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गोसेवा ही सनातन धर्म का प्राण : मोरारी बापू
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बरसाना में व्यास पीठ पर विराजमान मुरारी बापू का अभिनंदन करते कृष्णचंद ठाकुरजी महाराज । संवाद
- फोटो : mathura
बरसाना (मथुरा)। कस्बे में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन व्यासपीठ से प्रख्यात संत मोरारी बापू ने कहा कि दान तीन प्रकार के बताए गए हैं। उत्तम, मध्यम और सामान्य। इनमें भी गोदान और गाय के लिए किया गया दान सबसे श्रेष्ठ माना गया है। गोसेवा सनातन धर्म का प्राण है वहीं भारत की अर्थव्यवस्था का आधार भी गाय ही है।
9 दिवसीय कथा में रविवार को बापू ने कहा कि भूमि, स्वर्ण और विद्या का दान श्रेष्ठ माना गया है लेकिन गोमाता का दान सर्वोपरी है। अथर्ववेद के गोसूक्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गोमाता रुद्रों की जननी है। वसुओं की पुत्री और आदित्यों की बहन है। गोअमृत का आधार और औषधियों का भंडार है, अतः उसका वध किसी भी रूप में उचित नहीं है।
मोरारी बापू ने कहा कि गोमाता के प्रत्येक अंग में लक्ष्मी का वास है। जब-जब गोमाता पुकारती है, तब परमात्मा स्वयं अवतार धारण करते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में पचास से अधिक स्थलों पर गाय का स्मरण किया है। बापू ने श्रोताओं का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक ग्राम में 5 शालाएं अवश्य होनी चाहिए। पाठशाला, व्यायामशाला, धर्मशाला, भोजनशाला और सबसे महत्त्वपूर्ण गोशाला।
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शब्द और मौन की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा शब्द ब्रह्म है, मौन परब्रह्म है और अपशब्द केवल माया है। गीता में योग है तो मानस में प्रयोग है। बापू ने यह भी बताया कि संवत 1631 की रामनवमी को अयोध्या में श्रीरामचरितमानस का प्राकट्य गोस्वामी तुलसीदासजी के द्वारा हुआ।
कथा में बनारस के संत जगतगुरू सतुआ महाराज, वृंदावन के कृष्णचंद्र ठाकुरजी, मान मंदिर सेवा संस्थान के अध्यक्ष राधाकांत शास्त्री, सचिव सुनील सिंह ब्रजदास, माताजी गोशाला के संयोजक राजबाबा तथा कथा आयोजक उद्योगपति हरीश एन सिंघवी आदि मौजूद रहे।
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9 दिवसीय कथा में रविवार को बापू ने कहा कि भूमि, स्वर्ण और विद्या का दान श्रेष्ठ माना गया है लेकिन गोमाता का दान सर्वोपरी है। अथर्ववेद के गोसूक्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गोमाता रुद्रों की जननी है। वसुओं की पुत्री और आदित्यों की बहन है। गोअमृत का आधार और औषधियों का भंडार है, अतः उसका वध किसी भी रूप में उचित नहीं है।
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मोरारी बापू ने कहा कि गोमाता के प्रत्येक अंग में लक्ष्मी का वास है। जब-जब गोमाता पुकारती है, तब परमात्मा स्वयं अवतार धारण करते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरितमानस में पचास से अधिक स्थलों पर गाय का स्मरण किया है। बापू ने श्रोताओं का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक ग्राम में 5 शालाएं अवश्य होनी चाहिए। पाठशाला, व्यायामशाला, धर्मशाला, भोजनशाला और सबसे महत्त्वपूर्ण गोशाला।
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शब्द और मौन की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा शब्द ब्रह्म है, मौन परब्रह्म है और अपशब्द केवल माया है। गीता में योग है तो मानस में प्रयोग है। बापू ने यह भी बताया कि संवत 1631 की रामनवमी को अयोध्या में श्रीरामचरितमानस का प्राकट्य गोस्वामी तुलसीदासजी के द्वारा हुआ।
कथा में बनारस के संत जगतगुरू सतुआ महाराज, वृंदावन के कृष्णचंद्र ठाकुरजी, मान मंदिर सेवा संस्थान के अध्यक्ष राधाकांत शास्त्री, सचिव सुनील सिंह ब्रजदास, माताजी गोशाला के संयोजक राजबाबा तथा कथा आयोजक उद्योगपति हरीश एन सिंघवी आदि मौजूद रहे।