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Mathura News: जयंत-हेमा के गढ़ में अखिलेश ने चला गुर्जर दांव

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 22 Sep 2026 12:30 AM IST
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Akhilesh plays the Gurjar card in Jayant-Hema's stronghold
मथुरा। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा संग्राम की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपना आधार मजबूत करने के लिए एक बड़ा सियासी दांव खेला है। अखिलेश यादव ने आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी और बीजेपी सांसद हेमा मालिनी के सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ मथुरा में अपने पिता मुलायम सिंह यादव के खास व वफादार चौधरी दिनेश सिंह गुर्जर को जिले का प्रभारी बनाकर मिशन फतह की कमान सौंप दी है।
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पश्चिमी यूपी की राजनीति में छिड़ी जुबानी जंग अब सीधी जाट बनाम गुर्जर के जातीय समीकरण पर आकर टिकती दिख रही है। अखिलेश यादव ने सिर्फ मथुरा ही नहीं, बल्कि जयंत चौधरी के प्रभाव वाले क्षेत्र बागपत और सहारनपुर में राजकुमार भाटी को तथा हापुड़ में ओमपाल गुर्जर को जिम्मेदारी सौंपकर पूरे वेस्ट यूपी में गुर्जर कार्ड खेल दिया है।
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मथुरा जिले की चुनावी गणित की बात करें तो यहां कुल 5 विधानसभा सीटें मांट, छाता, गोवर्धन, बलदेव और मथुरा सदर आती हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इन सभी सीटों पर परचम लहराया था, जबकि सपा यहां कमजोर साबित होती रही है। मथुरा में जाट मतदाता सबसे प्रभावशाली और निर्णायक भूमिका में रहते हैं, जो पारंपरिक रूप से जयंत चौधरी और बीजेपी का मजबूत आधार माने जाते हैं। इसके साथ ही ब्राह्मण और वैश्य मतदाता बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक हैं। वहीं, जिले में करीब एक लाख से अधिक गुर्जर मतदाता हैं, जो अब तक सियासी रूप से बिखरे हुए थे।
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अखिलेश यादव का यह कदम सीधा 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोटों को साधने का प्रयास है। सपा का गणित साफ है कि यदि दिनेश सिंह गुर्जर के जरिए गुर्जर समाज को एकजुट करके यादव, मुस्लिम और दलित मतों के साथ जोड़ा जाए तो जाट-ब्राह्मण बहुल इस किले में बड़ी सेंध लगाई जा सकती है।

इस फैसले से अखिलेश ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। पहला निशाना जयंत चौधरी हैं, जिनकी कर्मभूमि मांट विधानसभा रही है और वे यहां से सांसद भी रह चुके हैं। उन्हें उन्हीं के क्षेत्र में घेरकर जाट-गुर्जर ध्रुवीकरण के जरिए चुनौती दी जा रही है। दूसरा निशाना मथुरा से लगातार तीन बार सांसद बनकर हैट्रिक लगाने वाली हेमा मालिनी हैं, जिनके किले में सपा अब संगठन मजबूत कर सेंध लगाना चाहती है। 1994 से पार्टी में बने वफादार दिनेश सिंह गुर्जर को जिम्मेदारी देकर अखिलेश यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि 2027 का चुनाव केवल बयानों से नहीं, बल्कि धरातल के कड़े सामाजिक समीकरणों से लड़ा जाएगा।
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