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया
मथुरा। ब्रज की होरी, रसिया और धमार की मार ने होरी की मस्ती को और बढ़ादिया। ‘चंचल गुजरिया आज बनी भोरी, तेरी हमारी मचे आज होरी’, मजा चखाय दउंआज तोय होरी में, आज बिरज में होरी रे रसिया, होरी रे रसिया बरजोरी रेरसिया को सुन हर कोई झूम उठा।
झूम के नाचे विदेशी
गोकुल की प्रसिद्ध छड़ी मार होली का आनंद लेने आए विदेशी आयोजन में खूबथिरके। कई फोटोग्राफर भी खुद को रोक नहीं पाए और इस आयोजन का हिस्सा बने।स्थानीय लोगों ने उनके साथ नृत्य किया तो गोपिकाओं ने उन पर छड़ी बरसाकरउन्हें होली की अनुभूति कराई।