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कान्हा के गांव में अस्पताल न बेटियों के लिए कालेज
पुनीत शर्मा
Updated Tue, 23 Aug 2016 12:37 AM IST
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नंदगांव
- फोटो : अमर उजाला
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भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं से अपनी पहचान बनाने वाला नंदगांव आज समस्या रूपी राक्षसों से ‘द्वंद’ कर रहा है। विकास के मानचित्र पर यह नगरी अपनी जगह नहीं बना पाई है। न कोई अस्पताल है और न ही लड़कियों के लिए कालेज। बिजली देने का वादा तो चौबीस घंटे का है लेकिन आठ घंटे भी नहीं मिल रही। सड़कें जर्जर हैं। नालियां टूटी पड़ी हैं। बिजली के झूलते केबल कभी भी हादसे की वजह बन सकते हैं।
मथुरा से 55 किलोमीटर दूर है नंदबाबा का यह गांव है। जब गोकुल में कंस का आतंक बढ़ा तो नंदबाबा कृष्ण को लेकर नंदगांव आ गए थे। नंदीश्वर पर्वत पर बसे इस गांव को उस वक्त कान्हा के लिए इसलिए सुरक्षित माना गया क्योंकि शांडिल्य ऋषि का श्राप था कि अगर कंस का कोई राक्षस इस पर्वत के आसपास पहुंचेगा तो वह पत्थर का बन जाएगा। इसलिए ठाकुरजी नंदबाबा और मां यशोदा के साथ लंबे समय तक नंदगांव में ही रहे। यहां उन्होंने बाल क्रीड़ाएं कीं। नंदगांव को सुरक्षा प्रदान की।
लेकिन आज नंदगांव के आनंद को मानो किसी की नजर लग गई। हर तरफ समस्या ही समस्या है। ताराचंद्र गोस्वामी का कहना है कि हर छोटे बड़े काम के लिए यहां के लोगों को कोसीकलां भागना पड़ता है। नंदगांव से कोसीकलां का मार्ग इतना जर्जर है कि 10 किलोमीटर का सफर एक घंटे में पूरा हो पाता है। लड़कियों की पढ़ाई के लिए गर्ल्स इंटर कालेज तक नहीं है।
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लड़कियों का कालेज न हो पाने के कारण तमाम छात्राएं पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं। रामकिशन का कहना है कि विकास तो हुआ ही नहीं है। 1978 में नंदगांव को नगर पंचायत का दर्जा मिल गया लेकिन हालात गांव से भी खराब हैं। ब्रज किशोर शर्मा ने बताया कि हर रोज सैकड़ों भक्त नंदभवन के दर्शन करने के लिए आते हैं। यहां लोगों के ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है। यात्री शेड तक नहीं बनवाए गए। एक अस्पताल नहीं है। तबीयत खराब होने पर कोसीकलां या मथुरा की दौड़ लगानी पड़ती है।
50 से ज्यादा परिवार छोड़ गए गांव
स्थानीय लोग बताते हैं कि 50 से अधिक परिवार नंदगांव से पलायन कर गए हैं। यहां बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं है। तमाम लड़कियां इंटर के बाद या तो प्राइवेट फार्म भरती हैं या फिर पढ़ाई छोड़ देती हैं। किसी भी जनप्रतिनिधि ने क्षेत्र में लड़कियों के कालेज के लिए प्रयास नहीं किए। जो संपन्न लोग थे वह बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों में जाकर बस गए हैं। यहां के लोगों का कहना है कि पचास से ज्यादा परिवार पलायन कर गए हैं। अब वह कभी तीज त्योहार पर ही आते हैं।
जनप्रतिनिधियों ने की उपेक्षा
जनप्रतिनिधियों ने भी नंदगाव पर कभी ध्यान नहीं दिया। यहां के वाशिंदों का कहना है कि हर बार चुनावी मंचों से विकास के बड़े बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन हकीकत में शून्य है। जीतने के बाद कोई आकर भी नहीं देखता है।
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मथुरा से 55 किलोमीटर दूर है नंदबाबा का यह गांव है। जब गोकुल में कंस का आतंक बढ़ा तो नंदबाबा कृष्ण को लेकर नंदगांव आ गए थे। नंदीश्वर पर्वत पर बसे इस गांव को उस वक्त कान्हा के लिए इसलिए सुरक्षित माना गया क्योंकि शांडिल्य ऋषि का श्राप था कि अगर कंस का कोई राक्षस इस पर्वत के आसपास पहुंचेगा तो वह पत्थर का बन जाएगा। इसलिए ठाकुरजी नंदबाबा और मां यशोदा के साथ लंबे समय तक नंदगांव में ही रहे। यहां उन्होंने बाल क्रीड़ाएं कीं। नंदगांव को सुरक्षा प्रदान की।
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लेकिन आज नंदगांव के आनंद को मानो किसी की नजर लग गई। हर तरफ समस्या ही समस्या है। ताराचंद्र गोस्वामी का कहना है कि हर छोटे बड़े काम के लिए यहां के लोगों को कोसीकलां भागना पड़ता है। नंदगांव से कोसीकलां का मार्ग इतना जर्जर है कि 10 किलोमीटर का सफर एक घंटे में पूरा हो पाता है। लड़कियों की पढ़ाई के लिए गर्ल्स इंटर कालेज तक नहीं है।
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लड़कियों का कालेज न हो पाने के कारण तमाम छात्राएं पढ़ाई पूरी नहीं कर पाती हैं। रामकिशन का कहना है कि विकास तो हुआ ही नहीं है। 1978 में नंदगांव को नगर पंचायत का दर्जा मिल गया लेकिन हालात गांव से भी खराब हैं। ब्रज किशोर शर्मा ने बताया कि हर रोज सैकड़ों भक्त नंदभवन के दर्शन करने के लिए आते हैं। यहां लोगों के ठहरने की कोई व्यवस्था नहीं है। यात्री शेड तक नहीं बनवाए गए। एक अस्पताल नहीं है। तबीयत खराब होने पर कोसीकलां या मथुरा की दौड़ लगानी पड़ती है।
50 से ज्यादा परिवार छोड़ गए गांव
स्थानीय लोग बताते हैं कि 50 से अधिक परिवार नंदगांव से पलायन कर गए हैं। यहां बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं है। तमाम लड़कियां इंटर के बाद या तो प्राइवेट फार्म भरती हैं या फिर पढ़ाई छोड़ देती हैं। किसी भी जनप्रतिनिधि ने क्षेत्र में लड़कियों के कालेज के लिए प्रयास नहीं किए। जो संपन्न लोग थे वह बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों में जाकर बस गए हैं। यहां के लोगों का कहना है कि पचास से ज्यादा परिवार पलायन कर गए हैं। अब वह कभी तीज त्योहार पर ही आते हैं।
जनप्रतिनिधियों ने की उपेक्षा
जनप्रतिनिधियों ने भी नंदगाव पर कभी ध्यान नहीं दिया। यहां के वाशिंदों का कहना है कि हर बार चुनावी मंचों से विकास के बड़े बड़े दावे किए जाते हैं लेकिन हकीकत में शून्य है। जीतने के बाद कोई आकर भी नहीं देखता है।