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UP: कैबिनेट मंत्री लक्ष्मी नारायण की मुश्किल बढ़ी, हत्या के केस में कोर्ट ने खारिज की एफआर; फिर होगी विवेचना

Tue, 27 May 2025 09:57 PM IST
अरुन पाराशर संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा Published by: अरुन पाराशर Updated Tue, 27 May 2025 09:57 PM IST
सार

कोर्ट ने संजीव सिकरवार की संदिग्ध मौत के मामले में पुलिस द्वारा लगाई गई एफआर को निरस्त करते हुए दोबारा विवेचना कर तीन माह में रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए है।

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court rejected police FR in case of cabinet minister Laxmi Narayan
कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मथुरा के बलदेव निवासी संजीव सिकरवार की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत के 18 साल पुराने मामले में उप्र सरकार में गन्ना मंत्री एवं छाता विधायक लक्ष्मी नारायण चौधरी की मुश्किलें फिर से बढ़ गई हैं। मंगलवार को एसीजेएम-2/एमपी-एमएलए छवि कुमारी की कोर्ट ने कोतवाली पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को खारिज कर दिया है। मृतक के पिता ने अंतिम रिपोर्ट के खिलाफ विरोध अर्जी दाखिल की थी। अर्जी में शामिल तथ्यों को आधार बनाते हुए कोर्ट ने तीन माह में इस मामले की विवेचना कर कोर्ट के सामने पेश करने को कहा है।
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इस प्रकरण में मंत्री सहित छह लोग केस में आरोपी हैं। शहर कोतवाली में हाईकोर्ट के आदेश पर मौत के एक साल बाद मुकदमा दर्ज हुआ था। अलीगढ़ पुलिस ने इसकी विवेचना की थी। दरअसल, 27 अक्तूबर 2011 को बलदेव थाना क्षेत्र निवासी संजीव सिकरवार पुत्र शिवकुमार का शव रेलवे ट्रैक पर भूतेश्वर के पास मिला था। पुलिस द्वारा मुकदमा न दर्ज करने पर उनके पिता हाईकोर्ट गए। वहां से आदेश होने पर छह अक्तूबर 2012 को घोषित तेल माफिया मनोज अग्रवाल, कैबिनेट मंत्री एवं छाता से विधायक चौधरी लक्ष्मी नारायण, अजय प्रताप, यशवीर सिंह, ठाकुर रोहतान सिंह व तत्कालीन कृष्णा नगर चौकी प्रभारी शत्रुघ्न उपाध्याय समेत दो अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था।
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शहर कोतवाली में अपराध संख्या 893/2012 पर धारा 302, 201, 506, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज हुआ। उस समय भी चौधरी लक्ष्मीनारायण बसपा की सरकार में मंत्री थे। सरकार बदली तो मुकदमा अलीगढ़ ट्रांसफर हो गया। अलीगढ़ पुलिस ने विवेचना के बाद मुकदमे में एफआर लगा दी थी। मृतक के पिता शिवकुमार सिकरवार ने एफआर का विरोध करते हुए कहा कोर्ट में अर्जी देते हुए तथ्य रखे कि पुलिस ने आरोपियों के प्रभाव में आकर बिना किसी गवाह के बयान दर्ज किए मुकदमे में एफआर लगाई है।
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मंगलवार को कोर्ट ने संजीव सिकरवार की संदिग्ध मौत के मामले में पुलिस द्वारा तीन बार लगाई गई एफआर को निरस्त करते हुए पुन: विवेचना कर तीन माह में रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए है। कोर्ट ने पूर्व में दो माह के अंदर रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए थे, लेकिन पुलिस ने साढ़े चार माह बाद कोर्ट में अपनी रिपोर्ट दाखिल की। इस रिपोर्ट सुनवाई के बाद मंगलवार को कोर्ट ने पुलिस की एफआर को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा है कि समस्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत प्रकरण में विवेचना अपूर्ण व संदिग्ध प्रतीत होती है। अग्रेतर विवेचना कराया जाना आवश्यक है। कोर्ट ने अपने आदेश में कई बिंदुओं पर पुलिस को विवेचना करने के आदेश भी दिए हैं।


मृतक के पिता शिवकुमार ने लगाए आरोप
संजीव के पिता शिवकुमार सिकरवार के आरोप हैं कि उनका पुत्र संजीव सिकरवार उर्फ नेता धौली प्याऊ स्थित श्रीराम धर्मशाला में रहकर भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम में जुटा था। उसकी सूचना पर ही तत्कालीन एसएसपी भानु भास्कर ने तेल माफिया मनोज अग्रवाल और छाता क्षेत्र में संचालित काले तेल के गोदामों को पकड़ा गया था। इससे मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण के समधी का गोदाम भी पकड़ा और उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई। इसी को लेकर लक्ष्मीनारायण और मनोज अग्रवाल उससे रंजिश मानने लगे। छह अक्तूबर 2011 को कृष्णा नगर के शोरूम संचालक अजय प्रताप, पूजा एंकलेव निवासी यशवीर सिंह ने संजीव को बैंक कॉलोनी बुलाकर उसे जान से मारने की धमकी दी थी।

27 अक्तूबर 2011 की सुबह 7:30 बजे ठाकुर रोहतान सिंह निवासी जैंत व दो अन्य व्यक्ति संजीव को रेलवे लाइन पर श्रीजी बाबा आश्रम एवं अमरनाथ विद्या आश्रम की ओर ले गए। वहां अजय प्रताप, यशवीर सिंह, ठाकुर रोहतान सिंह व तीन अन्य ने मिलकर संजीव की हत्या कर दी और सबूत नष्ट करने के लिए शव रेलवे ट्रैक पर डाल दिया। घटनास्थल पर पहुंचे तत्कालीन चौकी प्रभारी कृष्णा नगर ने संजीव से परिचित होने के बाद भी उसे पहचानने से मना कर दिया था और अज्ञात में पंचनामा भर दिया। शिवकुमार ने जब रिपोर्ट दर्ज कराने की बात कही तो उसे धमकाकर भगा दिया गया था। इसके बाद हाईकोर्ट में शरण ली थी।

20 दिन पहले ही अपनी मौत होने की आशंका जाहिर की थी संजीव ने
शिव कुमार ने बताया कि उनके बेटे शिव कुमार ने 20 दिन पहले ही अपनी हत्या होने की संभावना जताते हुए मुख्यमंत्री, आईजी, डीआईजी, एसएसपी को पत्र लिखा था। इसमें उसने साफ लिखा था कि उक्त लोग उसकी कभी भी हत्या कर सकते है। इसी पत्र को आधार मानते हुए हाईकोर्ट ने रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए थे। उन्होंने बताया कि रिपोर्ट दर्ज होने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने सीबीसीआईडी को जांच के आदेश दिए थे, लेकिन सीबीसीआईडी ने भी मामले में एफआर लगा दी। मथुरा में एमपी-एमएलए कोर्ट न होने के कारण छह साल तक उनकी फाइल लखनऊ एमपी-एमएलए कोर्ट में पड़ी रही। जब मथुरा में कोर्ट बना तब उनका मुकदमा मथुरा ट्रांसफर हुआ।
 
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