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Mathura News: प्रतिमाह 200 बच्चे हो रहे मानसिक तनाव के शिकार

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 22 Nov 2023 01:49 AM IST
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200 children are becoming victims of mental stress every month.
फोटो
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- माता-पिता की अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ नहीं झेल पा रहे बच्चे

- मनोचिकित्सकों के पास पहुंच रहे हर माह 150 से 200 बच्चे

संवाद न्यूज एजेंसी

मथुरा। अत्यधिक अपेक्षाओं का बोझ और दूसरे बच्चों से तुलना से कहीं आपके बच्चे को मानसिक बीमार तो नहीं कर रही है। कहीं उसमें चिड़चिड़ापन, मनमानी करना, किसी की बात न मानना जैसे लक्षण तो नहीं पनप रहे हैं। यदि ऐसा है तो वह डिप्रेशन के शिकार हो रहे हैं। इस तरह के प्रतिमाह लगभग 150 से 200 केस चिकित्सकों के पास आ रहे हैं।

अभिभावक भले ही आज अपने बच्चों के व्यवहार को लेकर परेशान हैं लेकिन वह भूल रहे हैं कि उनकी अपेक्षाओं का दबाव उनके बच्चों को मानसिक बीमार कर रहा है। ऐसे बच्चों की संख्या लगातार बढ़ ही रही है। लोगों को इसके प्रति जागरूक होने की आवश्यकता है। मनोचिकित्सक डॉ. रंजीत ने बताया कि प्रतिदिन उनके पास ही दो से तीन बच्चे इस तरह के आते हैं। जिनके व्यवहार से उनके अभिभावक परेशान हैं। बच्चों का बचपन उनके मां-बाप की अपेक्षाओं के बोझ तले दब रहा है। इससे उनका व्यवहार एकदम से बदल जाता है। वह चिड़चिड़े हो जाते हैं, या फिर गुमसुम हो जाते हैं। 6 से 10 वर्ष के बच्चों में यह समस्या अधिक देखने को मिल रही है। हम बच्चों को दवा देने के साथ ओपीडी में अभिभावकों को भी इसके प्रति जागरूक करते हैं।
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बिगड़े मानसिक स्वास्थ्य के लक्षण

डॉ. रंजीत ने बताया कि बच्चों के व्यवहार व बातों में परिवर्तन हो तो यह बिगड़े हुए मानसिक स्वास्थ्य के लक्षण हैं। उनका चिड़चिड़ाना, किसी की बात न मानना, मनमानी करना, कुछ भी कहने पर जोर से जवाब देना, पढ़ाई व खेलकूद में मन न लगना, गुमसुम हो जाना आदि इसके लक्षण हैं।
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क्या हैं बच्चों में परिवर्तन के कारण

मां-बाप की अत्यधिक अपेक्षाएं, दूसरे बच्चों से तुलना, आउटडोर गेम्स न खेलना, मोबाइल गेम्स खेलना (मारधाड़ व एक्शन वाले गेम) आदि बच्चों में तनाव के कारण बन रहे हैं।

बचाव के उपाय

- शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य का भी ख्याल रखें।

- बच्चों के साथ समय व्यतीत करें।

- बच्चों की दिनचर्या को नियमित करें।

- बच्चों को आउटडोर खेलों के प्रति जागरुक करें।

- अभिभावक बच्चों को अपने साथ टहलाएं।

- दूसरों से बच्चों की तुलना बंद करें।

- उन पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ न डालें।
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