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वर्चुअल ऑटिज्म : शांत रखने के लिए बच्चों को न दें मोबाइल
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महराजगंज। बच्चों को चुप कराने या शांत रखने के लिए मोबाइल देना खतरनाक साबित हो सकता है। इससे बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म का खतरा बढ़ रहा है। ऐसा करने से बच्चे मोबाइल के लती हो जा रहे हैं। इससे उनमें चिड़चिड़ापन और अनदेखी जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। जिला अस्पताल के चिकित्सकों के मुताबिक इस गंभीर बीमारी के हर दिन तीन से चार केस मिल रहे। चिकित्सक अभिभावकों को इस गंभीर रोग से बचने के उपाय बता रहे हैं।
जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डाॅ. रंजन मिश्रा ने बताया कि यह समस्या अभिभावकों की गलती से बढ़ रही है। आजकल माता-पिता की आम आदत बच्चों को चुप करने के लिए मोबाइल फोन देने की बन गई है।
यही आदत बच्चों के लिए खतरा साबित हो रही है। लगातार मोबाइल स्क्रीन के संपर्क में रहने से बच्चों में स्क्रीन एडिक्शन, धीमा विकास, भाषा सीखने में बाधा और परिजनों से भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई बच्चों में इसका प्रभाव काफी गंभीर होता जा रहा है। यह बच्चे मोबाइल स्क्रीन दूर करने पर वे रोते, चिढ़ते या प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं। इसलिए दो वर्ष तक के बच्चों को मोबाइल फोन बिल्कुल नहीं दिखाना चाहिए।
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बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम उनकी आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा रहा है। ऐसे बच्चे अस्पताल में चेकअप तक करने नहीं देते जब तक कि उन्हें स्क्रीन न दिखाई जाए।
इसलिए ऐसे केस लेकर आने वाले अभिभावकों को सलाह दी जा रही है कि वह मोबाइल बच्चों को देने से बचें।
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जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डाॅ. रंजन मिश्रा ने बताया कि यह समस्या अभिभावकों की गलती से बढ़ रही है। आजकल माता-पिता की आम आदत बच्चों को चुप करने के लिए मोबाइल फोन देने की बन गई है।
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यही आदत बच्चों के लिए खतरा साबित हो रही है। लगातार मोबाइल स्क्रीन के संपर्क में रहने से बच्चों में स्क्रीन एडिक्शन, धीमा विकास, भाषा सीखने में बाधा और परिजनों से भावनात्मक दूरी जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई बच्चों में इसका प्रभाव काफी गंभीर होता जा रहा है। यह बच्चे मोबाइल स्क्रीन दूर करने पर वे रोते, चिढ़ते या प्रतिक्रिया देना बंद कर देते हैं। इसलिए दो वर्ष तक के बच्चों को मोबाइल फोन बिल्कुल नहीं दिखाना चाहिए।
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बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम उनकी आंखों की रोशनी को नुकसान पहुंचा रहा है। ऐसे बच्चे अस्पताल में चेकअप तक करने नहीं देते जब तक कि उन्हें स्क्रीन न दिखाई जाए।
इसलिए ऐसे केस लेकर आने वाले अभिभावकों को सलाह दी जा रही है कि वह मोबाइल बच्चों को देने से बचें।