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Maharajganj News: कभी जंगल की शान था...अब काठ बंगले का अस्तित्व भी खतरे में

Sun, 31 May 2026 02:11 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 31 May 2026 02:11 AM IST
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Once the pride of the forest... now the existence of the wooden bungalow is also in danger.
उपेक्षित पड़ा काठ बांग्ला।
शिवपुर रेंज में वर्ष 1972 में केवल लकड़ियों से निर्मित किया गया था आलीशान काठ बंगला
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महराजगंज। शिवपुर रेंज में जंगल के बीच में 1972 में बना काठ बंगला न केवल ब्रिटिश काल का बेजोड़ नमूना है बल्कि पर्यावरण और वन्यजीव पर्यटन का मुख्य स्तंभ भी रहा है। लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता के कारण जिस काठ बंगले को दिखाने के लिए लोग अपने मेहमानों को ले जाते थे आज वहां खुद भी जाने से डरते हैं। डाक बंगला धीरे-धीरे जर्जर होता जा रहा है।
एक समय था जब शिवपुरी रेंज के जंगल के बीचों-बीच बना काष्ठ बंगला पूरे इलाके की शान माना जाता था। केवल लकड़ियों से निर्मित यह आलीशान काठ बंगला जंगल की खूबसूरती और विभागीय गौरव का प्रतीक हुआ करता था। प्रशासनिक दौरे पर आने वाले उच्चाधिकारी इसी बंगले में ठहरते थे। बंगले में किचन, डाइनिंग हॉल, बेडरूम, टॉयलेट और बाथरूम तक आधुनिक सुविधाओं से युक्त थे। आज वही ऐतिहासिक काठ बंगला झाड़-झंखाड़ और टूटे-फूटे ढांचे के बीच अपनी बदहाली की कहानी बयां कर रहा है। भवन की दीवारें जर्जर हो चुकी हैं। टाइल्स टूटकर बिखर गए हैं। पूरा परिसर खंडहर में तब्दील होता जा रहा है।
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शासन की उदासीनता से अधर में लटका मरम्मत प्रस्ताव
वन विभाग के अधिकारियों ने ऐतिहासिक काठ बंगले की मरम्मत और संरक्षण के लिए वर्ष 2022 में प्रदेश सरकार को प्रस्ताव भेजा था, लेकिन शासन स्तर पर प्रस्ताव स्वीकृत नहीं हो सका। वन विभाग के सूत्रों के अनुसार पहले इस काठ बंगले के रख-रखाव के लिए कर्मचारी वहीं रहते थे, लेकिन जंगल पार्टी नामक डकैत गिरोह के भय के कारण कर्मचारियों को शिवपुरी रेंज परिसर में स्थानांतरित होना पड़ा। इसके बाद बंगले की देखभाल लगभग बंद हो गई और धीरे-धीरे यह भवन खंडहर में तब्दील होता चला गया।
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पर्यटन की अपार संभावनाएं लेकिन कोई ठोस पहल नहीं
पर्यटन की दृष्टिकोण से यह काठ बंगला और पूरा सोहगीबरवा क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। प्राकृतिक सौंदर्य, घने जंगल और वन्यजीवों की मौजूदगी इस क्षेत्र को पर्यटन हब बना सकता है, लेकिन अब तक पर्यटन विभाग द्वारा कोई ठोस पहल नहीं की गई। हालांकि वन विभाग समय-समय पर अधिकारियों से इसके संरक्षण और मरम्मत की मांग करता रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि काठ बंगले की मरम्मत कर उसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए तो न केवल क्षेत्र की पहचान मजबूत होगी बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।
1995 की चौपाल आज भी लोगों को याद
ग्रामीण सुभाष यादव, वीरेन्द्र भारती और लल्लन यादव बताते हैं कि वर्ष 1995 में तत्कालीन ग्राम प्रधान कमला यादव के अनुरोध पर उस समय के सांसद पंकज चौधरी ने सोहगीबरवा में एक बड़ी चौपाल लगाई थी। चौपाल में जिलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी पहुंचे थे। उस दौरान विकलांग प्रमाण पत्र वितरित किए गए थे। पुरुष नसबंदी कराने वालों को जमीन के पट्टे दिए गए थे। गरीबों को आवास के लिए आर्थिक सहायता और जरूरतमंदों को कंबल वितरित किए गए थे। ग्रामीणों का कहना है कि उस समय शासन-प्रशासन की सक्रियता देखकर लोगों को उम्मीद जगी थी कि सोहगीबरवा का विकास होगा, लेकिन समय के साथ सब कुछ उपेक्षा की भेंट चढ़ गया।

सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग के गौरव का विषय
वर्तमान में शिवपुर रेंज के रेंजर सुनील कुमार राव ने भी इस ऐतिहासिक काठ बंगले और परिसर की बदहाली की पुष्टि की है। स्थानीय लोगों का कहना है कि महाराजगंज जिले के लिए सोहगीबरवा वन्य जीव प्रभाग गौरव का विषय है, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस स्थान के नाम पर पूरा अभ्यारण जाना जाता है, वही आज अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
स्पीकअप
गांव का छोटा पंचायत काठ बंगले पर होता था। यह तय रहता था कि बंगले पर कोई न कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति मिलेगा जिसका निर्णय सर्वोपरी होगा। जब कोई वीआईपी की गाड़ी वहां आती तो गांव के लोग उत्साहित हो जाते थे। लेकिन ये बातें अब सदियों पुरानी यादें बन कर रह गई हैं।

-इंद्रजीत मुशहर, सोहगीबरवा
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कभी समय हुआ करता था कि गांव में कोई मेहमान आने पर जंगल के वादियों में स्थित काठ बंगले को दिखाने के लिए ले जाया जाता था। वहां बैठने पर पक्षियों की सुरीली आवाज, प्राकृतिक वातावरण से भरा स्थान को छोड़ने का मन नहीं करता लेकिन अब उस स्थान पर जाने डर लगता है।
-नागेन्द्र पांडेय, सोहगीबरवा
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काठ बंगला के लिए अभी कोई बजट नहीं है। इसके लिए प्रस्ताव भेजा जाएगा। बजट आने के बाद इसको दुरुस्त कराया जाएगा।

-निरंजन सुर्वे, डीएफओ
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