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पूस की ठंड से लोहा लेती हैं बूढ़ी हड््डियां, ये शौक नहीं मजबूरी है
Thu, 03 Jan 2019 12:44 AM IST
राकेश पांडेय
महराजगंज (ब्यूरो)
महराजगंज (ब्यूरो)
Published by: राकेश पांडेय
Updated Thu, 03 Jan 2019 12:44 AM IST
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पूस की ठंड से लोहा लेती हैं बूढ़ी हड््डियां, ये शौक नहीं मजबूरी है
- फोटो : अमर उजाला
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महराजगंज। पूस की कड़कड़ाती ठंड में जब रात के समय लोग घरों में कंबल में दुबके रहते हैं, सदर ब्लॉक के ग्राम पंचायत रामपुर बुजुर्ग की 75 साल की सोनमती खुले बरामदे में फटे-पुराने कपड़ों के सहारे सर्दी से लोहा लेती है। यह इस वृद्ा का न तो शौक है और न ही आदत। यह उसकी मजबूरी है।
सोनमती निराश्रित है और ठंड के इस मौसम में दर-दर की ठोकरें खाने को विवश है।भूमि और आवास विहीन इस महिला को अभी तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली है। वह पूरी तरह से गांव वालों की दया पर दिन काट रही है।गांव के लोगों का कहना है कि करीब 25 साल पहले सोनमती के पति की मृत्यु हो गई थी। कोई संतान न होने की वजह से वह लाचारी की जिंदगी जीने को विवश हो गई। उसेक पास न तो रहने को घर है, न अन्न उपजाने के लिए कृषि योग्य जमीन। वह खानाबदोश की जिंदगी जी रही है। सोनमती का अपना आशियाना न होने की वजह से वह गांव के लोगों के यहां खुले बरामदे में रात गुजारने को विवश है। खाने का भी कोई जुगाड़ नहीं है। गांव के लोग उसके सामने दो रोटी डाल देते हैं, जिससे पेट भरकर वह जिंदगी की गाड़ी खींच रही है। कई बार तो ऐसा होता है कि उसे भूखे पेट ही सोना पड़ता है। इन दिनों गांव के एक व्यक्ति के घर के खुला बरामदा उसका ठिकाना है। अमरनाथ शर्मा का कहना है कि वृद्धा को न तो पेंशन मिलता है और न ही कोई अन्य सरकारी सहायता। वृद्धा के नाम से राशनकॉर्ड तक जारी नहीं किया गया है।सीडीओ राम सिंहासन प्रेम ने कहा कि सदर बीडीओ को भेजकर बुजुर्ग महिला को तत्काल मदद दिलाई जाएगी। साथ ही हर संभव सुविधा भी उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी।
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सोनमती निराश्रित है और ठंड के इस मौसम में दर-दर की ठोकरें खाने को विवश है।भूमि और आवास विहीन इस महिला को अभी तक कोई सरकारी सहायता नहीं मिली है। वह पूरी तरह से गांव वालों की दया पर दिन काट रही है।गांव के लोगों का कहना है कि करीब 25 साल पहले सोनमती के पति की मृत्यु हो गई थी। कोई संतान न होने की वजह से वह लाचारी की जिंदगी जीने को विवश हो गई। उसेक पास न तो रहने को घर है, न अन्न उपजाने के लिए कृषि योग्य जमीन। वह खानाबदोश की जिंदगी जी रही है। सोनमती का अपना आशियाना न होने की वजह से वह गांव के लोगों के यहां खुले बरामदे में रात गुजारने को विवश है। खाने का भी कोई जुगाड़ नहीं है। गांव के लोग उसके सामने दो रोटी डाल देते हैं, जिससे पेट भरकर वह जिंदगी की गाड़ी खींच रही है। कई बार तो ऐसा होता है कि उसे भूखे पेट ही सोना पड़ता है। इन दिनों गांव के एक व्यक्ति के घर के खुला बरामदा उसका ठिकाना है। अमरनाथ शर्मा का कहना है कि वृद्धा को न तो पेंशन मिलता है और न ही कोई अन्य सरकारी सहायता। वृद्धा के नाम से राशनकॉर्ड तक जारी नहीं किया गया है।सीडीओ राम सिंहासन प्रेम ने कहा कि सदर बीडीओ को भेजकर बुजुर्ग महिला को तत्काल मदद दिलाई जाएगी। साथ ही हर संभव सुविधा भी उपलब्ध कराने की कोशिश की जाएगी।
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