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जिंदगी की मेकेनिज्म से हार गए इंजीनियर अशोक
अमर उजाला मथुरा
Updated Fri, 29 Apr 2016 11:42 PM IST
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मौत
- फोटो : अमर उजाला
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घाटे में चलने वाली फैक्ट्री और मशीनों की खराबी के चलते परेशान रहने वाले फैक्ट्री संचालकों को सलाह देकर उनके कारोबार को पटरी पर लाने वाला मेकेनिकल इंजीनियर जिंदगी के मेकेनिज्म में समस्या से हार गया। साझीदारों ने ऐसा फंसाया कि अशोक उससे निकलने का रास्ता नहीं खोज सके और आखिर परिवार सहित मौत को गले लगा लिया।
मूल रूप से शेरगढ़ के गांव बसई बुजुर्ग निवासी अशोक प्रताप सिंह के पिता डूंगर प्रताप सिंह केआर इंटर कालेज में एनसीसी प्रशिक्षक थे। परिवार क्षेत्र के साधन संपन्न परिवारों में एक रहा। मथुरा के डैंपियर नगर के नया नगला में उनका मकान भी है। इसमें बड़े भाई राजकुमार सिंह रहते हैं, जो आरएसएस के सह प्रांत कार्यवाह हैं। अशोक प्रताप सिंह भी सैद्धांतिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे। वह मथुरा महानगर के श्रीजी नगर के कार्यवाह थे।
अशोक के बचपन के मित्र निरंजन सिंह निवासी उस्फार ने बताया कि सौम्य स्वभाव और खेलों में अत्यधिक रुचि रखने वाले अशोक शुरू से ही मेधावी थेे। एनसीसी में सी सर्टिफिकेट प्राप्त किया। बीएससी करने के बाद प्रेम महाविद्यालय पॉलीटेक्निक से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। फरीदाबाद में एक कंपनी में चार साल नौकरी की। उनके कौशल को देखते हुए फरीदाबाद की ही इंजीनियरिंग कंसलटेंसी कंपनी ने उन्हें प्रमुख कंसलटेंट के रूप में नौकरी पर रखा। वे उद्यमियों को मशीनों और कारोबार में वृद्धि के लिए उनके सदुपयोग पर सलाह देते।
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1990 में मथुरा लौटे और यहां एक फैक्ट्री में प्रमुख इंजीनियर के पद पर कार्य करने लगे। वर्ष 2005-06 में उन्होंने छाता में साईं टार प्रोडक्ट नाम से बिटुमिन फैक्ट्री खोली। इसमें छाता के एक प्रधान, राधापुरम एस्टेट निवासी एक व्यक्ति और एक अन्य को साझीदार बनाया। प्रोडक्शन आदि का कार्य अशोक देखते थे। साझेदारों से पैसे के मुद्दे पर विवाद के चलते दो साल पहले फैक्ट्री बंद हो गई। साझीदारों संग हिसाब भी पंचायतों में हुआ।
इसमें अशोक को 40 लाख रुपये का घाटा हुआ। अशोक ने 15 लाख रुपये लगाकर फिर से फ ैक्ट्री चालू की लेकिन साझीदारों ने उसमें फिर अपने ताले लगा दिए। इससे अशोक आर्थिक रूप से टूट गए। एक लंबे समय तक बेरोजगार रहने के बाद उन्होंने तीन माह पूर्व फरीदाबाद स्थित फैक्ट्री में फिर से नौकरी करना शुरू किया था।
गुणवत्ता के चलते था नाम
अशोक ने जिंदगी में कभी गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। बिटुमिन फैक्ट्री में उनका कार्य उच्च कोटि का रहता था। बताया गया कि वे रिफाइनरी से बिटुमिन खरीदते थे और सुधार कर विमानन विभाग को बेचते थे। उनको रनवे बनाने में प्रयोग होने वाले उच्च क्वालिटी के तारकोल के आर्डर मिलते थे। फैक्ट्री कर्मचारी रहे हरीओम निवासी छाता ने बताया कि उन्होंने गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया।
एकाएक ऐसा क्या हुआ...
फैक्ट्री बंद होने के बाद एक लंबे समय तक बेरोजगार रहने के बाद जब तीन माह पूर्व अशोक ने फरीदाबाद की कंपनी में नौकरी की तो लगा जिंदगी फिर पटरी पर लौट रही है। उनकी जिंदादिली को उदाहरण बताने वाले मित्र और रिश्तेदार का भी ये मानना था कि अशोक ने आखिर ये संघर्ष भी जीत लिया। परिवार सहित फरीदाबाद ही शिफ्ट होने की तैयारी की जा रही थी। वे फरीदाबाद में एक फ्लैट भी किराए पर तय कर आए थे। रविवार तक उसमें शिफ्ट होना था। ज्यादातर बड़े सामान की पैकिंग कर ली गई थी। बस रसोई या अन्य छोटा सामान ही बाहर था। गुरुवार की रात एकाएक ऐसा क्या हुआ कि अशोक मानसिक रूप से इतने पस्त हो गए कि इतना बड़ा कदम उठा बैठे। सभी के मन में ये सवाल है।
बेटी-पत्नी की मौत विषाक्त पदार्थ से
हाईवे पुलिस ने शुक्रवार अपराह्न तीनों शवों का पोस्टमार्टम कराया। दो चिकित्सकों ने पोस्टमार्टम किया, इसकी वीडियोग्राफी भी कराई गई। अशोक की बेटी आस्था और पत्नी नीता के विषाक्त पदार्थ का सेवन करने की आशंका जताई गई। इसके चलते चिकित्सकों ने दोनों का बिसरा प्रिजर्व कराया। चिकित्सक के अनुसार पोस्टमार्टम से करीब 18 से 20 घंटे पहले बेटी और पत्नी की मौत हो चुकी थी। माना जा रहा है कि अशोक ने पहले पत्नी और बेटी को विषाक्त का सेवन कराया। वहीं अशोक की गले की हड्डी टूटी मिली, मौत का कारण दम घुटना पाया गया है।
पोलियो से पीड़ित थी आस्था
बेटी आस्था को बचपन में ही पोलियो हो गया था। इससे उसके मानसिक और शारीरिक विकास पर असर पड़ा। 18 साल की आस्था देखने और व्यवहार में 12 साल की लगती थी।
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मूल रूप से शेरगढ़ के गांव बसई बुजुर्ग निवासी अशोक प्रताप सिंह के पिता डूंगर प्रताप सिंह केआर इंटर कालेज में एनसीसी प्रशिक्षक थे। परिवार क्षेत्र के साधन संपन्न परिवारों में एक रहा। मथुरा के डैंपियर नगर के नया नगला में उनका मकान भी है। इसमें बड़े भाई राजकुमार सिंह रहते हैं, जो आरएसएस के सह प्रांत कार्यवाह हैं। अशोक प्रताप सिंह भी सैद्धांतिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे। वह मथुरा महानगर के श्रीजी नगर के कार्यवाह थे।
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अशोक के बचपन के मित्र निरंजन सिंह निवासी उस्फार ने बताया कि सौम्य स्वभाव और खेलों में अत्यधिक रुचि रखने वाले अशोक शुरू से ही मेधावी थेे। एनसीसी में सी सर्टिफिकेट प्राप्त किया। बीएससी करने के बाद प्रेम महाविद्यालय पॉलीटेक्निक से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। फरीदाबाद में एक कंपनी में चार साल नौकरी की। उनके कौशल को देखते हुए फरीदाबाद की ही इंजीनियरिंग कंसलटेंसी कंपनी ने उन्हें प्रमुख कंसलटेंट के रूप में नौकरी पर रखा। वे उद्यमियों को मशीनों और कारोबार में वृद्धि के लिए उनके सदुपयोग पर सलाह देते।
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1990 में मथुरा लौटे और यहां एक फैक्ट्री में प्रमुख इंजीनियर के पद पर कार्य करने लगे। वर्ष 2005-06 में उन्होंने छाता में साईं टार प्रोडक्ट नाम से बिटुमिन फैक्ट्री खोली। इसमें छाता के एक प्रधान, राधापुरम एस्टेट निवासी एक व्यक्ति और एक अन्य को साझीदार बनाया। प्रोडक्शन आदि का कार्य अशोक देखते थे। साझेदारों से पैसे के मुद्दे पर विवाद के चलते दो साल पहले फैक्ट्री बंद हो गई। साझीदारों संग हिसाब भी पंचायतों में हुआ।
इसमें अशोक को 40 लाख रुपये का घाटा हुआ। अशोक ने 15 लाख रुपये लगाकर फिर से फ ैक्ट्री चालू की लेकिन साझीदारों ने उसमें फिर अपने ताले लगा दिए। इससे अशोक आर्थिक रूप से टूट गए। एक लंबे समय तक बेरोजगार रहने के बाद उन्होंने तीन माह पूर्व फरीदाबाद स्थित फैक्ट्री में फिर से नौकरी करना शुरू किया था।
गुणवत्ता के चलते था नाम
अशोक ने जिंदगी में कभी गुणवत्ता से समझौता नहीं किया। बिटुमिन फैक्ट्री में उनका कार्य उच्च कोटि का रहता था। बताया गया कि वे रिफाइनरी से बिटुमिन खरीदते थे और सुधार कर विमानन विभाग को बेचते थे। उनको रनवे बनाने में प्रयोग होने वाले उच्च क्वालिटी के तारकोल के आर्डर मिलते थे। फैक्ट्री कर्मचारी रहे हरीओम निवासी छाता ने बताया कि उन्होंने गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया।
एकाएक ऐसा क्या हुआ...
फैक्ट्री बंद होने के बाद एक लंबे समय तक बेरोजगार रहने के बाद जब तीन माह पूर्व अशोक ने फरीदाबाद की कंपनी में नौकरी की तो लगा जिंदगी फिर पटरी पर लौट रही है। उनकी जिंदादिली को उदाहरण बताने वाले मित्र और रिश्तेदार का भी ये मानना था कि अशोक ने आखिर ये संघर्ष भी जीत लिया। परिवार सहित फरीदाबाद ही शिफ्ट होने की तैयारी की जा रही थी। वे फरीदाबाद में एक फ्लैट भी किराए पर तय कर आए थे। रविवार तक उसमें शिफ्ट होना था। ज्यादातर बड़े सामान की पैकिंग कर ली गई थी। बस रसोई या अन्य छोटा सामान ही बाहर था। गुरुवार की रात एकाएक ऐसा क्या हुआ कि अशोक मानसिक रूप से इतने पस्त हो गए कि इतना बड़ा कदम उठा बैठे। सभी के मन में ये सवाल है।
बेटी-पत्नी की मौत विषाक्त पदार्थ से
हाईवे पुलिस ने शुक्रवार अपराह्न तीनों शवों का पोस्टमार्टम कराया। दो चिकित्सकों ने पोस्टमार्टम किया, इसकी वीडियोग्राफी भी कराई गई। अशोक की बेटी आस्था और पत्नी नीता के विषाक्त पदार्थ का सेवन करने की आशंका जताई गई। इसके चलते चिकित्सकों ने दोनों का बिसरा प्रिजर्व कराया। चिकित्सक के अनुसार पोस्टमार्टम से करीब 18 से 20 घंटे पहले बेटी और पत्नी की मौत हो चुकी थी। माना जा रहा है कि अशोक ने पहले पत्नी और बेटी को विषाक्त का सेवन कराया। वहीं अशोक की गले की हड्डी टूटी मिली, मौत का कारण दम घुटना पाया गया है।
पोलियो से पीड़ित थी आस्था
बेटी आस्था को बचपन में ही पोलियो हो गया था। इससे उसके मानसिक और शारीरिक विकास पर असर पड़ा। 18 साल की आस्था देखने और व्यवहार में 12 साल की लगती थी।