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10 बसों से गृह जनपद भेजे गए प्रवासी मजदूर
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महोबा। महानगरों से आ रहे प्रवासी श्रमिकों की दुश्वारियां कम नही हो रही हैं। हादसों व माल वाहक वाहनों के मालिकों और चालकों के खिलाफ हो रही कार्रवाई के चलते अब श्रमिकों को पैदल सफर करना पड़ा रहा। ट्रक या अन्य वाहनों के चालक उनकी दशा देखकर पसीज नहीं रहे हैं। पैदल व वाहनों से शनिवार को करीब 300 श्रमिक यूपी-एमपी बॉर्डर तक पहुंचे। यहां से श्रमिकों को रोडवेज बसों से उनके गृह जनपद भेजा गया।
लॉकडाउन-4 के बाद श्रमिक घरों की तरफ पैदल भाग रहे हैं। रास्ते में किसी वाहन चालक ने अपने वाहन में बैठा लिया तो ठीक, वरना श्रमिकों को तेज धूप और भीषण गर्मी के बीच सिर पर बैग और सामान लेकर पैदल चलना पड़ रहा है। तेज धूप में प्रवासी श्रमिकों को पैदल चलना रास नही आ रहा है, लेकिन घर पहुंचने की उम्मीद में वह पैदल चले जा रहे हैं। न रात में कीड़े मकोड़े का डर है और न ही दिन में तपती सड़कों की परवाह। चिंता है तो सिर्फ किसी तरह घर पहुंचने की। कभी ट्रक, तो कभी पैरों के सहारे रास्ता तय करके यूपी-एमपी के बॉर्डर कैमाहा आए करीब 300 श्रमिकों को जैतपुर, बस्ती, प्रतापगढ़ व प्रयागराज के लिए 10 बसों से भेजा गया है। बॉर्डर पर तक आने वाले श्रमिकों के लिए प्रशासन ने खाने-पीने व उन्हें घर तक पहुंचाने के लिए रोडवेज बसों की व्यवस्था कर रखी है।
बेलाताल (महोबा)। घुसियानापुरा निवासी रघुवीर दिल्ली में मजदूरी करता था। 12 मई को वह पैदल चलकर गाजियाबाद पहुंचा। वहां से पुलिस ने वापस कर दिया। पुलिस से बचने के लिए 42 किलोमीटर पैदल कर वह लाल कुआं पहुंचा। वहां से ट्रक चालक ने उसे झांसी तक छोड़ दिया। झांसी से आटो करके मऊरानीपुर पहुंचा। इसके बाद 15 किमी पैदल चलकर देवरी बंधा में अपने रिश्तेदारों से साइकिल लेकर 80 किलोमीटर का सफर तय किया। उसने करीब सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा की।
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बेलाताल (महोबा)। जैतपुर निवासी कैलाश गुड़गांव में मजदूरी करता था। 700 किलोमीटर पत्नी को साइकिल से बैठाकर गांव तक लाया। रास्ते में तेज धूप और सड़क गर्म होने के कारण दो बार साइकिल पंचर हो गई। इसकी वजह पति-पत्नी करीब 25 किमी तक पैदल चले। फिर साइकिल की दुकान में पंचर बनवाने के बाद आगे बढ़े। 15 दिन में साइकिल से घर तक पहुंचे। कैलाश कहते हैं कि अब वह कभी परदेश नही जाएंगे।
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लॉकडाउन-4 के बाद श्रमिक घरों की तरफ पैदल भाग रहे हैं। रास्ते में किसी वाहन चालक ने अपने वाहन में बैठा लिया तो ठीक, वरना श्रमिकों को तेज धूप और भीषण गर्मी के बीच सिर पर बैग और सामान लेकर पैदल चलना पड़ रहा है। तेज धूप में प्रवासी श्रमिकों को पैदल चलना रास नही आ रहा है, लेकिन घर पहुंचने की उम्मीद में वह पैदल चले जा रहे हैं। न रात में कीड़े मकोड़े का डर है और न ही दिन में तपती सड़कों की परवाह। चिंता है तो सिर्फ किसी तरह घर पहुंचने की। कभी ट्रक, तो कभी पैरों के सहारे रास्ता तय करके यूपी-एमपी के बॉर्डर कैमाहा आए करीब 300 श्रमिकों को जैतपुर, बस्ती, प्रतापगढ़ व प्रयागराज के लिए 10 बसों से भेजा गया है। बॉर्डर पर तक आने वाले श्रमिकों के लिए प्रशासन ने खाने-पीने व उन्हें घर तक पहुंचाने के लिए रोडवेज बसों की व्यवस्था कर रखी है।
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बेलाताल (महोबा)। घुसियानापुरा निवासी रघुवीर दिल्ली में मजदूरी करता था। 12 मई को वह पैदल चलकर गाजियाबाद पहुंचा। वहां से पुलिस ने वापस कर दिया। पुलिस से बचने के लिए 42 किलोमीटर पैदल कर वह लाल कुआं पहुंचा। वहां से ट्रक चालक ने उसे झांसी तक छोड़ दिया। झांसी से आटो करके मऊरानीपुर पहुंचा। इसके बाद 15 किमी पैदल चलकर देवरी बंधा में अपने रिश्तेदारों से साइकिल लेकर 80 किलोमीटर का सफर तय किया। उसने करीब सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा की।
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बेलाताल (महोबा)। जैतपुर निवासी कैलाश गुड़गांव में मजदूरी करता था। 700 किलोमीटर पत्नी को साइकिल से बैठाकर गांव तक लाया। रास्ते में तेज धूप और सड़क गर्म होने के कारण दो बार साइकिल पंचर हो गई। इसकी वजह पति-पत्नी करीब 25 किमी तक पैदल चले। फिर साइकिल की दुकान में पंचर बनवाने के बाद आगे बढ़े। 15 दिन में साइकिल से घर तक पहुंचे। कैलाश कहते हैं कि अब वह कभी परदेश नही जाएंगे।